Wednesday, December 8, 2010

दो तरह का देश, दो तरह की कांग्रेस? Source: Shravan Garg |

कांग्रेस पार्टी ऐसा लगता है, किसी भी तरह की जोखिम लेने के खतरे से अपने आपको सफलतापूर्वक बचा ले जाती है। पार्टी के प्रजातांत्रीकरण की दिशा में प्राप्त होने वाले हर अवसर को निर्भयतापूर्वक और निर्ममतापूर्वक टाल दिया जाता है। किसी भी तरह की आलोचनात्मक बहस या पोस्टमार्टम करने का तो सवाल ही नहीं उठता। एक ‘पंक्ति’ का प्रस्ताव पूरे एजेंडे की स्पेस खा जाता है और हजारों की संख्या में उपस्थित नेता और कार्यकर्ता ‘पंक्तिबद्ध’ होकर अपने-अपने स्थानों पर ‘जैसे थे’ की मुद्रा में ठहर जाते हैं। कुछ नया हो, या बदले, ऐसा कोई भी नेता चाहता है, इसमें शक होता है।

बदलने की किसी भी कोशिश का मतलब यही लगाया जाता है कि पार्टी हित में पुरानी व्यवस्था को ही बनाए रखना जरूरी है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने मंगलवार को नई दिल्ली में संपन्न हुई अपनी एक या आधे दिन की बैठक में जो तय किया वह चौंकानेवाला है। इसलिए नहीं कि उसमें भ्रष्टाचार जैसे अहं मुद्दे पर उसमें कोई चर्चा नहीं हुई या कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रमुखता के साथ निशाने पर लिया गया। बल्कि इसलिए कि बैठक में प्रकट हो सकने वाला कांग्रेस का एक आक्रामक चेहरा लोकसभा के लिए 2014 में होने वाले चुनावों तक पार्टी की गतिविधियों, उसके कार्यकर्ताओं और समूचे देश की राजनीति को प्रभावित करने वाला साबित हो सकता था, पर ऐसा नहीं होने दिया गया। या तो कांग्रेस की स्थापित कमजोरियों के चलते या फिर उन ‘निहित ताकतों’ के कारण जिन्हें किसी भी उजाले वाले परिवर्तन में स्वयं के राजनीतिक भविष्य के लिए अंधकार की आशंकाएं ही डराती रहती हैं।

अपने आपको मैदानी धूप में खपाकर बड़ी जिम्मेदारियों के लिए तैयार करने वाले राहुल गांधी की तरफ देश के अन्य राजनीतिक दलों की नजरें लगी रही होंगी कि इस बार एआईसीसी में कमान उन्हीं के हाथों में दिखाई देगी, पर वैसा नहीं हुआ। तिरुपति और कोलकाता के अनुभवों के बाद से जिस तरह के नारों और जय-जयकारों ने कांग्रेस को जकड़ रखा है, उसमें किसी भी तरह की ढील नहीं पड़ने दी गई। राहुल गांधी, कार्यसमिति के सदस्यों के लिए चुनाव चाहते थे, पर सोनिया गांधी को ऐसा न होने देने के लिए मना लिया गया होगा। अगले तीन वष्रो यानी २क्१४ तक के लिए पार्टी की नीति-निर्धारक इकाई के गठन का निर्णय कांग्रेस अध्यक्ष के हाथों में सौंप दिया गया। वे चाहेंगी तो निश्चित ही मनोनीत टीम को भी निर्वाचित टीम वाले चेहरों में बदल सकती हैं, अगर ऐसा संभव होने दिया गया तो! राहुल गांधी से कभी कोई कॉलेजी युवा या स्कूली बच्चा सवाल पूछने की हिम्मत जुटा सकता है कि बड़े-बड़े और बुजुर्ग राष्ट्रीय नेता जब सार्वजनिक रूप से उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ने की होड़ में लगे रहते हैं तब उन्हें अंदर से कैसा महसूस होता है?

कांग्रेस के अंदरूनी चुनावों के जरिए देश की जनता की रुचि केवल इतना भर पता करने में हो सकती थी कि किस तरह के संगठनात्मक घोड़े पर सवार होकर राहुल गांधी देश पर अपना राज चलाना चाहते हैं? यानी उनकी खुद की पार्टी पर उनका कितना राज चलता है? सवा सौ साल की उम्र वाली पार्टी क्या इसी तरह आत्ममुग्ध बनी रहकर असली मुद्दों का सामना करने से बचती रहेगी? अगर युवा कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र परिषद (एनएसयूआई) में संगठनात्मक चुनावों की प्रक्रिया को अंजाम दिया जा सकता है तो फिर कार्यसमिति के सदस्यों के चुनाव और प्रदेश अध्यक्षों के चयन को लेकर एक-एक पंक्तियों के प्रस्ताव किसलिए?

ऐसा नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी जैसे बड़े विपक्षी दल या अन्य राजनीतिक पार्टियों में प्रजातांत्रिक तरीकों से संगठनात्मक चुनावों की प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता है और भाई-भतीजावाद अथवा खुशामदखोरों के लिए कोई जगह नहीं रहती। चुनावों का मतलब ही है कि नए चेहरों के लिए कुर्सियां खाली करना, ताजी हवा के थपेड़ों को बंद तंबुओं में घुसने देने के लिए रास्ते बनाना। खतरा वह नहीं है जिसका कि जिक्र ‘भारत’ और ‘इंडिया’ के बीच बढ़ती हुई दूरी की बात दोहराते हुए राहुल गांधी अकसर कहते रहते हैं और ऐसा उन्होंने एआईसीसी की बैठक में भी किया। राहुल गांधी के सामने शायद बड़ी चुनौती ‘दो तरह की कांग्रेस’ के बीच सोच में बढ़ती दूरियों को पाटने की भी है। एक तो कांग्रेस वह है जिसका कि वे नेतृत्व करना चाहते हैं और दूसरी वह जो वर्तमान में बनी हुई है। : अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक के परिणामों को अनपेक्षित होते हुए भी अनपेक्षित नहीं माना जाना चाहिए।

टेप जो कहते हैं Source: राजदीप सरदेसाई

एक वक्त था जब संपादकों को देखा या सुना नहीं, केवल पढ़ा जाता था। इस ‘आइवरी टॉवर’ रवैये की बेहतरीन मिसाल 1960 के दशक के एक शीर्ष संपादक एनजे नानपोरिया थे। एक बार जब वह बाजार में खरीदारी कर रहे थे, उन्होंने पाया कि एक शख्स लगातार उन्हें देखकर मुस्करा रहा है। कौतूहलवश उन्होंने पूछा कि वह कौन है।

उसने कहा, ‘मैं आपका चीफ रिपोर्टर हूं सर!’ मुमकिन है कि यह किंवदंती हो, लेकिन यह बताती है कि किस तरह गुजरे जमाने के संपादक कभी-कभार ही अपने केबिन से बाहर कदम रखते थे। आज के टेलीविजन युग में स्थिति बिल्कुल उलट चुकी है, जहां संपादक-एंकर फौरन पहचान ली जाने वाली सेलेब्रिटी बन चुके हैं।

भव्यता का भ्रम पैदा करने वाले ‘पर्सनैलिटी कल्ट’ के इस दौर में आत्महंता गुमनामी बड़ी हद तक नुकसानदेह होती है। (इस लेख के साथ आप अपने स्तंभकार की तस्वीर देख रहे हैं, कुछ साल पहले इसका छपना कुफ्र माना जाता।)

ऐसा नहीं कि केवल संपादकों की ही आत्म-छवि बदली है। पब्लिक रिलेशंस या जनसंपर्क पेशेवरों की छवि में भी नाटकीय परिवर्तन हुआ है। मुझे याद है 1980 के दशक के आखिरी सालों में हम हर दीवाली पर बिजनेस डेस्क की तरफ तनिक ईष्र्या से देखते थे, जब उदास दिखते पीआर मैनेजर की तरफ से बिजनेस रिपोर्टर के लिए त्योहार की ‘बख्शीश’ आती थी।

जमाना बदला। सूटपीस की जगह आई-पैड ने ले ली। ज्यादा अहम बदलाव यह आया कि कम तनख्वाह वाले पीआर एक्जीक्यूटिव के स्थान पर स्मार्ट सूट-बूटधारी कॉपरेरेट कम्युनिकेशन एमबीए आ गए। पहले पीआर प्रचार की खबरों को सिंगल कॉलम जगह दिलवा पाने के लिए जाने जाते थे, वहीं अब इसकी जगह हाई-प्रोफाइल ‘एडवोकेसी’ कैंपेन ने ले ली, जो न केवल पत्रकार, बल्कि समूचे नीति-निर्माता तंत्र को प्रभावित करने के लिए बनाए जाते हैं।

नीरा राडिया टेप्स इसी बदलाव को प्रदर्शित करते हैं। वे निर्णय प्रक्रिया में एक विशिष्ट हस्ती के तौर पर कॉपरेरेट ‘लॉबिस्ट’ के आगमन का संकेत हैं, जो सिर्फ रहस्यमयी ऑपरेटर ही नहीं, अपवर्डली मोबाइल, बेहद व्यवहार-कुशल सामाजिक हैसियत वाली शख्सियत भी हैं।

टेप्स ने इस बात की भी पुष्टि की है कि तटस्थ पर्यवेक्षक की भूमिका निभाने वाले संपादक के दिन अब लद गए और उसकी जगह खबरों को बनाने की प्रक्रिया में ज्यादा ‘सक्रिय’ मौजूदगी दर्ज कराने वाले संपादक ने ले ली है। दुर्भाग्य से पत्रकारिता और लोक नीति पर इन टेप्स के प्रभावों का आकलन करने के बजाय मीडिया के एक वर्ग ने टेप्स में पकड़े गए पत्रकारों पर ही फोकस किया है।

एक बदतरीन राज यह है कि पत्रकारिता में ऐसे लोग हैं जो पैसे और पावर के प्रलोभन में आ जाते हैं और नैतिक संबल के अभाव में ‘फिक्सर’ बनकर रह जाते हैं। लेकिन ईमानदारी से देखें तो अभी तक टेप्स में इन पत्रकारों द्वारा अवैध हित साधने या व्यापक ‘षड्यंत्र’ का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है जैसा कि कहा जा रहा है।

बातचीत के अंश कॉपरेरेट, राजनेता और संपादकों के बीच चिंताजनक नजदीकी को जरूर उजागर करते हैं, जो पेशेवर विवेकहीनता और पत्रकार व ‘स्रोत’ के बीच के फर्क को धुंधला करने का कारण बनती है। लेकिन इससे वह उन्मादपूर्ण क्रोध जायज नहीं ठहरता जो इन खुलासों पर प्रकट किया जा रहा है।

तथ्यों के बजाय अटकलों पर आधारित सनसनीखेज पत्रकारिता पाठकों को कुछ समय के लिए उत्तेजित जरूर कर सकती है, लेकिन वह हमें सच्चाई तक नहीं ले जा सकती। सच यह है कि राडिया टेप्स पत्रकारीय बदनीयत के बारे में कम और हाई-स्टेक कॉपरेरेट युद्ध के बारे में ज्यादा हैं, जो अंतत: समूचे तंत्र का सर्वनाश कर सकते हैं, फिर चाहे वे टेलीकॉम के लिए लड़े जा रहे हों या गैस के लिए।

इसके बाद, चाहे यह निर्णय लेना हो कि संसद में बजट पर होने वाली बहस में कौन बोले, या यह कि स्पेक्ट्रम का आवंटन कैसे होना चाहिए, या मंत्रिमंडल में कौन शामिल हो, साफ है कि ऐसे निर्णयों की समूची कवायद भ्रष्ट नेताओं और तत्पर बाबुओं की मदद से मुट्ठी भर ओलिगार्क या रसूखदारों के व्यापक व्यावसायिक हितों की रक्षा करने के लिए की जाती है।

लेकिन इस विराट योजना में पत्रकारिता कहां फिट होती है? क्लासिकल ढांचे में पत्रकार को तंत्र में ‘छापामार’ लड़ाके जैसी भूमिका निभानी चाहिए, जिसका काम है तहकीकात और भंडाफोड़ करना। दुर्भाग्यवश पत्रकारों को भी सत्ताधारी कुलीनों का साझेदार बना लिया गया है, जबकि वास्तव में उन्हें ‘आउटसाइडर’ की भूमिका में होना चाहिए था।

नतीजा यह है कि विरोध की पत्रकारिता की सुदृढ़ भारतीय परंपरा को आरामदायक नेटवर्को की बलिवेदी पर गिरवी रख दिया गया है। एक स्तर पर यह नैतिक ह्रास बाजार की बदलती सच्चाइयों का नतीजा है। खबरों के बेहद प्रतिस्पर्धात्मक संसार में ‘पहुंच’ बहुत महत्वपूर्ण होती है और ‘पहुंच’ ऐसा विशेषाधिकार है जो अक्सर निजी रिश्ते बनाने पर निर्भर करता है।

उदाहरण के तौर पर फिल्म पत्रकारों से अपेक्षा की जाती है कि अगर सितारे का ‘एक्सक्लूसिव’ इंटरव्यू चाहिए तो वे अपने रिव्यू में फिल्म की तारीफ करें। दुनिया की सैर के लिए लाइफस्टाइल पत्रकार प्रायोजित सौदों पर निर्भर रहते हैं।

राजनीतिक पत्रकारों को जगह बनाने के लिए व्यक्तिगत या वैचारिक शिविरों से नजदीकियां बढ़ानी पड़ती हैं। बिजनेस पत्रकारिता तो और भी कठिन है, क्योंकि बड़े विज्ञापनदाताओं के व्यावसायिक बाहुबल और स्वतंत्र पत्रकारिता के सिद्धांत के बीच कभी भी टकराव हो सकता है।

पिछली बार ऐसा कब हुआ था, जब मीडिया में कॉपरेरेट भ्रष्टाचार का मुस्तैदी से भंडाफोड़ किया गया? अधिकांश बिजनेस इंटरव्यू व्यक्तित्व पर केंद्रित सॉफ्ट फोकस प्रोफाइल होते हैं, जिनका मकसद पड़ताल करने के बजाय छवि निर्माण करना होता है। सत्यम के बॉस रामालिंगा राजू को गड़बड़ियों की स्वीकारोक्ति के पहले तक रोल मॉडल की तरह पेश किया जाता था।

केतन पारीख की स्टॉक मार्केट की समझ पर तारीफों के पुल बांधे जाते थे। 19९क् के दशक के प्रारंभ में हुआ हर्षद मेहता घोटाला अंतिम उदाहरण था, जिसे पत्रकारों ने बेनकाब किया। २जी घोटाले का खुलासा भी भारतीय मीडिया की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों में से है, जो यह दिखाता है कि सशक्त व्यावसायिक और राजनीतिक हितों को बेनकाब करने में मीडिया कितनी सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।

संभव है कि सीएजी की रिपोर्ट ए राजा के ताबूत में आखिरी कील साबित हो, बीते दो सालों से प्रिंट व टीवी के अनेक पत्रकार स्पेक्ट्रम आवंटन में भ्रष्टाचार को लेकर आगाह करते आ रहे थे। कॉमनवेल्थ और आदर्श घोटाले के विरुद्ध जारी अभियान बताता है कि पत्रकारिता धीरे ही सही, लेकिन आत्म-परिष्कार की प्रक्रिया से गुजर रही है, ताकि खोई हुई विश्वसनीयता पुन: प्राप्त कर सके। आमीन!

पुनश्च : हाल के समय में मीडिया निदरेष साबित होने तक अपराधी मानने के नियम पर चलता रहा है। मीडिया के जरिये पड़ताल की अवधारणा अब मीडिया के ही गले पड़ गई है। - लेखक सीएनएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं।


भ्रष्ट नहीं भारत Source: प्रीतीश नंदी

घोटाले, घोटाले, घोटाले। जहां देखो, वहां घोटाले। इतने कि अब लोगों का भरोसा ही उठ चला है। लोग हर चीज में अपना भरोसा खोते जा रहे हैं। सत्ता में बैठा हर व्यक्ति जिस तरह हमारे देश को लूट-खसोट रहा है, उससे सभी को तकलीफ पहुंचना स्वाभाविक है, बशर्ते आप सिनिकल व्यक्ति न हों और यह न कहें (जैसा कि कई लोग कहते हैं) कि भ्रष्टाचार ही देश की सबसे बड़ी सरकार है।

देश पर किसी भी सरकार का इतना दबदबा नहीं है, जितना भ्रष्टाचार का है। पिछले सप्ताह आई ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक आजादी के बाद से भारत में अब तक 462 अरब डॉलर की आर्थिक अनियमितताएं हुई हैं, जिनमें से ज्यादातर का कारण था भ्रष्टाचार और घूसखोरी।

मुझे नहीं पता 462 अरब में कितने शून्य होते हैं, लेकिन यह तो तय है कि यह बहुत बड़ा आंकड़ा है। महज 64 करोड़ रुपयों के बोफोर्स घोटाले के लिए हमने राजीव गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल लिया था, अलबत्ता हमें पता था कि भ्रष्टाचार का आंकड़ा इससे ज्यादा है। फिर भी आजकल के घोटालों की तुलना में तो वह कुछ भी नहीं था। कॉमनवेल्थ घोटाला 70 हजार करोड़ से भी ज्यादा का है। 2जी घोटाला 1 लाख 70 हजार करोड़ का है। मैं धीरे-धीरे शून्य की गिनती करना सीख रहा हूं। लेकिन यहां सवाल गणित का नहीं है। यहां सवाल ईमानदारी और निष्ठा का है। क्या हमने ईमानदारी को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है? हाल ही में एक अज्ञात व्यक्ति ने मुझे ट्वीट किया : क्या सभी चोर हैं? मैं भी यही सवाल पूछना चाहता हूं : क्या सभी चोर हैं? मैं उस व्यक्ति के शब्दों को शालीन रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं। उसके वास्तविक शब्द थे : सब साला चोर!

यकीन नहीं होता। मैंने पत्रकारिता की कठिन दुनिया में तीन दशक बिता दिए। इस दौरान हर तरह के वाहियात और बेहूदा लोगों से मेरा आमना-सामना हुआ। फिर भी मुझे इस पर यकीन नहीं होता। मैं नहीं मानता कि भारत भ्रष्ट देश है। मैं नहीं मानता कि हम सभी भ्रष्ट हैं। यह कोई खुशफहमी नहीं है। मेरे इस यकीन की बुनियाद में वे लोग हैं, जिनसे रोज मेरी भेंट होती है। हमारे देश के बहुतेरे लोग ईमानदार और मेहनती हैं। मुश्किल हालात होने के बावजूद वे कड़ी मेहनत करते हैं और अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं। जीडीपी की विकास दर और शेयर बाजार की उछाल से उनके संघर्ष में बहुत अंतर नहीं पड़ता। उनमें से बहुतों के लिए जिंदगी की डगर बड़ी कठिन है। फिर भी वे हमारे सामने साहस, गरिमा और भरोसे की अद्भुत मिसाल हैं।

लेकिन वे निराश होते हैं सत्ता में बैठे कुलीनों से। देश के दस फीसदी उन लोगों से, जिन्होंने लूट की कमाई हथिया ली है। हर जगह इन्हीं डकैतों और लुटेरे सामंतों का दबदबा है और उनका नेटवर्क इतना मजबूत है कि बाकी नब्बे फीसदी लोगों के लिए इस चक्रव्यूह को भेद पाना तकरीबन नामुमकिन है। ये लोग हमारे आसपास ही हैं। ये हर जगह मौजूद हैं। ये ही दस फीसदी लोग सियासत के फैसले लेते हैं, नीतियां बनाते हैं और इनमें से किसी पर आंच आने पर एक-दूसरे को बचाते भी हैं। संरक्षण के सामंती ठिकानों में जिस तरह सभी के हित एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, ठीक उसी तरह इन लोगों का भी एक-दूसरे से गठजोड़ है। जहां कोई गठजोड़ नहीं होता, वहां उनकी मदद करने के लिए पर्याप्त मात्रा में बिचौलिए और दलाल इर्द-गिर्द होते हैं। इसीलिए तो पार्टियां बदल जाती हैं, नेता बदल जाते हैं, वोट देने के तौर-तरीके और दस्तूर बदल जाते हैं, लेकिन भ्रष्टों के गठबंधन को कोई भी तोड़ नहीं पाता। संसद में भले ही वे एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते रहें, लेकिन वे सभी मौसेरे भाई हैं। रंगेहाथों धर लिए जाने के बावजूद वे बच निकलते हैं। उन्हें कभी सजा नहीं सुनाई जाती।

राजनेताओं के हाथ मजबूत करते हैं नौकरशाह, जिनकी खुद की कोई राजनीति नहीं होती। वे पलक झपकते ही पाला बदल लेते हैं। उन्हें खूब अच्छी तरह पता होता है कि सत्ता का केंद्र कहां है और वे उस तरफ रुख करने में जरा भी देर नहीं लगाते। निश्चित ही मैं कई ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों को भी जानता हूं, जो ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ हैं। लेकिन उनमें से अधिकतर को जिंदगी में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। कुछ चुपचाप सहन कर लेते हैं और बेहतर पोस्टिंग या रिटायरमेंट की राह देखते रहते हैं। कुछ राजनीतिक आकाओं की मुखालफत करने का जोखिम उठाते हैं और उसकी भारी कीमत चुकाते हैं।

यही बात व्यापारियों के बारे में भी कही जा सकती है। हमारे बहुतेरे व्यापारी ऐसे हैं, जिन्हें ईमानदारी की मिसाल नहीं कहा जा सकता। लेकिन कुछ अपवाद भी हैं। कई ऐसे मेहनती उद्यमी और पेशेवर हैं, जिन्होंने ऐसी कंपनियां निर्मित की हैं, जो दुनिया की किसी भी कंपनी को टक्कर दे सकती हैं और जिन पर हमें गर्व होता है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि नेताओं और बाबुओं का तंत्र उन्हें समझौते करने पर मजबूर कर देता है। कुछ ऐसे साहसी उद्यमी होते हैं, जो उन्हें ना कहने की ताकत रखते हैं और इसके नतीजे भुगतने को तैयार रहते हैं। बाकी सभी उनकी मांगों को चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं। बहुतेरे डर के मारे अपना पैसा सात समुंदर पार भिजवा देते हैं, क्योंकि उन्हें पता नहीं होता कि अगली चोट कब पड़ने वाली है। इसका नतीजा यह है कि जितना पैसा गैरकानूनी रूप से बाहर भिजवा दिया गया है और विदेशी बैंकों में सुरक्षित है, वह काले धन की अर्थव्यवस्था के 72 फीसदी के बराबर है। यह बहुत बड़ी रकम है।

सभी जानते हैं कि अगर हम यह पैसा वापस ले आएं तो भारत में कोई भी बेरोजगार नहीं होगा, किसी को भूखे नहीं सोना पड़ेगा, किसी को टैक्स भी नहीं चुकाने होंगे और केवल सांसदों ही नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को मुफ्त मेडिकल सुविधाएं और पेंशन मुहैया होंगी। लेकिन यह कभी नहीं होगा। हम पर राज करने वाले दस फीसदी लोगों का यह सारा पैसा विदेशी बैंकों में खुफिया ढंग से बंद रहेगा।

देश के शेष नब्बे फीसदी लोग चाहे कितना ही विरोध-प्रदर्शन करते रहें, लेकिन फिलहाल तो ऐसा कोई रास्ता सूझता नहीं कि हम आगे बढ़कर उन दस फीसदी लोगों तक पहुंचें और उनका वह काला धन उनसे वापस प्राप्त कर लें, जो कि वास्तव में हमारी ही मेहनत की कमाई का पैसा है। जिस पर हमारा अधिकार है। गांधीजी ने हमारे लिए लड़ाई लड़ी और जान दे दी। सुभाषचंद्र बोस और बाकी नेताओं ने भी यही किया। ऐसे में हम चंद लोगों के हाथ में सारी ताकत कैसे सौंप दें और उनसे यह कैसे कह दें कि देश को चाहे जैसे चलाएं। हम इस बेहूदे अहसास के साथ क्यों जीते रहें कि : सब साला चोर!

प्रीतीश नंदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार हैं।

कठघरे में मीडिया Source: मृणाल पाण्डे

खबर देने और सबकी खबर लेने का दावा करने वाला, अपने को जनता का पक्षधर और सबसे तेज, निर्भीक व निष्पक्ष बताने वाला मीडिया राडिया टेपों के प्रकाश में आने के बाद जनता के बीच खुद सवालों के कठघरे में खड़ा है। देर से ही सही, तीन शीर्ष संस्थाओं ने हमपेशा लोगों के साथ इन सामयिक सवालों पर समवेत चर्चा की प्रशंसनीय पहल की।

यह सही है कि गहरी स्पर्धा के युग में ताबड़तोड़ जटिल स्टोरी का पीछा करते हुए एक पत्रकार को हर तरह के लोगों से मिलना होता है। पर दलील दी जा रही है कि पत्रकार अगर दोस्ती का चरका देकर (स्ट्रिंगिंग एलॉन्ग) किसी ऐसे महत्वपूर्ण स्रोत से संपर्क साधे, जो कापरेरेट घरानों का ज्ञात और भरोसेमंद प्रवक्ता तथा राजनीतिक दलों से उनके हित साधन का जरिया भी हो, तो क्या उससे फोन पर बात करना पत्रकार के दागी होने का प्रमाण है?

यह सवाल लचर है। बड़े कापरेरेट घरानों की पीआर एजेंसियां जो तगड़े पीआर बजट के साथ लगातार प्रभावशाली लोगों के संपर्क में रहती हैं, इतनी भोली नहीं होतीं कि वादा करवाने के बाद मुद्दे का पीछा न करें और वादाखिलाफी के बाद भी पत्रकार से संपर्क कायम रखें।

बजट से लेकर सार्वजनिक संसाधनों के आवंटन तक से जुड़ी अहम सरकारी फैसलों की धारा कंपनी के जजमानों के हित में मुड़वाने के लिए कौन नेता, अफसर या दिग्गज पत्रकार मदद देगा, इसकी उनको खूब परख होती है। किस हद तक पीआर वालों से बात की जाए, कहां दूरी बरती जाए, इसके अलिखित नियम भी हर अच्छा पत्रकार जानता है।

कार्यकुशलता तथा हिम्मती रिपोर्टिग के लिए बार-बार सम्मानित जो पत्रकार टेप के लपेटे में आए हैं, इन सच्चाइयों व धंधई लक्ष्मण रेखाओं से अनजान थे, यह असंभव है। बेहतर होता कि बचाव में अपने कॉलम या कार्यक्रमों में जिरह की बजाय वे विनम्रता से मान लेते कि उनसे गलती हुई है और उससे वे सबक लेंगे।

एक पत्रकार ने विवादित पीआर एजेंसी से दोस्ती का अनूठा तर्क दिया कि हर नागरिक अपने विचार साझा करने को स्वतंत्र है। फोन पर अपने संपर्क सूत्र से उन्होंने जो कहा, वह उनका जाती मामला है और उसकी जासूसी या उस पर बंदिश की मांग पत्रकारीय आजादी का हनन होगा।

हमारे संविधान का अनुच्छेद 19 मीडिया ही नहीं, सभी देशवासियों को अभिव्यक्ति की आजादी का हक देता है, पर वह यह नहीं कहता कि आप अमुक चैनल या अखबार के समूह संपादक और कई लाभकारी सूत्रों से संपर्क रखने वाले शख्स हैं तो आपको अभिव्यक्ति या निजता की रक्षा का दूसरों से ज्यादा हक प्राप्त है।

दिक्कत यह है कि आज भी बतौर प्रोफेशन पत्रकारिता का क्षेत्र सीमा-रेखा या परिधिविहीन है। अलबत्ता हम बात ऐसे करते हैं मानो डॉक्टरी या प्रोफेसरी की तरह उसकी प्रोफेशनल सीमाएं स्पष्ट हों और पत्रकार घोड़े पर सवार कल्किनुमा अवतार है जो राज-समाज की बुराइयों को मिटा सकता है।

इसी कारण वे तमाम उम्मीदें जो लोकतंत्र के तीन अन्य पायों (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) से करनी चाहिए थीं, जनता पत्रकारिता जगत के सितारों से पाल बैठी है। जनता की सराहना और उम्मीदभरी निगाहों और स्टूडियो में तालियों के नशे में खुद को विक्रमादित्य समझ बैठने वाले पत्रकार अक्सर अपनी छवि के चक्कर में पेशे की अलिखित मर्यादाएं भूल जाते हैं।

यूं भी नई तकनीकी, आक्रामक आत्मप्रचार तथा तिकड़मी क्षमता के बल पर कुछ महत्वाकांक्षी किंतु अनुभवहीन लोगों को आज कम उम्र में बहुत यश तथा ओहदा मिल जाए तो आत्मस्फीति और लालच बढ़ने का खतरा बनता है। आज भी मीडिया में क्वालिटी कंट्रोल का काम संविधान या सरकार नहीं, वरिष्ठ व अनुभवी पत्रकारों का निजी विवेक, चंद यशविमुख संपादक, संस्थान की साख और सभ्य समाज की मर्यादाएं करा रहे हैं।

हिंदी पत्रकार इन टेपों के दायरे में भले न हों, पर उनके लिए भी यह पीठ थपथपाने की बजाय तटस्थ आत्मपरीक्षण का विषय होना चाहिए। अंग्रेजी में लाभ लोभ की पत्रकारिता बढ़ने के साथ लगातार तकनीकी तथा आर्थिक तौर से समृद्ध बन रही हिंदी में भी चिंताजनक क्षरण आया है।

हिंदी में भी अनेकों अनुभवहीन साइबर पत्रकार या अंशकालिक संवाददाता हैं, जो पत्रकारिता को ऊपरी कमाई का साधन बनाकर आरोपी का पक्ष जाने बिना सिर्फ अफवाहों, निजी खुंदक या न्यस्त स्वार्थो को उपकृत करते हुए बड़े-बड़ों की उम्रभर की साख पर सियाही पोतने का काम कर रहे हैं।

जितना ऊंचा शिकार, उतनी ही उनकी कमाई और उससे भी अधिक आत्मस्फीति कि देखो हमारी ताकत! दुखद यह कि ऐसे पत्रकार चूंकि कलेक्टर से लेकर काबीना मंत्रियों तक निजी संपर्को के बूते समय-समय पर तमाम लोगों को उपकृत कराते रहते हैं, उनके पकड़े जाने पर व्यवस्था के भीतर से उनके गुप्त समर्थकों की जमात रातों-रात उनकी ओट बन जाती है।

इस बार जो चंद जाने-माने पत्रकार यकायक घिरे हैं, उसका श्रेय भी अंग्रेजी-हिंदी मीडिया के किसी लोकपाल या निगरानी संस्था को नहीं जाता। ये टेप कापरेरेट तथा राजनीतिक क्षेत्र के प्रतिस्पर्धी हितों के टकराव के कारण लीक हुए हैं और पूरे कांड की जडें इस अकथित सचाई में हैं कि हिंदी समेत हर भाषा के मीडिया पर इस दशक में राजनीतिक दलों तथा कापरेरेट तत्वों का सीधा कब्जा लगातार बढ़ा है। बाजार की पूंजी से कापरेरेटाइज हो गए मीडिया में अधिक से अधिक पैसा कमाने की इच्छा सवरेपरि है, पाठक का हित नहीं।

दर्शक या पाठक को वरगलाकर माल खरीदवाने को हर तरह के घालमेल आज स्वाभाविक हैं और अधिकतर मामलों में वरिष्ठ पत्रकार अपने संस्थानों की जानकारी के बिना नहीं, उनकी गुप्त या जाहिर सहमति से ही लक्ष्मण रेखाएं तोड़ रहे हैं।

प्रमाण कभी ‘पेड न्यूज’ के रूप में सामने आते हैं, तो कभी संपादकीय पन्नों या स्टूडियो बहसों में किसी व्यक्ति, दल या घराने के खिलाफ या समर्थन में चलाए गए योजनाबद्ध कैंपेन की शक्ल में। इससे चंद संपादक और पत्रकार ही महिमामंडित नहीं हो रहे, उनकी ग्लैमरस सुपर हीरो की छवि बनवाकर उससे बाजार में ब्रांड इमेज चमकाने वाले मीडिया संस्थान भी भरपूर लाभ उठा रहे हैं।

शायद इस बिंदु पर आकर मीडिया को अब अपने लिए खुद एक न्यूनतम आचार संहिता तय करने पर पुनर्विचार करना होगा। इमरजेंसी की कड़वी यादों के चलते मीडिया को ऐसा कोई भी अनुशासनपरक कदम नागवार लगता रहा है, लेकिन दूसरों के खिलाफ जिहादी तेवर दिखाने वाला मीडिया जान ले कि हमारा नया उपभोक्ता खुद भी नई तकनीकी से परिचित है।

मीडिया के घालमेल के खिलाफ यह उपभोक्ता या सिटीजन जर्नलिस्ट बनकर प्रेस काउंसिल, उपभोक्ता अदालत, लोकपाल या महिला आयोग में धड़धड़ाता चला जाएगा। वह सूचना अधिकार का उपयोग कर झूठ को सप्रमाण सूचना प्रसारण मंत्री या प्रतिस्पर्धी अखबार अथवा चैनल को खत या ई-मेल से भेजकर दर्ज कराएगा।

गैरजिम्मेदारी और भ्रष्टाचार के सायों से घिरी पत्रकारिता की साख अब सिर्फ विज्ञापनी रंग-रोगन या दबंगई के बल पर कायम नहीं रखी जा सकती। - (लेख में व्यक्त विचार स्तंभकार के निजी हैं।) - लेखिका जानी-मानी साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं।

विकास का बिहार मॉडल

नीतीश कुमार की नीतियों में सतत, स्थिर और समताकूर्ण विकास की संभावनाएं देख रहे हैं देविंदर शर्मा

विकास का बिहार मॉडल बिहार में नीतीश कुमार दोबारा सत्ता में वापसी करने में सफल रहे। इससे आम लोगों को अपनी बेहतरी के लिए उम्मीद की किरण दिख रही है। पाकिस्तान के पूर्व वित्त मंत्री और जाने-माने अर्थशास्त्री महबूब उल हक ने एक बार मुझसे कहा था कि 1960 में वित्त मंत्री रहते समय वह पाकिस्तान की आर्थिक विकास दर सात प्रतिशत पहंुचाने में समर्थ थे, बावजूद इसके लोगों ने उन्हें हराने के लिए मतदान किया। यह मेरे लिए एक बहुत ही कठोर सबक था। इससे मैंने महसूस किया कि उच्च आर्थिक विकास दर मानव विकास का बेहतर संकेतक नहीं माना जा सकता। महबूब उल हक ने इस रूप में मुझे एक यादगार चीज दी। हमारा यह कहना गलत है कि यदि हम जीडीपी पर ध्यान देंगे तो इससे खुद-ब-खुद हमारी गरीबी भी कम होगी। सच्चाई यह है कि यदि हम गरीबी कम करने पर ध्यान देंगे तो इससे खुद-ब-खुद हमारा आर्थिक विकास भी तेज होगा। नीतीश कुमार ने भी ठीक यही किया। यहां महबूब उल हक की भविष्यवाणी सही साबित हुई और बिहार की जनता ने दोबारा नीतीश को सत्ता में लौटने के लिए मतदान किया। नीतीश ने लोगों पर निवेश किया और लोगों ने उन्हें मतदान के रूप में इसका पुनर्भुगतान किया। नीतीश कुमार की सत्ता में वापसी का वास्तविक कारण 2004 से 2009 के दौरान 11।5 प्रतिशत की विकास दर नहीं थी। अपहरण उद्योग को खत्म कर लोगों के स्वतंत्रता के अधिकार की बहाली इस दिशा में पहला कदम था। इसके साथ-साथ नीतीश ने कई तरह के विकास कार्यो की शुरुआत की। स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिल बांटने और पंचायतों व स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत सीटों का आरक्षण जैसे सोशल इंजीनियरिंग के कामों को उन्होंने पूरा किया। इस तरह बिहार में एक अच्छी नींव रखने के बाद नीतीश कुमार के सामने उनके दूसरे कार्यकाल में नई चुनौतियां हैं, लेकिन यदि और अधिक यथार्थवादी और समग्रता से इन कामों को पूरा करते हैं तो वह देश के लिए एक नया भविष्य गढ़ सकते हैं। निश्चित रूप से बिहार देश के लिए विकास का नया मॉडल बन सकता है। शाइनिंग इंडिया मॉडल के बजाय बिहार के पास एक बड़ा अवसर है, जिससे वह देश को सतत, स्थिर, समतापूर्ण विकास का नया रास्ता दिखा सकता है। दूसरे राजनेताओं से अलग गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों की जरूरतों के प्रति मैं नीतीश कुमार को अधिक विचारवान और संवेदनशील पाता हूं। बिहार चुनाव में बड़ी संख्या में लोगों के समर्थन और जनादेश द्वारा उनकी इसी इच्छा का इजहार दिखता है। एक बार एक संक्षिप्त मुलाकात के दौरान नीतीश कुमार ने वर्षो पहले मुझसे पूछा था कि बिहार में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या के पीछे मेरी नजर में मुख्य कारण क्या है? मेरी उनसे यह बातचीत 2000-01 के दौरान हुई थी, जब वह केंद्रीय कृषि मंत्री थे। यह वह समय था जब किसान बैंक और साहूकारों से लिए गए पैसे न चुका पाने के कारण परेशान थे। उस समय ऋणदाताओं द्वारा पैसे वसूलने के लिए किए जा रहे अपमान के कारण हताश होकर हजारों की संख्या में किसान आत्महत्या करने को विवश हो रहे थे। रिकवरी एजेंट अकसर किसानों के साथ गाली-गलौज करते थे, उनके खेत लिखा लेते थे और ट्रैक्टर आदि सामान उठा ले जाते थे, जिससे किसान पूरे गांव में बेइज्जती के कारण आत्मसम्मान को ठेस पहुंचने से बेहतर मर जाना समझते थे। जब मैंने नीतीश कुमार को इसकी वजह ब्रिटिश राज से चले आ रहे कानूनों का होना बताया तो वह चौंक गए। मैंने उन्हें बताया कि 1904 से 1912 के दौरान ब्रिटिश शासकों ने पब्लिक डिमांड रिकवरी ऐक्ट बनाया था, जिसके तहत सरकार का पैसा न चुका पाने पर किसानों को जेल भेजा जा सकता था। इसके अगले ही दिन सुबह नीतीश ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को इस कानून को खत्म करने की अपील की, क्योंकि तब कृषि राज्य का विषय था। हालांकि राज्य सरकारों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। बिहार का भविष्य भी कृषि पर निर्भर करता है, क्योंकि यहां तकरीबन 81 प्रतिशत आबादी खेती से जुड़ी हुई है। खाद्य उत्पादकता में बिहार अब आत्मनिर्भर है और दुग्ध का अतिरिक्त उत्पादनकर्ता है। इसके बावजूद बीमारू राज्य में एक बड़ी आबादी भूखी रहती है और गरीबी व कु पोषण से त्रस्त है। कृषि और खाद्य सुरक्षा के बीच आज तालमेल बिठाने की आवश्यकता है। कृषि को आर्थिक रूप से लाभप्रद, पारिस्थितिकीय रूप से निर्वहनीय और खाद्य व पोषण की उपलब्धता बनाए बिना किसानों को आत्महत्या से नहीं रोका जा सकता। कृषि क्षेत्र का विकास नक्सलवाद की समस्या को खत्म करने में भी अग्रणी भूमिका निभा सकता है। बिहार में उस हरित क्रांति की धारणा में भी बदलाव लाना होगा, जो मिट्टी को जहरीला बना रही है, पानी को प्रदूषित और वातावरण को दूषित कर रहा है। बिहार में पशुपालन उद्योग के लिए बेहतर संभावनाएं हैं। यहां डेयरी और सूती उद्योग को बढ़ावा दिए जाने से किसानों की समस्याओं को कम किया जा सकता है। इससे लोगों को बड़ी तादाद में यहीं रोजगार मिल सकेगा। बिहार को कृषि विकास का औद्योगिक मॉडल त्यागकर भविष्य को ध्यान में रखते हुए पारिस्थितिक आधार पर कृषि तंत्र अपनाना चाहिए। कृषि क्षेत्र का पुनर्गठन होना चाहिए और समय की कसौटी पर खरी उतरी परंपरागत गोला वितरण प्रणाली लागू करनी चाहिए। इस पद्धति में कृषक समुदाय ही गांव की खाद्यान्न वितरण का नियंत्रण और प्रबंधन करता है। गिर और कंकरेज जैसी उन्नत प्रजातियों के पशुओं के साथ स्थानीय प्रजातियों को क्रॉस ब्रीड करके बिहार पशुपालन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम कर सकता है। डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने से निश्चित तौर पर किसानों को कृषि संकट से निकालने में मदद मिलेगी। रासायनिक खादों के बजाय देसी खाद को बढ़ावा देकर इसे कुटीर उद्योग के रूप में प्रोत्साहित किया जा सकता है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी और ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम होगा। रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद होना चाहिए। बिहार आंध्र प्रदेश के कीटनाशकरहित प्रबंधन से सीख ले सकता है। आंध्र प्रदेश में 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में किसी भी प्रकार के रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है और फिर भी वहां पैदावर की दर उच्च है। उत्साहित आंध्र प्रदेश अब करीब एक करोड़ हेक्टेयर में इस प्रयोग को बढ़ाना चाहता है। नीतीश कुमार के पास इतिहास बनाने और दुनिया को विकास का सही अर्थ समझाने का अवसर है। (लेखक कृषि नीतियों के विश्लेषक हैं)
साभार:-दैनिक जागरण ०८-१२-२०१०

Tuesday, December 7, 2010

भ्रष्ट तत्वों की समानांतर सत्ता

भ्रष्ट नेताओं, नौकरशाहों और उद्यमियों की साठगांठ को संक्रग सरकार से संरक्षण मिलता देख रहे हैं राजीव सचान

प्रधानमंत्री नरसिंह राव के कार्यकाल में राजनीति के अपराधीकरण की गंभीरता का पता लगाने के लिए एनएन वोहरा की मध्यस्थता में गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भ्रष्ट नेताओं, नौकरशाहों और माफिया सरगनाओं में साठगांठ कायम हो गई है। इस रिपोर्ट के अनुसार इस गठजोड़ ने अनेक हिस्सों में समानांतर सत्ता सी कायम कर ली है। जब यह रिपोर्ट संसद में पेश की गई तो पक्ष-विपक्ष के नेताओं ने ऐसा आभास कराया जैसे उनकी आंखें खुल गई हैं, लेकिन खुली-खुली सी नजर आने वाली वे आंखें वस्तुत: कभी नहीं खुलीं। इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले एनएन वोहरा आज जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल हैं और तबके वित्तमंत्री मनमोहन सिंह इस समय प्रधानमंत्री पद पर आसीन हैं। किसी को यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि मनमोहन सिंह राजनीति के अपराधीकरण की गंभीरता समझना चाहेंगे और इसके लिए किसी समिति का गठन करेंगे। वस्तुत: अब ऐसी किसी समिति के गठन की आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि हाल के घोटालों ने यह उजागर कर दिया है कि देश में भ्रष्ट नेताओं, नौकरशाहों और उद्यमियों की जबरदस्त साठगांठ कायम हो गई है। वे केंद्रीय सत्ता की नाक के नीचे अरबों की हेराफेरी करने में कामयाब हो जाते हैं और सरकार को इसकी भनक तक नहीं लगती। लगती भी है तो वह चेतने से इनकार करती है। कारपोरेट लाबिस्ट नीरा राडिया के सार्वजनिक हुए टेप बहुत कुछ उजागर करने के साथ यह भी बता रहे हैं कि इस तिकड़ी की चौथी कड़ी के रूप में पत्रकारों की एक जमात भी है। राडिया के टेप यह संकेत भी देते हैं कि सत्ता की असली ताकत तो उनके पास थी। वह बड़े से बड़ा काम कराने में समर्थ थीं। नेताओं को मनचाहा मंत्रालय दिलवाना और उद्यमियों की मुरादें पूरी करना उनके लिए बाएं हाथ का खेल था। अब यह भी स्पष्ट है कि भ्रष्ट नेताओं-नौकरशाहों और उद्यमियों का गठजोड़ भ्रष्ट नेताओं-नौकरशाहों और माफिया तत्वों की साठगांठ से कहीं घातक है। यह नया गठजोड़ कितना जनविरोधी है, इसकी एक बानगी दिल्ली के कुछ निजी स्कूलों के खातों की जांच करने वाली कैग की वह रिपोर्ट बयान करती है जिसके अनुसार इन नामचीन स्कूलों ने अच्छा-खासा कोष होने के बावजूद छठवें वेतन आयोग की सिफारिशों का भार बेचारे अभिभावकों पर डाल दिया और बढ़ी फीस से ऐशो-आराम के साधन जुटाए। कुछ स्कूलों ने तो बढ़ी फीस से बीएमडब्लू सरीखी महंगी कारें खरीदने में भी संकोच नहीं किया। कुछ स्कूलों ने फर्जी कर्मचारियों की सूची तक तैयार की ताकि बढ़ी हुई फीस आसानी से हजम की जा सके। इन स्कूलों की ही तरह एक बानगी दिल्ली के उन अस्पतालों ने भी पेश की थी जिन्हें दिल्ली हाईकोर्ट ने यह निर्देश दिया था कि वे अपने वायदे के मुताबिक गरीबों का मुफ्त इलाज करें। इसके जवाब में कुछ अस्पतालों ने बेशर्मी के साथ कहा कि हम ऐसा नहीं करेंगे, सरकार चाहे तो हमें दी गई जमीन की कीमत बाजार दर के हिसाब से ले ले। स्पेक्ट्रम घोटाला निजी क्षेत्र की लूट की एक बड़ी बानगी है। चूंकि इस लूट के समक्ष प्रधानमंत्री भी असहाय नजर आए और उनकी ईमानदारी धरी रह गई इसलिए इस नतीजे पर पहुंचने के अलावा और कोई उपाय नहीं कि उदारीकरण के दौर में निजी क्षेत्र में एक ऐसा वर्ग भी उभर आया है जो भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों के जरिये देश को लूटने में लगा हुआ है। शर्मनाक यह है कि ऐसा उस दल के शासनकाल में हो रहा है जो कहता है कि हमारा हाथ आम आदमी के साथ है। भ्रष्ट नेताओं, नौकरशाहों और उद्यमियों की तिकड़ी की ओर से कायम की गई समानांतर सत्ता इतनी ताकतवर है कि उसके हितों की रक्षा के लिए सरकार अपने नीतिगत फैसले तक बदल देती है। आखिर स्पेक्ट्रम घोटाला यही तो बता रहा है कि ए। राजा की मनमानी पर प्रधानमंत्री भी अंकुश नहीं लगा सके। उच्चतम न्यायालय के आकलन से यहां तक स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री की आपत्तियों को राजा ने बेअदबी के साथ दरकिनार कर दिया। इससे भी दयनीय यह है कि जब राजा की मनमानी को लेकर शोर मचा तो खुद प्रधानमंत्री ने उन्हें क्लीनचिट दे दी। इस पर भी गौर करें कि ईमानदार छवि वाले प्रधानमंत्री को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के रूप में दागदार पीजे थॉमस ही मिले। हालांकि कांग्रेस यह जान रही है कि थॉमस के कारण उसकी रही-सही प्रतिष्ठा जा रही है, लेकिन वह उन्हें पद छोड़ने का निर्देश देने का साहस नहीं जुटा पा रही है। एक अभियुक्त सीवीसी की कुर्सी पर विराजमान है और फिर भी कांग्रेसी एक तरह से संसद की छत पर चढ़कर हल्ला मचा रहे हैं कि हम बाकी दलों से ईमानदार हैं। ऐसा हल्ला और जोर से शोर मचाने के लिए कांग्रेस ने प्रवक्ताओं की संख्या बढ़ा दी है। वे अपने कुतर्को के जरिये यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए जेपीसी गठित करना गुनाह क्यों है? क्या किसी को इसमें संदेह है कि कांग्रेस का अहंकार उसके सिर चढ़कर बोल रहा है? (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)
साभार:-दैनिक जागरण ०७-१२-२०१०

सेक्युलर आतंकवाद

कांग्रेस पर राजनीतिक नैतिकता और शुचिता को ताक पर रख देने का आरोप लगा रहे हैं बलबीर पुंज

सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बावजूद 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सरकार मौन है। घोटाले की संयुक्त संसदीय दल से जांच कराने की मांग सरकार द्वारा ठुकराए जाने से संसद ठप है। वहीं सर्वोच्च न्यायालय की आपत्ति के बावजूद मुख्य सतर्कता आयुक्त पी।जे. थॉमस अपने पद पर बने हुए हैं। दूरसंचार मंत्रालय में सचिव रहे थॉमस घोटाले के सहभागी या मूकदर्शक हैं या नहीं, उससे महत्वपूर्ण बात यह है कि घोटाले की जांच कर रही सीबीआई के निगहबान बने रहने का उन्हें नैतिक अधिकार कतई नहीं है। उस पर तुर्रा यह है कि सरकार शीर्ष स्तर पर पारदर्शिता और शुचिता होने का दावा करती है। कांग्रेस विपक्षी दलों के विरोध को अनावश्यक हड़बोंग बताकर मामले को हलका साबित करना चाहती है। कांग्रेस के प्रवक्ता संपूर्ण विपक्ष को माओवादियों का एजेंट बताते हैं। अभी कुछ समय पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक केएस सुदर्शन की एक अवांछित टिप्पणी को लेकर कांग्रेस सहित सेक्युलर मीडिया ने सार्वजनिक जीवन में संयम और मर्यादा का प्रश्न खड़ा किया था, किंतु आश्चर्य है कि कांग्रेसी प्रवक्ता की इस अमर्यादित टिप्पणी पर वे मौन हैं। क्यों? कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर की गई टिप्पणी संघ परंपरा के खिलाफ थी। इसी कारण संघ और भाजपा ने उससे दूरी बनाने में देर नहीं की, परंतु क्या सार्वजनिक जीवन में संवाद की मर्यादा बनाए रखने की जवाबदेही से कांग्रेस और सेक्युलर परिवार के अन्य सदस्य मुक्त हैं? क्या एकतरफा संयम से सार्वजनिक जीवन में संवाद की गरिमा को सुरक्षित रखा जा सकता है? कांग्रेस के प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री राहुल गांधी ने कुछ दिन पूर्व संघ को आइएसआइ संचालित सिमी के समकक्ष बताया। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने संघ की तुलना लश्करे-तैयबा से की। संघ की तुलना सिमी या लश्करे-तैयबा से करने और भाजपा सहित सभी विपक्षी दलों को माओवादियों का एजेंट कहने पर क्या सार्वजनिक जीवन की मर्यादाएं नहीं टूटतीं? यह दोहरापन क्यों? वस्तुत: सत्ता तंत्र के दम पर विपक्ष का दमन करना कांग्रेस का इतिहास रहा है। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आपातकाल का दौर एक काला अध्याय है। उस दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण सहित जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं को राजद्रोही बताया गया था। जयप्रकाश नारायण सहित विपक्ष के तमाम नेता और संघ के कार्यकर्ता जेल में बंद कर दिए गए थे। इतिहास गवाह है कि जब-जब निरंकुशवादी कांग्रेस को अपनी कुर्सी खतरे में दिखी है, उसने राष्ट्रहित को ताक पर रख अवसरवादी राजनीति का सहारा लिया और राष्ट्रवादी तत्वों को हाशिए पर डालने के लिए उन पर मिथ्या आरोप लगाए। महात्मा गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के लिए आज भी संघ को समय-समय पर कलंकित किया जाता है। उनकी हत्या के बाद गठित न्यायिक आयोगों और न्यायपालिका ने संघ को बेदाग बताया, किंतु उनकी हत्या के 62 साल बीत जाने के बाद भी कांग्रेस के पदाधिकारी संघ पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाते हैं। गुजरात की जनता पिछले तीन विधानसभा चुनावों में बार-बार राज्य की कमान नरेंद्र मोदी को सौंपती आ रही है, किंतु कांग्रेस समेत सेक्युलर दल उन्हें मौत का सौदागर पुकारते हैं। नरेंद्र मोदी का चरित्र हनन करने के लिए स्वयंभू मानवाधिकार संगठनों का वित्त और वृत्ति पोषण सेक्युलरिस्ट करते हैं। क्यों? नरेंद्र मोदी के खिलाफ चलाए गए दुष्प्रचार अभियान की वीभत्सता पिछले कुछ समय से सामने आने लगी है। सेक्युलर कहलाने वाले मानवाधिकारियों और राजनीतिक गिद्धों के दुष्प्रचार के बाद गोधरा नरसंहार की प्रतिक्रिया में भड़के गुजरात दंगों की कथित निष्पक्ष जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (एसआइटी) ने नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी है। एसआइटी ने गुलबर्ग दंगा मामले में मुख्यमंत्री या उनके कार्यालय के संलिप्त होने से साफ इंकार कर दिया है। दंगे में मारे गए कांग्रेसी सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी ने हालांकि अपने बयान में मुख्यमंत्री के शामिल होने की बात नहीं की थी, किंतु दंगा पीडि़तों के नाम पर राजनीतिक दलों के वैरशोधन अभियान में शामिल सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ की ओर से न्यायालय में दाखिल शपथनामे में यह आरोप लगाया गया था कि सांसद की पत्नी के लाख अनुनय-विनय के बावजूद मुख्यमंत्री और उनका कार्यालय तटस्थ बना रहा और उनके समर्थन से स्थानीय प्रशासन ने बलवाइयों को खुली छूट दी। जून, 2003 में जब वड़ोदरा की अदालत ने बेस्ट बेकरी कांड के आरोपियों को बरी कर दिया था, तभी से सेक्युलर राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता मुख्य गवाहों को बरगलाकर झूठ के दम पर गुजरात सरकार और नरेंद्र मोदी को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करते आ रहे हैं। तीस्ता सीतलवाड़ के संरक्षण में उक्त फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई गई। सर्वोच्च न्यायालय ने तब मामले की सुनवाई गुजरात से बाहर करने का आदेश दिया था, किंतु इसके थोड़े ही दिनों बाद स्वयं बेस्ट बेकरी की जाहिरा ने तीस्ता सीतलवाड़ पर अपहरण और मानसिक दबाव डालने का आरोप लगाया था, बावजूद इसके सेक्युलरिस्टों का तीस्ता प्रेम टूटा नहीं। गुजरात दंगों की जांच कर रहे विशेष जांच दल के प्रमुख और सीबीआई के तत्कालीन संयुक्त निदेशक ने तीस्ता की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्ति दर्ज करते हुए अदालत को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि वादी द्वारा लगाए गए वीभत्स आरोप (एक गर्भवती मुस्लिम महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म के बाद तलवार से उसका पेट चीर डाला गया) झूठे हैं। इन सबके बावजूद नरेंद्र मोदी और भाजपा को कलंकित करने की मुहिम बंद नहीं हुई। सेक्युलरिस्टों के उत्साहव‌र्द्धन में काम कर रहीं तीस्ता सीतलवाड़ को गुजरात दंगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने का दोषी पाया गया है, जिस पर अदालत ने गहरी नाराजगी व्यक्त की है। गवाहों की सुरक्षा के संबंध में विशेष जांच दल को लिखी अपनी चिट्ठी की एक प्रति तीस्ता ने जिनेवा स्थित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन को भी भेजी है। क्या तीस्ता को गुजरात की न्यायपालिका के बाद अब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित विशेष जांच दल पर भी भरोसा नहीं रहा? कहीं इसका कारण यह तो नहीं कि उनका झूठा अभियान अब जनता के सामने नंगा होने लगा है? राजनीतिक वैरशोधन के लिए ऐसे संगठनों के दुष्प्रचार और ओछे हथकंडों को पोषित करना कांग्रेस का सेक्युलर आतंकवाद नहीं तो और क्या है? (लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)
साभार:-दैनिक जागरण 07-१२-२०१०