Sunday, February 5, 2012

एक और झटका

भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे लोकसेवकों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई व्यवस्था यही बताती है कि अभी भ्रष्ट अधिकारी किसी न किसी स्तर पर संरक्षण पा रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल यह स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत शिकायत दर्ज कराना किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, बल्कि लोकसेवकों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति संबंधी निर्णय को एक समय सीमा में भी बांध दिया। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि शीर्ष अदालत ने यह साफ किया कि यदि अधिकतम चार माह की समय सीमा के अंदर मुकदमे की अनुमति का फैसला नहीं होता तो यह माना जाएगा कि अनुमति मिल गई है। इस फैसले का महत्व इसलिए है, क्योंकि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे ऐसे अधिकारियों की संख्या बढ़ती जा रही है जिनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की अनुमति नहीं मिलती। कुछ मामलों में तो केंद्रीय सतर्कता आयोग और केंद्रीय जांच ब्यूरो के अनुरोध के बावजूद उन अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी जाती जो प्रथमदृष्ट्या भ्रष्टाचार में लिप्त नजर आ रहे होते हैं। यह निराशाजनक है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में इसलिए दखल देना पड़ा, क्योंकि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में पूर्व केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए.राजा के खिलाफ मुकदमे की मंजूरी के लिए दिए गए सुब्रमण्यम स्वामी के आवेदन का प्रधानमंत्री ने 16 महीने तक जवाब नहीं दिया। इससे भी निराशाजनक यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री कार्यालय को इसके लिए दोषी ठहराया कि उसने प्रधानमंत्री के पास भेजे गए राजा के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देने संबंधी आवेदन को रोके रखा। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर सरकार की प्रतिक्रिया कुछ भी हो, प्रधानमंत्री कार्यालय पर प्रतिकूल टिप्पणी कोई अच्छी स्थिति नहीं। भले ही सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अपने लिए कोई झटका मानने से इंकार कर रही हो, लेकिन सच्चाई यही है कि शीर्ष अदालत ने एक बार फिर उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया है और इसके लिए वही जिम्मेदार है। इस पर संतोष नहीं किया जा सकता कि 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले के लिए जिम्मेदार ए. राजा जेल में हैं, क्योंकि यह तथ्य अपनी जगह मजबूत है कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी 16 महीने बाद भी नहीं दी गई और केंद्रीय सत्ता तब हरकत में आई जब सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री कार्यालय के रवैये की आलोचना की। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केंद्रीय सत्ता के उन दावों को कमजोर करने वाला है जिसके तहत यह कहा जाता है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के लिए प्रतिबद्ध है। यदि वास्तव में ऐसा है तो फिर क्या कारण है कि विभिन्न केंद्रीय मंत्रालय चालीस से अधिक शीर्ष नौकरशाहों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देने में आनाकानी कर रहे हैं और वह भी तब जब केंद्रीय सतर्कता आयोग इसके लिए चिट्ठी जारी करने में लगा हुआ है? सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह संसद को यह सुझाव दिया कि उसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 में संशोधन पर विचार करना चाहिए उससे आम जनता को यही संदेश जा रहा है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के मामले में संसद को जो कुछ करना चाहिए वह नहीं हो पा रहा है। इस संदर्भ में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि संसद देश को वचन देने के बावजूद लोकपाल विधेयक पारित करने में असफल रही।
साभार:-दैनिक जागरण

दांव पर राहुल की प्रतिष्ठा

उत्तर प्रदेश में अपने खोए हुए आधार को पाने के लिए कांग्रेस को जातिवाद व पंथिक आरक्षण के नए प्रयोग करता देख रहे हैं प्रदीप सिंह
कांग्रेस उत्तर प्रदेश में एक साथ दो लड़ाइयां लड़ रही है। प्रदेश में पार्टी को पुनर्जीवित करने की चुनौती तो है ही, कांग्रेस को केंद्र में अपनी सरकार का राज 2014 तक निष्कंटक (क्योंकि ममता बनर्जी से उसके संबंधों में कड़वाहट बढ़ती जा रही है) बनाने के लिए एक सहयोगी की भी जरूरत है। मौजूदा लोकसभा में यह सहयोगी उसे उत्तर प्रदेश से ही मिल सकता है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने राहुल गांधी की प्रतिष्ठा को दांव पर लगा दिया है। कांग्रेसी कुछ भी कहें पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार की बात सही है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अच्छा करेगी तो उसका श्रेय राहुल को मिलेगा और बुरा करेगी तो उसका दोष भी उन्हीं के मत्थे मढ़ा जाएगा। केंद्र में सत्ता में बने रहने के लिए उत्तर प्रदेश का दरवाजा खोलने के अलावा कांग्रेस के पास कोई विकल्प नहीं है। प्रदेश में मंडल और कमंडल की राजनीति के दौर में हाशिए पर पहुंच गई कांग्रेस ने इस चुनाव में कई नए प्रयोग किए हैं। उसने मान लिया है कि पिछले दो दशकों में राज्य में पार्टी का जो नेतृत्व रहा है उससे कुछ होने वाला नहीं है। इसलिए राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह के बाद चुनाव की कमान बेनी प्रसाद वर्मा और पीएल पुनिया के हवाले है। टिकट बंटवारे में इन दोनों नेताओं की सबसे ज्यादा चली है। उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग कभी कांग्रेस का समर्थक नहीं रहा है। दलित, ब्राह्मण और मुसलमान कांग्रेस के जनाधार की धुरी रहे हैं। दलित बहुजन समाज पार्टी के साथ चले गए, मुसलमान समाजवादी पार्टी के साथ और ब्राह्मण अयोध्या आंदोलन के दौर में भारतीय जनता पार्टी के साथ चले गए। राहुल गांधी का दलितों के घर में जाना और खाना, मायावती से अपने पुराने दलित जनाधार को वापस हासिल करने की कोशिश थी। उससे कांग्रेस को दलितों का वोट इस विधानसभा चुनाव में मिलेगा ऐसे कोई संकेत तो अभी दिखाई नहीं दे रहे पर राहुल गांधी के इस कदम से इतना जरूर हुआ कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में चुनावी चर्चा में आ गई। कांग्रेस को भी पता है कि दलित वोट इतनी आसानी से बसपा से नहीं टूटने वाला है। मुसलमान कांग्रेस के साथ फिर से जुड़ सकता है इसका संकेत 2009 के लोकसभा चुनाव में मिल गया था। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटों में बढ़ोतरी में मुस्लिम मतदाताओं का काफी योगदान था। पर 2009 से दो चीजें बदल गई हैं। एक यह विधानसभा चुनाव है जहां कांग्रेस सरकार बनाने की हालत में नहीं है। दूसरे कल्याण सिंह को लेने के कारण 2007 में मुसलमान मुलायम सिंह यादव से नाराज हो गया था। वह नाराजगी अब नहीं है। इसीलिए राहुल गांधी और कांग्रेस के सबसे तीखे हमले समाजवादी पार्टी पर हो रहे हैं। यह जानते हुए भी कि चुनाव के बाद कांग्रेस को समाजवादी पार्टी के साथ ही बैठना होगा। यह भी कि केंद्र सरकार को जिस सहारे की जरूरत है वह मुलायम सिंह ही दे सकते हैं। इसके बावजूद कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में पिछड़ों के कोटे से मुसलमानों को नौ फीसदी की बात नहीं कही है, क्योंकि समाजवादी पार्टी ने मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण देने का वादा किया है। कांग्रेस ने भी सपा की आलोचना से बचने और मुसलमानों को लुभाने के लिए आबादी के अनुपात में आरक्षण देने का वादा किया है। समाजवादी पार्टी से मुसलमानों को तोड़ने के लिए कांग्रेस किसी भी हद तक जाने को तैयार है। बुनकरों के लिए पैकेज और आजमगढ़ में बाटला हाउस का मामला उठाने जैसे कदमों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में जो कुछ कहा है उससे दो स्पष्ट संकेत मिलते हैं। एक कांग्रेस अब खुले तौर पर जातीय राजनीति में उतरने को तैयार है। दलितों और पिछड़ों के आरक्षण के कोटे के अंदर अति दलितों और अति पिछड़ों को अलग कोटा देने के नीतीश कुमार के सफल प्रयोग को वह अपनाने को तैयार है। जातीय समीकरणों का संतुलन और विकास चुनाव जीतने का नया मंत्र है। कम से कम उत्तर प्रदेश और बिहार में तो ऐसा ही लगता है। उत्तर प्रदेश में इस बार चारो बड़ी पार्टियों की नजर गैर यादव पिछड़ी जातियों पर है। विकास की बात सब पार्टियां भले ही कर रही हों पर किसी के पास नीतीश कुमार की तरह दिखाने के लिए विकास का काम नहीं है। कांग्रेस के पास एक वास्तविक बहाना है कि पिछले दो दशक से मतदाता ने उसे मौका ही नहीं दिया। इसीलिए राहुल गांधी अपनी चुनाव सभाओं में दावा कर रहे हैं कि पांच साल में हम उत्तर प्रदेश की तस्वीर बदल देंगे। चालीस साल में उनकी पार्टी यह क्यों नहीं कर पाई इसका जवाब भले ही उनके पास न हो पर जातीय राजनीति का जवाब उनके पास है। पिछड़ी जातियां परंपरागत रूप से कभी कांग्रेस की समर्थक नहीं रही हैं। पिछड़ी जातियां राम मनोहर लोहिया के पिछड़े पावें सौ में साठ के नारे के समय से ही कांग्रेस विरोधी राजनीति की धुरी रही हैं। लेकिन कांग्रेस ने पहली बार उत्तर प्रदेश में इन जातियों पर बड़ा दांव खेला है। इसमें किसी को शक रहा हो तो वह मंगलवार को लखनऊ में पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र जारी करने के कार्यक्रम से दूर हो जाना चाहिए। आधुनिक तकनीकि के पुरोधा सैम पित्रोदा की जाति कांग्रेस ने देश बताने का काम किया है। पित्रोदा कांग्रेस के नेता नहीं है, उत्तर प्रदेश के भी नहीं है, लेकिन भला जातीय राजनीति का देश में संचार क्रांति के जनक के रूप में उनकी पहचान पर उनकी जाति हावी हो गई है। कांग्रेस यह काम बेनी प्रसाद वर्मा के जरिए नहीं कर पा रही थी। उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ी जातियां एक नए चुनावी सत्ता केंद्र के रूप में उभर रही हैं। इसका श्रेय मायावती को दिया जाना चाहिए। भाजपा में कल्याण सिंह इस वर्ग के चैंपियन माने जाते थे। अपने मुख्य मंत्रित्वकाल में राजनाथ सिंह ने इन जातियों की एक त्वरित जनगणना कराई थी और उनके लिए पिछड़ा वर्ग के कोटे में अलग कोटा देने का वादा किया था। समाजवादी पार्टी इस वर्ग के समर्थन के बूते सत्ता में आती रही है। पर समाजवादी पार्टी में यादव वर्चस्व से यह वर्ग असंतुष्ट था। इस वर्ग को सत्ता में हिस्सेदारी किसी पार्टी ने नहीं दिलाई। यह काम किया मायावती ने। उत्तर प्रदेश में कुशवाहा, सैनी, राजभर और पाल इतनी बड़ी संख्या में मंत्री कभी नहीं रहे। उत्तर प्रदेश का मतदाता तय करेगा कि राहुल गांधी के भविष्य की राजनीति की राह क्या होगी। उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे नए राजनीतिक ध्रुवीकरण का रास्ता भी खोलेंगे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

सच का सामना

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला केंद्रीय सत्ता के लिए एक और शर्मिदगी का क्षण है। यह महज दुर्योग नहीं हो सकता कि उसके सामने ऐसे क्षण बार-बार आ रहे हैं। अभी दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री कार्यालय को कठघरे में खड़ा किया था। खास बात यह है कि उस फैसले के केंद्र में भी पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा ही थे और ताजा फैसले में भी। 2जी स्पेक्ट्रम के सभी 122 लाइसेंस अवैध करार देकर उन्हें रद करने के शीर्ष अदालत के फैसले ने यह साबित कर दिया कि जब घोटालेबाज ए.राजा कुछ कारपोरेट घरानों से मिलकर मनमानी करने में लगे हुए थे तब केंद्रीय सत्ता सोई हुई थी। दुख, क्षोभ और लज्जा की बात यह रही कि जब उसे झकझोर कर इस महाघोटाले से अवगत कराया गया तो उसने शुतुरमुर्गी आचरण का परिचय दिया। इतना ही नहीं उसकी ओर से हरसंभव तरीके से राजा का बचाव करने की भी कोशिश की गई। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण समय वह था जब खुद प्रधानमंत्री ने राजा को क्लीनचिट देते हुए किसी तरह के घोटाले से इंकार किया। इसके बाद जब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने घोटाले पर मुहर लगा दी तो सच को स्वीकार करने के बजाय इस संवैधानिक संस्था की ही खिल्ली उड़ाने का काम किया गया। यह काम सरकार ने भी किया और उसका नेतृत्व करने वाली कांग्रेस ने भी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बुरी तरह शर्मसार सरकार के पास अपनी सफाई में कहने के लिए कुछ भी नहीं है, लेकिन वह अभी भी खुद के सही होने और अपनी सेहत पर फर्क न पड़ने का दंभ भर रही है। इससे तो यही लगता है कि उसने यह ठान लिया है कि कुछ भी हो जाए वह सच का सामना करने के लिए तैयार नहीं होगी। यह और कुछ नहीं बची-खुची साख गंवाने का सुनिश्चित रास्ता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सारी गलती राजा पर थोपने के साथ ही स्पेक्ट्रम आवंटन की गलत नीति बनाने के लिए जिस तरह भाजपा से माफी मांगने के लिए कहा गया वह हास्यास्पद भी है और केंद्रीय सत्ता के अहंकारी रवैये का नमूना। केंद्र सरकार जानबूझकर इस तथ्य की अनदेखी कर रही है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पेक्ट्रम आवंटन के मामले में राजग सरकार की पहले आओ पहले पाओ नीति को त्रुटिपूर्ण करार देने के बावजूद संप्रग सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि 2008 के पहले के लाइसेंस भी खारिज किए जाने चाहिए। यह समझना कठिन है कि केंद्र सरकार ने बदली हुई परिस्थितियों में स्पेक्ट्रम आवंटन की नीति को दुरुस्त करने की जरूरत क्यों नहीं समझी और वह भी तब जब इसकी मांग भी की जा रही थी? क्या राजग शासन द्वारा तय की गई नीति कोई पत्थर की लकीर थी? मौजूदा दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल की मानें तो सारी गड़बड़ी राजा ने की। उन्होंने ही रातोंरात नियम बदले और जब वह ऐसा कर रहे थे तो न तो वित्तमंत्री पर उनका कोई जोर चल रहा था और न ही प्रधानमंत्री पर। क्या यह कहने की कोशिश की जा रही है कि दूरसंचार मंत्री के रूप में राजा प्रधानमंत्री और कैबिनेट से भी अधिक शक्तिशाली थे? नि:संदेह ये कुतर्क सच्चाई स्वीकार करने से बचने के लिए दिए जा रहे हैं। आखिर केंद्र सरकार और उसके रणनीतिकारों को अपनी भूल स्वीकार करने में संकोच क्यों हो रहा है?
साभार:-दैनिक जागरण

सामूहिक विफलता पर मुहर

2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को एक नजीर के रूप में देख रहे हैं सुभाष कश्यप

2जी मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला दूरगामी प्रभाव वाला है और यह सरकार के साथ-साथ देश व संसद के लिए एक संदेश है कि अब भ्रष्टाचार को और अधिक सहन नहीं किया जा सकता। यहां इस बात को भी समझना जरूरी है कि फैसले को ए. राजा के खिलाफ दिया गया निर्णय नहीं माना जा सकता, क्योंकि उनका मामला अभी भी विचाराधीन है और उस पर अलग से फैसला आना है, लेकिन जिस तरह 122 स्पेक्ट्रम लाइसेंस को रद्द करने का आदेश अदालत ने दिया है उससे साफ है कि स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही है और इसमें घोटाला हुआ है। इसमें कितने का घोटाला हुआ और कौन-कौन दोषी है, यह एक अलग मसला है, लेकिन इस घोटाले के लिए संप्रग सरकार की सामूहिक विफलता को इंगित करना सर्वोच्च न्यायालय नहीं भूला। इसका आशय है कि घोटाले के लिए पूरी सरकार जिम्मेदार है और वह अपने आपको इससे अलग नहीं कर सकती। अभी तक सरकार यही दिखाने और बताने की कोशिश करती रही है कि यह घोटाला उसके एक राजनीतिक घटक दल के कारण एक मंत्रालय विशेष में हुआ है, जिसके लिए वह जिम्मेदार नहीं है। यहां सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दूसरा आयाम गृह मंत्री पी. चिदंबरम से जुड़ा हुआ है, जिसमें अदालत ने फिलहाल उन्हें राहत दी है, लेकिन यह राहत ज्यादा लंबी नहीं है, क्योंकि उन पर भी जल्द ही फैसला आने वाला है। पी. चिदंबरम के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उन पर ट्रायल कोर्ट में मुकदमा चल रहा है इसलिए फिलहाल कोई निर्णय देना ठीक नहीं होगा। इसी तरह तरह सुप्रीम कोर्ट ने 2जी मामले की जांच के लिए एसआइटी यानी विशेष जांच दल का गठन किए जाने की बात स्वीकार नहीं की और यह निर्देश दिया कि सीवीसी यानी केंद्रीय सतर्कता आयोग की सक्रिय निगरानी में सीबीआइ मामले की जांच करे। ऐसा कहने के पीछे भाव यही है कि विभिन्न संस्थाओं के अस्तित्व और उनके अधिकारों को महत्व दिया जाना चाहिए और उनकी रक्षा की जानी चाहिए ताकि नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था बनी रहे। यदि सुप्रीम कोर्ट एसआइटी के गठन का फैसला देती तो इससे एक गलत नजीर कायम होती और दूसरी लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति उसका अविश्वास झलकता, जो किसी के लिए भी ठीक नहीं माना जा सकता। कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला जहां सरकार की कार्यप्रणाली और उसकी मंशा पर सवाल खड़े करने वाला है वहीं यह प्रधानमंत्री को एक तरह से राहत देने वाला भी है। ऐसा इसलिए, क्योंकि सरकार की सामूहिक विफलता की बात कहकर सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री के प्रति नरम रवैया अपना लिया। यह कहा जाना ठीक नहीं होगा कि प्रधानमंत्री को पीएमओ और मंत्रालय की तरफ से सही रिपोर्टिग नहीं की गई, जिसके कारण यह घोटाला संभव हो पाया। संविधान में मंत्रालयों के कामकाज और उनमें किसी तरह की अनियमितता के लिए अंतिम रूप से प्रधानमंत्री को जिम्मेदार बताया गया है और एक राजनीतिक प्रमुख के रूप में वह मंत्रिमंडल समेत संसद के प्रति जवाबदेह हैं। इसलिए यहां सरकार का मुखिया होने के नाते सीधे-सीधे प्रधानमंत्री पर आरोप आता है और इसके लिए वह पीएमओ अथवा किसी अन्य पर अपनी जिम्मेदारी नहीं डाल सकते। यहां हम नहीं भूल सकते कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय में प्रधानमंत्री कार्यालय जैसी कोई संस्था नहीं थी और न ही संविधान में इसका कहीं कोई उल्लेख किया गया है। यह तो प्रधानमंत्री ने अपनी सुविधा के लिए और कामकाज को व्यवस्थित करने के लिए बना रखा है, इसलिए पीएमओ को प्रधानमंत्री की रक्षा के लिए ढाल के तौर पर नहीं इस्तेमाल किया जा सकता। यदि ऐसा होता है तो आने वाले समय में मंत्री अपने सचिव और सचिव अपने अधीनस्थों पर अपनी जिम्मेदारी थोपना शुरू कर देंगे और अंत में जिम्मेदारी सबसे निचले स्तर के कर्मचारी यानी बाबू की होगी। क्या एक लोकतांत्रिक देश में इस तरह की परंपरा को स्वीकार किया जा सकता है और यदि हां तो फिर भविष्य में किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी और सभी स्तरों पर एक तरह की अराजकता उत्पन्न हो जाएगी, जिसमें पदानुक्रम का कोई महत्व नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आर्थिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। स्पेक्ट्रम लाइसेंस रद्द किए जाने से लाइसेंस हासिल करने वाले उद्यमियों को जहां तगड़ा झटका लगा है वहीं सरकार की छवि गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। दरअसल लाइसेंस हासिल करने वाली कंपनियों ने इसका कुछ हिस्सा विदेशी कंपनियों को बेच रखा है। ऐसे में उन विदेशी कंपनियों को होने वाले नुकसान की भरपाई कौन करेगा और यदि ऐसा नहीं होता है तो क्या देश की अंतरराष्ट्रीय छवि प्रभावित नहीं होगी? यह ठीक है कि चार महीने के भीतर नए सिरे से ट्राई को स्पेक्ट्रम आवंटन का काम पूरा करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया है, लेकिन इस समस्या के बाकी पहलुओं को सुलझा पाना सरकार के लिए फिलहाल आसान नहीं होगा। 2जी मामला आगे की सरकारों के लिए एक सबक है कि उनके किसी निर्णय अथवा कामकाज की अदालती समीक्षा संभव है, जिसे मंत्रिमंडल के विशेषाधिकार के नाम पर संरक्षण नहीं दिया जा सकता। जहां तक प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग का संबंध है तो यह प्रत्येक लोकतांत्रिक देश में विपक्ष का अधिकार होता है कि वह सरकार के कामकाज की समीक्षा करे और उसके गलत कामों की निंदा करे और हरसंभव तरीके से सरकार पर दबाव बनाए, लेकिन यहां सवाल पूरे देश की जनता और संसद के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के प्रति सरकार की जिम्मेदारी का भी है, जिसे हर हाल में पूरा किया जाना होगा और उस पर खरा उतरना होगा। कम से कम 2जी मामले में सरकार इन पैमानों पर खरी नहीं उतरी है। इससे न केवल सरकार की किरकिरी हो रही है, बल्कि उसके साथ-साथ पूरे देश की छवि भी अंतरराष्ट्रीय जगत में दांव पर लग रही है। यह एक चिंता की बात है कि देश की सरकार ही देश के लिए समस्या बन रही है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को एक नजीर के रूप में लिया जाना चाहिए और आगे के लिए सबक लेते हुए एक पारदर्शी और जवाबदेह प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। (लेखक संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

मनमोहन सिंह की भ्रष्टाचार के मामलों में खोखली प्रतिबद्धता

भ्रष्टाचार के मामलों की गूंज के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का यह कथन उत्साहित करने वाला नहीं कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता, शुचिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए अभी भी लंबा रास्ता तय करना है। नि:संदेह यह ऐसा काम नहीं जिसे बहुत आसानी से अंजाम दिया जा सके अथवा जिसके लिए कोई सीमा तय की जा सके। शासन-प्रशासन में पारदर्शिता, शुचिता और जवाबदेही लाना एक सतत और कठिन प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को बल तब मिलेगा जब शीर्ष पर बैठे लोग उसे आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध दिखेंगे। दुर्भाग्य से यही वही चीज है जिसका केंद्र सरकार में घोर अभाव नजर आता है। आखिर प्रधानमंत्री कब तक केवल यह कहते रहेंगे कि उनकी सरकार सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार रोकने के लिए सभी कानूनी एवं प्रशासनिक उपाय करने के लिए प्रतिबद्ध है? प्रधानमंत्री की मानें तो पिछले एक साल के दौरान उनकी सरकार इस दिशा में काफी आगे बढ़ी है, लेकिन तथ्य यह है कि न तो लोकपाल विधेयक पारित हो सका, न न्यायिक जवाबदेही विधेयक और न ही व्हिसिल ब्लोअर्स संबंधी बिल। 2जी स्पेक्ट्रम के सभी 122 लाइसेंस रद करने के सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने देश को नए सिरे से यह स्मरण कराया है कि केंद्र सरकार न तो इस घोटाले के समय चेती और न ही बाद में। इतना ही नहीं उसने घोटाले के लिए जिम्मेदार लोगों को दंडित करने के लिए तब तक कुछ नहीं किया जब तक न्यायपालिका ने उसे इसके लिए विवश नहीं किया। यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दखल नहीं देता तो शायद ए. राजा आज भी अपने पद पर सुशोभित होते और केंद्र सरकार बेशर्मी के साथ उनका बचाव कर रही होती। यह हास्यास्पद है कि अभी भी केंद्र सरकार अपनी गलती मानने के लिए तैयार नहीं। बात केवल 2 जी घोटाले की ही नहीं, बल्कि अन्य अनेक घोटालों और विशेष रूप से राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान हुए किस्म-किस्म के घोटालों की भी है। राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों के नाम पर घोटाले किए जा रहे थे और केंद्र सरकार उनसे अवगत होने के बावजूद हाथ पर हाथ धरे बैठी थी। केंद्र सरकार को यह अहसास होना चाहिए कि इन दोनों घोटालों ने उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। कांग्रेस और केंद्रीय सत्ता की ओर से भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर रुख अपनाने के चाहे जितने दावे किए जाएं वे यथार्थ से दूर नजर आते हैं। इससे भी गंभीर बात यह है कि कुछ सवालों के जवाब नदारद हैं। प्रधानमंत्री बार-बार यह तो कहते हैं कि वह भ्रष्टाचार रोकने के लिए जरूरी और प्रशासनिक उपाय करने के लिए संकल्पबद्ध हैं, लेकिन यह समझना कठिन है कि द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशें ठंडे बस्ते में क्यों पड़ी हुई हैं? इस आयोग ने केंद्र सरकार के पिछले कार्यकाल में ही उसे अपनी सिफारिशें सौंप दी थीं। इन सिफारिशों पर विचार के लिए एक मंत्रिसमूह का गठन भी किया गया था, लेकिन फिलहाल कोई नहीं जानता कि इन सिफारिशों का क्या हुआ और उन्हें लेकर मंत्रिसमूह कितना सक्रिय है? इससे इंकार नहीं कि केंद्र सरकार ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन एक तो वे प्रतीकात्मक हैं और दूसरे, यह कहना कठिन है कि वे सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता, शुचिता और जवाबदेही लाने में सफल हुए हैं।
साभार:-दैनिक जागरण

कट्टरता के समक्ष समर्पण

सलमान रुश्दी के बाद तसलीमा नसरीन के मामले से मजहबी कट्टरता का खतरा नए सिरे से सतह पर आता देख रहे हैं एस. शंकर
यह प्रश्न तसलीमा नसरीन ने भारतीय नेताओं, बुद्धिजीवियों से पूछा है। तस्लीमा की आत्मकथा निर्वासन का विमोचन समारोह कोलकाता पुस्तक मेले में रद कर दिया गया, क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथियों ने विरोध किया। पुस्तक अभी सामने भी नहीं आई, पढ़ना तो दूर रहा। लेखिका भी कार्यक्रम में उपस्थित न रहने वाली थीं। फिर भी कट्टरपंथियों को मेले में उसके विमोचन पर आपत्ति थी। उनकी धमकी के बाद अधिकारियों ने कार्यक्रम रद कर दिया। इसी पर तसलीमा ने भारतवासियों से पूछा है कि मजहबी कट्टरपंथियों से कितने समय तक डरेंगे? यह प्रश्न हमारे दो महापुरुषों की उक्ति भी याद दिलाता है। पहली श्रीअरविंद की, जब उन्होंने सौ वर्ष पहले (4 सितंबर 1909) उसी बंगाल में विविध मुस्लिम आपत्तियों और उन्हें संतुष्ट करने के प्रयासों पर कहा था कि प्रत्येक ऐसा कार्य जिस पर कुछ मुसलमानों को आपत्ति हो अब वर्जित कर दिया जा सकता है, क्योंकि उससे शांति भंग हो सकती है और कुछ-कुछ ऐसा लगने लगा है कि कहीं वह दिन न आ जाए जब इसी तर्कसंगत आधार पर हिंदू मंदिरों में पूजा करना भी वर्जित कर दिया जाए। दूसरा कथन 1946 में डॉ. अंबेडकर का था कि मुसलमानों की मांगें हनुमानजी की पूँछ की तरह बढ़ती जाती हैं। इन दोनों कथनों के साथ तसलीमा के प्रश्न को जोड़कर देखने-समझने की आवश्यकता है। यदि तसलीमा की बात में किसी निजी पूर्वाग्रह की शंका हो तो उन दो मानवतावादी चिंतकों की टिप्पणियों से वह मिट जाएगी। हाल में जयपुर साहित्य सम्मेलन में सलमान रुश्दी की वीडियो कांफ्रेंसिंग तक को इसी तरह धमकियों से रोक दिया गया। मजहबी उग्रता के समक्ष झुक कर कोई वास्तविक शांति, समाधान पाने की चाह मृग-मरीचिका है। यह केवल तसलीमा या रुश्दी की बात नहीं। जब श्रीअरविंद या डॉ. अंबेडकर ने अपना अवलोकन दिया था तब तसलीमा या रुश्दी पैदा भी न हुए थे। भारत का विभाजन उसी दुराशा में स्वीकार कर लिया गया था कि इससे मुस्लिम समस्या (नेहरू के शब्द) से मुक्ति मिलेगी। उसके लिए बंगाल और पंजाब में लाखों हिंदुओं, सिखों की बलि दे दी गई, जो अपने नेताओं के भरोसे रोज-मर्रे के काम में लगे थे। उसके बाद भी क्या मिला? वह समस्या तो जस-की-तस है। मजहबी कट्टरपंथियों के साथ शांति और सद्भाव कभी हासिल नहीं होगा, जब तक कि सिद्धांतहीन, भीरु और तात्कालिक उपाय की चाह बनी रहेगी। इसीलिए, तसलीमा का सवाल हमारे देश के कर्णधारों के लिए सौ वर्ष से एक यक्ष प्रश्न बन कर खड़ा है। तसलीमा ने तो उसे बस दोहराया है। मगर जब ऐसे सवाल उठते हैं तो विचार करने से कतराने का प्रयास होता है। उग्रवादियों, आतंकवादियों के भयंकर से भयंकर कारनामों पर टका-सा बयान आ जाता है कि आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता, मगर देवबंदी फतवों या मजहबी कट्टपंथियों की असंवैधानिक मांगों और कारनामों पर पूरी चुप्पी साध ली जाती है। क्या भारत में स्वतंत्रता, लोकतंत्र और संविधान के दिन इने-गिने रह गए हैं? इन्हें ध्वस्त करने का मजहबी दुस्साहस जितना बढ़ता जाता है, हिंदू उच्च वर्ग की कायरता उसी अनुपात में बढ़ रही है। तसलीमा नसरीन पर इससे पहले हैदराबाद में कातिलाना हमला हुआ। उसमें तीन मुस्लिम विधायक भी शामिल थे, जिन्होंने पुन: न चूकने की घोषणा की। उन पर क्या कार्रवाई हुई? कुछ नहीं। तसलीमा को भारत से निकालने की मांग भी होती रही है, किंतु आतंकवादियों के लिए भी मानवाधिकारों के जोशीले भाषण देने वाले बुद्धिजीवी तस्लीमा के पक्ष में एक शब्द नहीं कहते। शाह बानो, अमीना, गुडि़या, इमराना जैसे कितने भी हृदय-विदारक प्रसंग क्यों न उठें, जेंडर जेंडर रटने वालों का स्वर तब नहीं सुनाई पड़ता। कहा जाता है कि यह सब वोट के लिए किया जाता है। मगर किसे वोट मिला है? वह वोट गांधीजी जैसे नेता को भी नहीं मिला, जिसने मुसलमानों को जीतने (नेहरू के शब्द) के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। उन पर भी एक हिंदू लीडर का ठप्पा लगाया गया। तब उपाय क्या है? इस्लामी इतिहास, सिद्धांत और व्यवहार को देखते हुए श्रीअरविंद ने कोई सौ वर्ष पहले ही कहा था कि चाटुकारिता से हिंदू-मुस्लिम एकता नहीं बनाई जा सकती। हर बार हिंदुओं की उदारता ने रास्ता दे दिया है। सबसे अच्छा समाधान यही होगा कि हिंदुओं को संगठित होने देना चाहिए और तब हिंदू-मुस्लिम एकता स्वयं अपनी देखभाल कर लेगी, इससे अपने आप समस्या सुलझ जाएगी। नहीं तो हम इस झूठे संतोष में आराम करने लगते हैं कि हमने एक कठिन समस्या का समाधान कर लिया है, जबकि वास्तव में हमने केवल उसे टाला भर है। देश का विभाजन और बाद में भी पाकिस्तान के साथ अनुभवों एवं देश के अंदर मुस्लिम नेताओं की स्थाई रुष्ट नीति को और किसी तरह समझा नहीं जा सकता! इस संपूर्ण समस्या का समाधान और बिल्कुल सटीक, शांतिपूर्ण उपाय भी श्रीअरविंद ने 1926 में ही बता दिया था कि मुसलमानों को तुष्ट करने का प्रयास मिथ्या कूटनीति है। सीधे हिंदू-मुस्लिम एकता उपलब्ध करने की कोशिश के बजाए यदि हिंदुओं ने अपने को राष्ट्रीय कार्य में लगाया होता तो मुसलमान धीरे-धीरे अपने-आप चले आते। तभी मजहबी कट्टरपंथी कमजोर होंगे और विवेकशील मुस्लिमों को भी बल मिलेगा। तुष्टीकरण की नीति केवल कट्टरपंथियों को मजबूत करती है। दुर्भाग्य से आज भारत का हिंदू राजनीतिक-बौद्धिक वर्ग पुन: उसी तुष्टीकारी राह पर चल रहा है। वह कोलकाता और हैदराबाद ही नहीं, मराड, गोधरा, असम, कश्मीर, सभी जगहों पर मजहबी कट्टरपंथियों से डरते हुए ही नीति तय करता है। वह तसलीमा के प्रश्न से आंख चुराकर, इस्लामियों की मनमानी मांगें मानकर शांति-व्यवस्था खरीदना चाहता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

Sunday, January 29, 2012

बेजा विवाद के जरूरी सवाल

सलमान रुश्दी से संबंधित विवाद के कारण हमारे गणतंत्र की परिपक्वता पर सवालिया निशान लगता देख रहे हैं डॉ. निरंजन कुमार
63वें गणतंत्र दिवस के उत्सव में एक ऐसा एब्सर्ड ड्रामा छिप गया जिसने दुनिया के सामने हमारे गणतंत्र की परिपक्वता पर एक सवालिया निशान लगा दिया। प्रसंग जयपुर साहित्य मेले का है, जो अपने समापन के साथ कई प्रश्न भी छोड़ गया। सवाल कई हैं-अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता का प्रश्न, देश के राजनेताओं की विश्वसनीयता का सवाल, विभिन्न सामाजिक-धार्मिक संगठनों की समझ पर सवाल और सबसे ज्यादा भारतीय राज्य की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का सवाल। सलमान रुश्दी भारत में जन्मे, पर अब ब्रिटिश नागरिक हैं। उनके जयपुर साहित्य मेला में आगमन के मुद्दे को लेकर जो बवेला मचा उससे कई सवाल खड़े होते हैं। प्रथम तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही है। दरअसल विवाद उनकी पुस्तक द सैटेनिक वर्सेस को लेकर है, जो 1988 में लिखी गई थी। कहा जाता है कि इस पुस्तक में इस्लाम के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब के खिलाफ आपत्तिजनक चीजें लिखी गई हैं। इसको लेकर पूरी दुनिया के मुसलमानों में एक प्रतिक्रिया हुई, बल्कि ईरान में तो उनकी मौत का फतवा भी जारी हुआ। हालांकि 1998 में ईरान सरकार ने यह फतवा एक तरह से वापस ले लिया। दरअसल मुद्दा अभिव्यक्ति की आजादी का है। भारतीय संदर्भो में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्पष्ट उल्लेख हमारे संविधान में उल्लिखित है और इसे मूलभूत अधिकारों में रखा गया है। संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत भारतीय नागरिकों को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। इसका अभिप्राय है कि शब्दों, लेखों, चित्रों, मुद्रण अथवा किसी अन्य प्रकार से अपने विचारों को प्रकट करना। यहां पर एक बात समझ लेना जरूरी है कि एक तो यह अधिकार सिर्फ भारतीय नागरिकों (रुश्दी भारतीय नागरिक नहीं हैं) के लिए है। दूसरे, इसी अनुच्छेद 19 की धारा (2) में स्पष्ट उल्लेख है कि राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मित्रतापूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय की अवमानना, मानहानि, अपराध के लिए उत्तेजित करना आदि के आधार पर सरकार इस अधिकार पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकती है। स्पष्टत: विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार निरंकुश और निरपेक्ष नहीं है, बल्कि विभिन्न सीमाओं और अहर्ताओं के अधीन है। द सैटेनिक वर्सेस को लेकर धार्मिक भावनाओं को ठेस लगने की जो बात कही जाती है उसके मद्देनजर भारत सरकार ने इस पर कस्टम एक्ट के तहत प्रतिबंध लगाया हुआ है। हालांकि तकनीकी रूप से यह प्रतिबंध इसके सिर्फ आयात को लेकर ही है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि कानूनी रूप से अभी भी इसके पढ़ने, रखने या इंटरनेट से डाउनलोडिंग पर प्रतिबंध नहीं है, लेकिन तकनीकी मामले से परे जाकर सोचें तो प्रतिबंध पुस्तक के सार्वजानिक पाठ पर ही था। इस रूप में द सैटेनिक वर्सेस का सार्वजानिक पाठ न केवल नैतिक तौर से गलत है, बल्कि धारा 19( 2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था के बिगड़ने के आधार पर भी अवैधानिक होगा, लेकिन इसी तर्क से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर एमएफ हुसैन द्वारा बनाए हिंदू देवी-देवताओं के नग्नचित्र को भी देखा जाना चाहिए। यह अलग बात है कि शिवसेना और बजरंग दल के सदस्यों ने उनके साथ जो बदसलूकी की उसे कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता है। यह तो कहना ही होगा कि हुसैन का देश से भागना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण था। यह सरकार का उग्रपंथियों के सामने हथियार डाल देने जैसा था। कुछ यही स्थिति सरकार की वर्तमान मुद्दे पर भी रही, जब वोट बैंक के लालच में चरमपंथी धार्मिक मुस्लिम नेताओं के दवाब में आकर रुश्दी को हिंदुस्तान आने तक देना तो छोडि़ए, उन्हें वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये भी संबोधित करने नहीं दिया गया। केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार इसके लिए चाहे लाख पल्ला झाड़ ले, वह इस आरोप से बच नहीं सकती कि देश की राजसत्ता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा की उसने किरकिरी कराई है। द सैटेनिक वर्सेस और इसके सार्वजानिक पाठ पर प्रतिबंध एक बात है, लेकिन रुश्दी को भारत आने ही न देना या उनके अन्य साहित्यिक विषयों पर चर्चा न करने देना एक अन्य स्थिति है। अपने खिलाफ फतवा जारी होने के बाद रुश्दी कई बार भारत आ चुके हैं और जयपुर मेला में भी शिरकत कर चुके हैं, लेकिन तब आज यह हंगामा क्यों? निश्चय ही, जैसा स्वयं रुश्दी ने कहा है कि इसके पीछे आगामी चुनाव ही कारण हैं और कांग्रेसनीत सरकार ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहती जिससे उसे मुसलमानों के वोट खोने का खतरा हो। यहां कांग्रेस या अन्य पार्टियों को समझने की जरूरत है कि मुसलमानों के वोट चाहिए तो उनके वास्तविक मुद्दों को उठाइए। यही बात हिंदू संबंधित मुद्दों पर भाजपा के लिए भी कही जा सकती है या दलितों के संदर्भ में बसपा के लिए। आज यह सिद्ध हो चुका है कि भारतीय मुसलमानों की सामाजिक-शैक्षणिक-आर्थिकस्थिति लगभग दलितों के समकक्ष ही है। यह अनायास नहीं है कि युवा-शिक्षित मुसलमान इस पूरे बवेले से अलग था। यहां कठघरे में मुसलमानों के वे धार्मिक नेता भी हैं, जो आज के आम भारतीय मुसलमानों को समझ नहीं पा रहे हैं। धार्मिक मुद्दे बेशक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन गैरजरूरी विवाद से भारतीय मुसलमान आगे जाकर वास्तविक मुद्दों पर बात करना चाहते हैं। कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ठीक ही कहा था कि भारतीय मुसलमान सलमान रुश्दी को बहुत पीछे छोड़ चुका है। यह ठीक है कि मजहब अभी भी हमारे चेतना का बहुत गहरा हिस्सा है, लेकिन इसके दुरुपयोग और किसी भी धर्म के उग्रपंथियों को इसके नाम पर देश और जनता को बंधक बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि सवाल सिर्फ नैतिकता और वैधानिकता का ही नहीं, बल्कि भारतीय राज्य के भविष्य का भी है। (लेखक दिल्ली विवि में एसोसिएटप्रोफेसर हैं)
साभार:-दैनिक जागरण