Wednesday, August 24, 2011

अभी तो महज शुरुआत है

सरकार के तौर-तरीके मुझे हमेशा हैरान कर देते हैं। जब महंगाई की मार पड़ती है तब या तो सरकार इसे नजरअंदाज कर देती है या वह ऐसे मूर्खतापूर्ण स्पष्टीकरण देती है कि उसकी स्वयं की स्थिति हास्यास्पद हो जाती है।

सरकार बहुत कम अंतराल में ग्यारह बार ईंधन की कीमतें बढ़ाती है और इससे हम सबके लिए हालात और बदतर हो जाते हैं। जब समाज में भ्रष्टाचार का घुन लग जाता है और वह उस लोकतंत्र की बुनियाद को खोखला करने लगता है, जिस पर हमें नाज है, तो सरकार तब तक आरोपों से इनकार करती रहती है, जब तक सर्वोच्च अदालत या कैग के हस्तक्षेप के बाद उसे कोई कार्रवाई करने को विवश न होना पड़े।

सरकार की कार्रवाइयां हिचकिचाहट भरी होती हैं। हस्तक्षेप करने पर वह गुर्राती है। वह दलील देती है कि कैग जैसी संस्थाओं को भ्रष्टाचार के मसले पर अंगुली उठाने का अधिकार नहीं है, लेकिन हकीकत यह है कि उसके पास कहने को कुछ भी विशेष नहीं होता। यहां तक कि आतंकवाद या अन्य बड़ी आपराधिक वारदातों के मौके पर भी सरकार सबसे सुस्त साबित होती है।

लेकिन जब बात जनता या जनता के प्रतिनिधियों पर क्रूरतापूर्ण जोर-आजमाइश करने की हो, तब सरकार बहुत चुस्त और चाक-चौबंद हो जाती है। तब उसे किसी सर्वोच्च अदालत या कैग के हस्तक्षेप की दरकार नहीं होती। जाहिर है क्रूरतापूर्ण कार्रवाइयां करने में सरकार को किसी किस्म की कोई तकलीफ नहीं होती।

अन्ना हजारे आपकी और मेरी ही तरह एक आम आदमी हैं। हममें और उनमें एक अंतर शायद यह है कि उन्होंने एक असमझौतावादी और कठोर जीवन बिताने का प्रयास किया है। उन्होंने जमीनी स्तर पर बदलाव लाने की कोशिशें कीं, जिसके कारण हमारे कुछ जाने-माने (और बेहद अमीर) राजनेताओं से उनकी ठन गई।

राजनेताओं ने अपनी तरफ से भरसक प्रयास किए कि अन्ना और उनके आंदोलन को ठीक वैसे ही कुचल दिया जाए, जैसे वे इससे पहले कई अन्य व्यक्तियों और आंदोलनों को कुचल चुके हैं। लेकिन अन्ना अडिग बने रहे। सरकार की बातों का उन पर कोई असर नहीं हुआ। न ही उन्होंने अपनी छवि पर कोई दाग लगने दिया, जबकि उनके बारे में अनेक अफवाहें फैलाने का प्रयास किया गया था।

इसीलिए जब देश निर्विवाद रूप से हमारी अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन करने के लिए किसी नेता की बाट जोह रहा था, तब अन्ना हजारे एक उपयुक्त व्यक्ति साबित हुए। नहीं, भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान की शुरुआत अन्ना हजारे ने नहीं की, यह शुरुआत हजारों देशवासियों ने की है। अन्ना तो बस केवल उन आम देशवासियों का चेहरा बनकर उभरे हैं।

सवाल यह नहीं है कि जनलोकपाल बिल सही है या नहीं। लाखों भारतीयों का मानना है कि यह सही है, अलबत्ता सरकार ऐसा नहीं सोचती। लेकिन बहस का मुद्दा यह नहीं है। भारत की जनता जनलोकपाल बिल के लिए इसलिए एकजुट हुई है, क्योंकि वह उसे एक ऐसी समस्या के संभावित जवाब के रूप में देखती है, जिसके कारण उसका जीना दुश्वार हो गया है। यह समस्या है : यत्र-तत्र-सर्वत्र व्याप्त भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचार केवल देश के सबसे गरीब लोगों को ही नुकसान नहीं पहुंचाता।

अब यह स्थिति आ गई है कि यह सभी देशवासियों के लिए समान रूप से नुकसानदेह और घातक बन गया है, सिवाय कुछ चुनिंदा राजनेताओं और अफसरों के, जो भ्रष्टाचार का फायदा उठा रहे हैं। यहां तक कि राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला व्यावसायिक समुदाय भी अब भ्रष्टाचार से तंग आ चुका है।

तो सवाल यह नहीं है कि क्या अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई लड़ने के लिए हमारे सर्वश्रेष्ठ नेता हैं? सवाल यह भी नहीं है कि क्या जनलोकपाल बिल यह लड़ाई लड़ने का सबसे आदर्श हथियार है? सवाल यह भी नहीं है कि हम भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में कभी कामयाब हो पाएंगे या नहीं, क्योंकि कई लोग अक्सर इस तरह की निराशावादी बातें करते हैं।

सवाल केवल इतना है कि क्या हमें यह अवसर गंवा देना चाहिए? अचानक पूरा देश भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम में एकजुट हो गया है और अन्ना हजारे इस संघर्ष का चेहरा बन गए हैं। क्या हम यह मौका चूक जाएं या हम इसका लाभ उठाएं? बुनियादी सवाल यह है और हम सभी को आज खुद से यही सवाल पूछना चाहिए।

आज हमारा सबसे बड़ा दुश्मन अगर कोई है, तो वह है सिनिसिज्म। निराशावाद और नकारात्मकता। हम खुद में भरोसा गंवा चुके हैं। हम नहीं मानते कि हम कुछ कर सकते हैं। अन्ना हमारे इस निराशावाद का जवाब हैं। गांधी टोपी पहनने वाला यह आदमी हमें प्रभावित कर सकता है या नहीं भी कर सकता है। हमारा देश बहुत बड़ा है। हम सभी देशवासियों का अपना एक दृष्टिकोण है कि भारत कैसा हो सकता है या उसे कैसा होना चाहिए।

लोकतंत्र का यही मतलब है: सभी दृष्टियों का सम्मान करना और एक सशक्त राष्ट्र के रूप में सहअस्तित्व की राह पर चलना। लेकिन अपने तमाम भेदों को भुला देने और भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठ खड़े होने का यही सबसे सही समय है। यह अन्ना का मजबूती के साथ समर्थन करने का समय है।

यह इस बात को साबित कर देने का समय है कि जब बात देश की रक्षा की आती है तो हम अपने अलग-अलग नजरियों को दरकिनार कर एकजुट हो जाते हैं। हो सकता है हम यह जंग जीत जाएं या हो सकता है हम नाकाम साबित हों, लेकिन हम कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि सरकार को बता दें कि जनमत की ताकत क्या होती है। हो सकता है यह ताकत देखकर भ्रष्टाचारी खुद को अपमानित महसूस करें। शायद इसी से बदलाव के एक नए दौर की शुरुआत हो।
Source: प्रीतीश नंदी | Last Updated 00:06(18/08/11)
साभार:-दैनिक भास्कर
http://www.bhaskar.com/article/ABH-now-is-just-the-beginning-2359919.html


इस मुनादी में महज जनलोकपाल नहीं

रात साढ़े बारह बजे तिहाड़ जेल के गेट नंबर तीन पर अचानक एक व्यक्ति ने पीछे से हाथ पकड़ते हुए मराठी में कहा, ‘मी शरद पोटले। रालेगन सिद्दि हूण आलो (मैं शरद पोटले। रालेगन सिद्दि से आया हूं)। मुझे 1991 में महाराष्ट्र में अन्ना का वह आंदोलन याद आ गया जो नौकरशाही के भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन की शुरुआत कर उन्होंने राज्य सरकार से सीधे कहा था कि भ्रष्ट अधिकारी हटाओ वरना अनशन जारी रहेगा। हफ्ते भर में ही जैसा समर्थन आम लोगों से अन्ना को मिला उससे उस वक्त की कांग्रेस सरकार इतने दबाव में आ गई कि उसने समयबद्ध जांच करवाने के आदेश दे दिए और 40 भ्रष्ट नौकरशाह बर्खास्त कर दिए गए।’

उस आंदोलन में अन्ना हजारे को अनशन के बाद नींबू-पानी का पहला घूंट पिलाने वाला यही शरद पोटले थे। शरद ने उसी वर्ष स्कूल से कॉलेज में कदम रखा था और अन्ना ने पूछा था, बनना क्या चाहते हो। शरद ने पढ़-लिखकर बड़ा बाबू बनने की इच्छा जताई थी। बीस वर्ष बाद जब तिहाड़ जेल के सामने शरद पोटले से पूछा कि कहां बाबूगीरी कर रहे हो तो उसने बताया कि खेती कर रहा हूं। और बाबू बनने का सपना उसने तब छोड़ा जब 199९ में अन्ना ने महाराष्ट्र के भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा और उस वक्त की शिवसेना सरकार अन्ना की जान के पीछे पड़ गई। तब रालेगन सिद्दि के पांच लोगों में एक शरद भी था जो उन अपराधियों को अन्ना की सच्चाई बताकर उनकी जान की कीमत बताई थी जिन्हें अन्ना को जान से मारने की सुपारी दी गई थी।

और फिर अन्ना पर कोई अपराधी हाथ नहीं उठा सका। लेकिन पहली बार 16 अगस्त को दिल्ली पहुंचे शरद ने अन्ना की गिरफ्तारी देखी तो उसे लगा कि दिल्ली में अपराध की परिभाषा बदल जाती है। मगर रात होते-होते जब तिहाड़ जेल के बाहर युवाओं का जुनून देखा तो मराठी में बोला कि अब सवाल अन्ना का नहीं देश का है। लेकिन शरद के इस जवाब ने बीते 20 घंटों की सियासी चाल और संसद से लेकर राजनीतिक दलों की पहलकदमी ने पहली बार सवाल यह भी खड़ा किया कि अन्ना हजारे की जनलोकपाल के सवाल को लेकर शुरू हुई लड़ाई अब संसदीय लोकतंत्र को चुनौती दे रही है और राजनीति अन्ना को या तो अपना प्यादा बनाने पर आमादा है या फिर आंदोलन को हड़पने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।

सरकार ने चाहे अन्ना की हर शर्त मानते हुए रिहाई का रास्ता साफ किया, लेकिन प्रधानमंत्री से लेकर संसद के भीतर किसी सांसद ने अन्ना हजारे की मांग को मान्यता नहीं दी। मनमोहन सिंह ने अन्ना हजारे को संसदीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा भी बताया और अपनी विकास अर्थव्यवस्था के खांचे को पटरी से उतरने के लिए अन्ना के आंदोलन के पीछे अंतरराष्ट्रीय साजिश के संकेत भी दिए। यही नहीं, कमोबेश हर पार्टी के सांसद ने अन्ना को मजाक में बदलने की कोशिश की। संसद में बुधवार की बहस से सारे संकेत यही निकले कि पहली बार संसदीय राजनीति को सड़क के आंदोलन से खतरा तो लग ही रहा है। इसलिए अन्ना की महक 1974 के जेपी या 1989 के वीपी आंदोलन में खोजना भूल होगी। यह भूल ठीक वैसी ही है, जैसे महात्मा गांधी ने 1923 में अपनी गिरफ्तारी के विरोध में एक रुपए की जमानत लेने से भी इंकार कर दिया था और जज को यह कहना पड़ा कि ‘अगले निर्णय तक बिना जमानत ही एमके गांधी को रिहा किया जा रहा है।’

ठीक वैसे ही अन्ना ने 16 अगस्त को जमानत लेने से इंकार कर दिया और सरकार के निर्देश पर बिना जमानत ही अन्ना को रिहा कर दिया गया। दरअसल समानता तो यह भी है कि गुजरात में महंगाई के खिलाफ नवनिर्माण आंदोलन से जेपी ने संघर्ष शुरू किया। मामला भ्रष्टाचार तक गया। गिरफ्त में बिहार आया। अंत में वह आंदोलन सत्ता परिवर्तन के बाद ही थमा। हो सकता है जंतर-मंतर से तिहाड़ तक जा पहुंचे, आंदोलन का रुख भी अब महज भ्रष्टाचार का नहीं रहे और आंदोलन धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ता चला जाए, जहां संसदीय राजनीति को चुनौती देते हुए संसदीय राजनीति में बड़े सुधार की बात शुरू हो जाए। लेकिन समझना यह भी होगा कि 74 में जेपी या 89 में तत्कालिक प्रधानमंत्री राजीव गांधी को चुनौती देकर सड़क पर उतरे वीपी सिंह दोनों की पहचान राजनीतिक थी।

अन्ना राजनीतिक नहीं हैं। आंदोलन के लिए रणनीति बनाती अन्ना की टीम राजनीतिक नहीं है। इससे पहले के दोनों दौर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बेहद महीन तरीके से हड़पा और इस बार भी उज्जैन के चिंतन शिविर से 24 घंटे पहले 16 अगस्त को ही हर स्वसंसेवक को यह निर्देश भी दे दिया गया कि उसकी भागीदारी आंदोलन में सड़क पर बैठे लोगों के बीच न सिर्फ होनी चाहिए बल्कि संघर्ष का मैदान खाली न हो इसके लिए हर तरह का संघर्ष करना होगा। यह निर्देश भाजपा के कार्यकर्ता और युवा विंग को भी है। जो सांसद अन्ना को बेमानी मानते रहे और जो उन्हें संसदीय लोकतंत्र को चुनौती देने वाला मानते हैं, वे अन्ना से इसलिए सहमे हुए हैं क्योंकि पहली बार सड़क पर अन्ना आंदोलन के समर्थन में देश भर में लोग जुटे हैं। ऐसे मौके पर अगर प्रधानमंत्री संसद में अपने भाषण में कहते हैं, ‘हम जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं और हम अपने लोकतंत्र पर आंच आने नहीं देंगे।’ तो शरद पोटले की बात याद आ जाती है कि अब सवाल अन्ना का नहीं देश का है। और देश में पहली बार लोकतंत्र के मामले में संसद और सड़क की राहें अलग-अलग हैं।

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं)

Source: पूण्‍य प्रसून बाजपेयी | Last Updated 09:55(18/08/11)
साभार:-दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/article/ABH-poonya-prasoon-bajpayee-article-2361637.html?ZX3-V

जब योग्यता से आगे बढ़ जाए सत्ता..

पंद्रह अगस्त 1947 की मध्यरात्रि की ओर बढ़ते हुए जवाहरलाल नेहरू का शानदार उद्बोधन लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं के इतिहास में मील का पत्थर बनी इस यादगार रात के लिए अन्य महान भारतीयों के योगदान से अभिभूत था। 64 वर्ष के बाद, आइए हम तत्कालीन संयुक्त प्रांत से चुने गए सदस्य, दार्शनिक-शिक्षक और बाद में राष्ट्रपति बने डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भी सुनें। वे इस चमत्कारिक उपलब्धि पर हर्षविभोर थे, परंतु उन्होंने आगे आने वाले खतरों के प्रति आगाह भी किया था।

उन्होंने दोषारोपण की संस्कृति, जो कि भारतीयों का पसंदीदा बहाना है, को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, ‘अन्य (यानी ब्रिटिश) हमारी कमजोरियों से खेलने में सक्षम थे, क्योंकि हमने उन्हें ऐसा करने दिया।’ आगे आने वाली कमजोरियां भी उतनी ही खतरनाक रहीं: ‘जब सत्ता-शक्ति योग्यता को पीछे कर देती है, हम अंधकार में गिर जाते हैं।’ अगर अकेली इस बात को ही पद की शपथ का हिस्सा बना दिया जाता, तो जो इसे समझने में सक्षम हैं, उन पर इसका हितकारी प्रभाव हो सकता था।

डॉ. राधाकृष्णन ने चेताया था कि एक धनलोलुप और बिकाऊ शासक वर्ग स्वप्न को दु:स्वप्न में बदल सकता है: ‘जब तक कि हम शीर्ष स्थानों से भ्रष्टाचार को खत्म न कर दें, भाई-भतीजावाद, सत्ता लोलुपता, मुनाफाखोरी और काला बाजारी की हर जड़ को न उखाड़ फेंकें, जिन्होंने हमारे महान देश के नाम को खराब किया है..’। भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद तो भारतीय प्रशासन के अवलंब बन चुके हैं।

लोकतंत्र की निपुणता उसकी इस योग्यता में निहित है, जो निराशा के दौर में नवीनीकरण की पेशकश करती है। अन्ना हजारे ने कल के भारत को आकार देने वाले बच्चों से यही वादा तो किया है। अन्ना, जो कल तक गुमनाम थे, पर आज अविस्मरणीय हैं। जब सत्तारूढ़ दल एक सामान्य आदमी और उसकी प्रेरणा से उठ खड़े हुए लोकप्रिय आंदोलन के खिलाफ सत्ता के दुरुपयोग पर उतारू हो जाता है, तो उसे मूर्खता के रसातल में बर्बाद होना ही है।

पीलू मोदी, तुम्हें इस दौर में रहना था! या, कम से कम हमें 1970 के दशक के इस अद्भुत सांसद को याद करने में सक्षम होना चाहिए। यह उस सरकार के खिलाफ देशव्यापी रोष का पिछला दौर था, जिसका सत्तामद उसकी योग्यता से भी आगे बढ़ गया था।

किसी की शख्सियत को जीवन की सीमाओं से बड़ा बताना चलन से बाहर हो चुका मुहावरा है। और शब्द महज दिखाई देने तक सीमित नहीं होते। पीलू के पास एक गर्जना थी, जो सत्ता के गलियारों में लगातार गूंजती रहती थी और हाजिर जवाबी थी, जो शक्ति और पद के अहंकार में खुद को आम लोगों से श्रेष्ठ मानने वालों को आईना दिखा सकती थी। इन दिनों राशिद अल्वी जैसे कांग्रेस प्रवक्ता ‘सीआईए’ का उल्लेख करने में थोड़े अनिच्छुक लगते हैं, लेकिन 1970 के दौर में सीआईए जनता के लिए दैत्य का पर्याय थी।

जो कोई भी कांग्रेस की तेजस्विता पर सवाल उठाने की हिमाकत करता, तत्काल सातवें नर्क में धकेल दिया जाता था। ऐसे ही समय में 1974 के अल्वियों ने जनता के आसमानी रोष को नेतृत्व देने वाले जयप्रकाश नारायण जैसे प्रखर देशभक्त की अवहेलना की थी। जब सीआईए को निंदा के लिए अपर्याप्त समझा गया, तो उन्होंने ‘आरएसएस’ का ठप्पा भी जोड़ दिया, मानो यह ऐसा दोष हो, जिससे मुक्ति संभव ही नहीं।

किसी तानाशाह सरकार को ठहाके से ज्यादा और कुछ आतंकित नहीं करता। पीलू मोदी जानते थे कि कैसे हंसना है। एक दिन वे एक बिल्ला लगाए हुए लोकसभा में पहुंचे, जिस पर लिखा था, ‘मैं सीआईए का एजेंट हूं’। सरकार कभी उबर नहीं पाई।

चूंकि अभी हमारे आसपास कोई पीलू मोदी नहीं हैं, अन्ना के सुरक्षा घेरे को मजबूती प्रदान करने वाले बच्चों ने हास्य को अपना प्राथमिक हथियार बनाया है। अगर सरकार अन्ना हजारे को लेकर चिंतित नहीं है, तो उसे उनके आसपास उभरने वाले व्यंग्योक्तिपूर्ण, तीक्ष्ण और कभी-कभी बेहद मजाकिया स्लोगनों को लेकर गंभीर रूप से चिंतित होना चाहिए। कांग्रेस के आइकॉन भले ही यह सोचें कि वे खुद को अपने नासमझ प्रवक्ताओं के विषवमन से अलग दिखा सकते हैं। लेकिन यह एक भ्रम ही है। लोग जानते हैं कि प्रवक्ता तो केवल कठपुतलियां ही हैं।

अन्ना हजारे ठीक उसी तरह का प्रतीक बन गए हैं, जैसे जयप्रकाश नारायण 1974 में थे। उनकी खास मांगें उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितना कि उनके द्वारा उन मांगों को उठाया जाना। किसी ज्यादा योग्य सरकार ने अन्ना की शुरुआती मांग मान ली होती, लोकपाल मसौदे के उनके ड्राफ्ट को लोकसभा में रख दिया होता और लंबी वैधानिक प्रक्रिया चलने दी होती। इससे आधिकारिक तौर पर प्रतिक्रिया देने की जिम्मेदारी सभी राजनीतिक दलों तक पहुंच जाती, बजाय व्यापक तौर पर कांग्रेस संगठन के। अगर अभी जनता का रोष कांग्रेस पर केंद्रित है, तो खुद पार्टी ही दोषी है।

एक स्लोगन 1974 में जेपी के आंदोलन की डराने वाली याद की तरह है: ‘ये अंदर की बात है, पुलिस हमारे साथ है।’ 40 साल पहले इसे राजद्रोह बताकर इसकी निंदा की गई थी। दुनिया ऐसे जड़ नुस्खे से आगे बढ़ चुकी है। यह सीआईए या आरएसएस की बात नहीं है। भ्रष्टाचार न तो विदेशी एजेंट है, न ही विभाजनकारी शक्ति। यह ऐसा दानव है, जिसके बारे में दूरद्रष्टा डॉ। राधाकृष्णन ने 15 अगस्त 1947 को ही अनुमान लगा लिया था।
Source: एम।जे. अकबर | Last Updated 00:11(21/08/11)
साभार:-दैनिक भास्कर
http://www.bhaskar.com/article/ABH-power-exceeds-the-qualifications-2367654.html


अब कुछ भारतीयों से आजादी दिलाएं

हमने 15 अगस्त, 1947 को पटकथा का केंद्रीय भाव खो दिया था। हमने सोच लिया कि एडविना और लॉर्ड लुईस माउंटबेटन के महल पर तिरंगा लहराना ही महात्मा गांधी द्वारा 1919 में शुरू की गई स्वतंत्रता परियोजना के अंत का प्रतीक है। यह तो एक दूसरे और उतने ही मुश्किल स्वातं˜य संघर्ष की शुरुआत थी। पहला ब्रिटिशों के विरुद्ध रहा था। दूसरा भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष साथी भारतीयों के खिलाफ होगा।

जब मैं उन बेशुमार चीजों पर मनन करता हूं, जिनसे हमें अब भी आजादी की जरूरत है, तो वर्तमान और अतीत अपनी प्रमुखता के लिए होड़ करते नजर आते हैं। इस सूची में सबसे ऊपर की तरफ है, भूख। हमें इस भूख को ग्रामीण और जनजातीय भीतरी क्षेत्रों में नहीं खोजना होगा, जहां माओवादियों ने जनसमूह को विचारधारा नहीं, मानव अधिकारों के नाम पर जुटाया है : इसकी दरकार एक कृशकाय और उत्पीड़ित आत्मा को केवल जोड़े रखने के लिए महज पर्याप्त खाने के अधिकार से ज्यादा बड़ी हो सकती है? माओवादियों की गोलाबारी अब भी केवल टरटराहट ही है। यह भूख अब तक गुस्से में तब्दील नहीं हुई है। उस दिन- और रात उदासीन अमीर व आत्मसंतुष्ट मध्यवर्ग को भगवान बचाए, जब गरीब ने तय कर लिया कि जिनके पास कुछ नहीं है, उनके पास खोने को भी कुछ नहीं है।

गरीब कोई बहुत दूर की हकीकत नहीं हैं। वे भारत के सबसे ज्यादा बिगड़ैल और आत्मसंतुष्ट शहर, दिल्ली की राहों और किसी छोटे-मोटे शहर को खरीद सकने की कीमत पर बने गगनचुंबी अपार्टमेंट्स के सामने जमीन पर सोते हैं। गलियां बच्चों की उन पीढ़ियों का एकमात्र घर हैं, जो भीख नहीं मांग रहे होते, तब हंसने की कुव्वत रखते हैं। बेघर बच्चे के लिए उध्र्वगति क्या हो सकती है? कालकोठरी की छत? तिहाड़ जेल पहुंचने वाले 90 फीसदी किशोरों के पास कुछ भी नहीं होता- पहनी हुई शर्ट के अलावा दूसरी शर्ट भी नहीं। आजादी के साढ़े छह दशकों के बाद, कालकोठरी ही एकमात्र घर है, भारत उनके लिए जिसकी पेशकश करता है।

मैं अनावश्यक रूप से कड़वाहट भरा नहीं लगना चाहता। हमें 1947 में एक ऐसा भारत मिला, जहां पूरब में तीन बरस के भीतर 40 लाख लोग अकाल के कारण काल कलवित हो चुके थे। इसकी सबसे ज्यादा मार बंगाल पर थी। हमने अंग्रेजी आर्थिक नीतियों के नतीजे, अकाल को पीछे छोड़ दिया है- पीड़ादायक स्मृति, जो अब करोड़ों परिवारों के व्यक्तिगत इतिहास तक सीमित है। लेकिन यह उन आधा अरब लोगों के लिए मामूली सांत्वना ही है, जो अब भी अभाव में जीते हैं। उनकी उम्मीदें 20 की उम्र में उड़नछू हो जाती हैं और दांत 40 में चले जाते हैं। और उनकी जिंदगियां बहुत लंबे समय तक कुम्हलाई हुई नहीं रह पातीं। यह आजादी की परियोजना है, जिस पर अगले दशक के दौरान समूचे भारत का ध्यान होना चाहिए। यह आखिरी मौका है और आखिरी जिम्मेदारी, उस पीढ़ी की, जिसे अंग्रेजों के जाने के बाद 1947 में जन्म लेने का सौभाग्य मिला।

आधी रात की पीढ़ी की ये संतानंे अपनी जीवन संध्या पर हैं और उनके इरादे एकदम साफ हैं। वे भ्रष्ट भारतीयों से आजादी चाहते हैं। यह विश्वास करना मूखर्तापूर्ण होगा कि सिर्फ दूसरे लोग ही भ्रष्ट हैं। अगर भ्रष्टाचार सिर्फ शक्तिशाली मंत्रियों तक ही सीमित होता, तो जेलों में अपराधियों के लिए काफी जगह खाली होती। भ्रष्टाचार मारक है, क्योंकि इसकी जड़ें प्राधिकार के सबसे निचले स्तर तक व्याप्त हो चुकी हैं। पासपोर्ट कार्यालय का क्लर्क, जो आपके दुख से भी सौ रुपए का नोट दुह लेता है।

जिला मजिस्ट्रेट के कार्यालय का बाबू, जो आपको कानूनी तौर पर मिलने वाली चीज भी आपकी जेब से कुछ फीसदी लिए बगैर नहीं देता। कॉन्स्टेबल, जो हर नियम-कायदे को अपने फायदे के रूप में देखता है। हर गड्ढा, जो आप देखते हैं, वह भ्रष्टाचार की अंगूठा निशानी है : क्या आपको हैरानी होती है कि क्यों हमारी सड़कें पहली ही बारिश के बाद युद्ध का मैदान बन जाती हैं, जहां हमें हर पल जूझना होता है? क्यों बारिश लंदन, इस्तांबुल या सिंगापुर की सड़कों की गत नहीं बिगाड़ती, जहां दरअसल हर दोपहर बारिश होती है?

मुक्ति की सूची काफी लंबी है। भारतीय असमानता, पाखंड, चापलूसी और मूर्खता से आजादी चाहते हैं। चापलूसी का धूर्त और मक्कार भ्रष्टाचार इन बीमारियों में संभवत: बदतरीन है, क्योंकि यह नेता के अभिमान की पुष्टि के लिए सत्य को तोड़-मरोड़ देता है। एक दृष्टांत तत्काल मन में आता है, लेकिन इस युवा आशा को ही बार-बार रटना भी अन्याय ही होगा। हर पार्टी इस अधमता की बराबर दोषी है।

महात्मा गांधी, जिन्होंने 15 अगस्त को संभव कर दिखाया, उस दिन का जश्न मनाने के लिए नैतिक इच्छा नहीं जुटा सके, जब हमारे तिरंगे ने यूनियन जैक की जगह ली थी। वे दिल्ली में मग्न मौजियों के बीच नहीं थे। वे कोलकाता में थे- भारतीयों को भारतीयों से बचा रहे थे। जब बीबीसी ने बेलगाछिया के एकांत बसेरे में उनका इंटरव्यू लिया, तो वे जश्न का एक वाक्य तक नहीं ढूंढ़ पाए। गांधी 1919 और 1920 में कहीं ज्यादा खुश व्यक्ति थे। वे जानते थे कि जब लोग उठ खड़े हुए, तो सवाल सिर्फ यह रह जाएगा कि आजादी कब मिलेगी, न कि यह मिलेगी या नहीं। वे एक-चौथाई सदी आगे देख सकते थे। शायद 1947 में गांधी आधी सदी आगे देख सकते थे। गांधी आधुनिक भारत की महान उपलब्धियों पर मुस्कराहट की नजर डाल चुके होंगे, लेकिन उन्होंने तब तक हमें शांति से सोने नहीं दिया होता, जब तक भूख और भ्रष्टाचार मातृभूमि को परेशान किए हुए हैं।

लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।

Source: एम।जे. अकबर | Last Updated 02:02(14/08/11)
साभार:-दैनिक भास्कर
http://www.bhaskar.com/article/ABH-indian-independence-august-2353938.html

लौट जाती है उधर को भी नजर

पाकिस्तान की युवा व ग्लैमरस विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार का भारत दौरा गलत वजहों से सुर्खियां बना गया। तीन बच्चों की मां हिना सुंदर और युवा होने के साथ पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान से अपने करीबी रिश्तों और अपनी संपन्न पारिवारिक हैसियत के लिए जानी जाती हैं। पाकिस्तान के अमीर खानदानों की परंपरानुसार उन्होंने विदेश से होटल मैनेजमेंट की तालीम हासिल की है, उनकेपति बड़े व्यवसायी हैं और खुद वे पाकिस्तान के एक जाने-माने होटल और पोलो के कई घोड़ों समेत बड़ी संपत्ति की मालकिन हैं।

कूटनीतिक शिष्टता की दृष्टि से उनसे हुर्रियत के अलगाववादी नेताओं से रस्मी भेंट के अलावा कोई बड़ी भूल-चूक हुई हो, ऐसा भी नहीं। उल्टे दौरे की शुरुआत में जब उन्होंने कहा था कि पार्टिशन के साठ साल बाद आज के युवा भारत-पाक नेतृत्व के लिए इतिहास के इस मुकाम पर आकर अपने विगत इतिहास को भुलाना ही बेहतर होगा, तो उन्होंने मीडिया से सराहना भी हासिल की थी। फिर भी उनके दौरे को भारत से लेकर अमेरिकी मीडिया तक में गंभीरता से न लिए जाने की वजह क्या हो सकती है?

एक वजह तो हिना ने स्वदेश वापसी पर इस बाबत पाक मीडिया को दिए अपने चिड़चिड़े जवाब में गिनाई कि महिला होने के नाते भारत के मीडिया की नजर में उनका राजनयिक महत्व हल्का था, उनकी फैशनपरस्त कीमती पोशाक और धूप के इटालियन चश्मे या डिजायनर हैंडबैगों पर विस्तृत टिप्पणियां शरारतन उनका राजनयिक कद कम करने की दृष्टि से की गईं। अगर उनकी जगह कोई पुरुष होता तो उसके सूट या टाई के रस ले-लेकर इतने चर्चे थोड़े ही किए जाते। पर यह आंशिक वजह हो सकती है।

असल वजहें दूसरी हैं और वे छह दशक पुराने भारत-पाक टकराव ही नहीं, 9/11 और फिर 26/11 की संगीन आतंकी वारदातों और फिर पाकिस्तान में आतंकी सरगना ओसामा की मौत से मिले अलकायदा, तालिबान और पाक सेना प्रतिष्ठान के करीबी रिश्तों के अकाट्य प्रमाणों तक फैली हैं। अपनी आर्थिक क्षमता और लोकतांत्रिक तेवरों से भारत ने आज विश्व बिरादरी में जहां ऊंचा स्थान हासिल कर लिया है, वहीं पाकिस्तान में चंद भ्रष्ट परिवारों की जागीर बने लोकतंत्र के ढांचे का आईएसआई और तालिबान के बढ़ते दोहरे दबावों तले बुरा हाल है।

अंतरराष्ट्रीय नजरों में पाक परमाणु बटन पर अलकायदा और कट्टरपंथियों के बढ़ते साये भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए खतरा हैं। ऐसे में भला आसिफ अली जरदारी की सरकार ने क्या सचमुच बेहद कमउम्र और तीन सालों से भी कम का राजनयिक अनुभव वाली हिना रब्बानी खार को विदेश मंत्री बनाकर इस दौरे के मार्फत भारत-पाक राजनय में क्रांतिकारी सुधार लाने की कोई गंभीर उम्मीद की होगी? कहने को कहा जा सकता है कि हिना बुद्धिमती, पढ़ी-लिखी महिला हैं और पाक सत्ता में फातिमा जिन्ना और शेरी रहमान से लेकर बेनजीर तक कई समझदार और राजनीतिक रूप से परिपक्व युवा महिलाएं रही हैं।

पर सच तो यह है कि पाक राजनीति के शीर्ष पर महिलाओं की मौजूदगी और पाक संसद में उनकी (40 प्रतिशत) तादाद सुनने में प्रभावशाली भले लगे, लेकिन अनुभव बताता है कि पाक कूटनीति के कंप्यूटरों में जब भी सक्षम महिलाएं घुसीं, तो प्रोग्राम को मानो वायरस लग गया। पाक सत्ता में महिलाएं अपने दम-खम पर नहीं, पारिवारिक रिश्तों के बूते ही सेना और सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा चुनी जाती रही हैं और सत्ता के असल संचालक उनको गूंगी गुड़िया के ही रूप में कैद रखने के इच्छुक होते हैं।

तनिक भी आजादखयाली और दिलेरी दिखाते ही सेना ने हर महिला को सत्ता से दरबदर कर दिया। अयूब खां की आलोचना के बाद फातिमा जिन्ना के आखिरी दिन अकेलेपन में गुजरे, बेनजीर ने मुशर्रफ को हटाकर लोकतंत्र बहाली की जिद ठानी तो जान की कीमत चुकाई और शेरी रहमान ने जब से उदारवादी गवर्नर सलमान तासीर की हत्या के बाद कट्टरपंथिता का विरोध किया, वे राजनीति से बेदखल हो भूमिगत रहने को बाध्य हैं।

आर्मी के ऐन पड़ोस में अमेरिकी कमांडो हमले में ओसामा की मौत के बाद से सभी समझदार लोग पीपीपी (पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी) नीत सरकार के संभावित पतन के डर से उससे कन्नी काट रहे हैं। इस नाजुक समय में विदेश मंत्रालय को अपने कब्जे में रखने की इच्छुक सेना को अपने पुराने खैरख्वाह और पंजाब के (मूलत: अपनी जमीनी मिल्कियत और सात शादियों के लिए मशहूर) पूर्व गवर्नर गुलाम मुस्तफा खार की भतीजी को विदेश मंत्री बनाना रास आया और जरदारी को भी।

इस कमसिन और स्वघोषित तौर से फैशनपरस्त खानदानी महिला से उसके आका स्वामिभक्ति और पाक विदेश नीति की पिटी-पिटाई लीक पर चलने की उम्मीद कर रहे हैं। हिना की दामी वार्डरोब व गरीबी भरे देश में उसकी जीवन शैली को लेकर भारत का मीडिया चाहे उन्हें हल्केपन से ले, उनकी यही छवि उसके सरपरस्तों को आश्वस्त करती है कि पोलो खेलने और लंदन में शॉपिंग करने वाली यह सोशलाइट लड़की खतरनाक जनवादी-समाजवादी विचारों को नहीं पोसेगी और भरसक उनकी बताई लकीर पर ही चलेगी। बात कड़वी हो, मगर सच है।

लौट जाती है उधर को भी नजर क्या कीजै/अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजै?

2011 में भारत के साथ सीमा रेखा पर गंभीर मोल-तोल करने या भरोसाबहाली की कवायद करने को पाक प्रतिष्ठान के पास ठोस मुद्दे नहीं बचे हैं। न तो वह 26/11 के प्रमाण स्वीकार सकता है और न ही चिह्न्ति आतंकियों के प्रत्यर्पण या उनके सेना में पैठे हैंडलर्स पर कार्रवाई करने की उसकी कोई मंशा है। सीमा पर खर्चीली साझा परियोजनाओं या दीर्घकालिक व्यापारिक समझौतों को साकार करने में भी उसकी सच्ची रुचि नहीं।

अलबत्ता अभी भी रो-झींककर या ब्लैकमेलिंग द्वारा वह अपने घर का राशन-पानी अमेरिका से धरवा रहा है। अत: अमेरिकी दबाव उसे नेकनीयती का नाटक करने को मजबूर कर रहा है। भारत के साथ पाक का सम्मानजनक वार्तालाप संभव है और दोस्ती भी, लेकिन उसके लिए दोनों तरफ अनुभवी, परिपक्व और खुदमुख्तार राजनयिक जरूरी हैं। पल्लू और अलकावलि संभालती रब्बानी सरीखी मंत्री की छवि इस मायने में बहुत सकारात्मक कैनवास नहीं रचती।
Source: मृणाल पाण्डे | Last Updated 00:06(03/08/11)
साभार:-दैनिक भास्कर
http://www.bhaskar.com/article/ABH-he-seems-to-have-returned-2319111.html


देश को क्या दे सकता हूं मैं?

प्यारे दोस्तो, एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश के रूप में भारत 64 वर्षो का सफर तय कर चुका है। यह हम सभी के लिए गौरव और खुशी का क्षण है। साथ ही हमें एक राष्ट्र के रूप में अपने विचारों को पुनर्जीवित करने, अपनी प्रगति की समीक्षा करने और उन चुनौतियों का सामना करने के लिए नई रणनीतियां बनाने की भी जरूरत है, जो 21वीं सदी के भारत के समक्ष मुंह बाए खड़ी हैं। मेरा मानना है कि ऊर्जा और प्रेरणा से भरे युवा हमारी सबसे बड़ी संपदा हैं।

भारत के पास ऐसे 60 करोड़ से भी अधिक युवा हैं और देश के समक्ष स्थित चुनौतियों का सामना करने, उपलब्ध संसाधनों का उपयुक्त दोहन करने और वर्ष २क्२क् तक आर्थिक रूप से विकसित भारत का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए वे हमारी सबसे बड़ी उम्मीद हैं। यहां मैं विशेष रूप से दो युवाओं के बारे में बताना चाहूंगा, जो इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण हैं कि प्रेरणा से भरे युवा किस तरह खुद को और समाज को बदल सकते हैं।

मैं कर सकता हूं : दोस्तो, जब मैं भारत का राष्ट्रपति था, तब 28 अगस्त 2006 को मैं आंध्रप्रदेश के आदिवासी विद्यार्थियों के एक समूह से मिला। मैंने उन सभी से एक ही सवाल किया : ‘तुम क्या बनना चाहते हो?’ कई छात्रों ने इस सवाल का अपनी तरह से जवाब दिया, लेकिन नौवीं कक्षा में पढ़ रहे एक दृष्टिबाधित लड़के ने कहा कि ‘मैं भारत का पहला दृष्टिबाधित राष्ट्रपति बनूंगा।’ मुझे उसकी महत्वाकांक्षा अच्छी लगी, क्योंकि अपने लिए छोटे लक्ष्य तय करना एक अपराध है।

मैंने उसे शुभकामनाएं दी। इसके बाद उस लड़के ने कड़ी मेहनत की और 10वीं की परीक्षा में 90 फीसदी अंक पाए। बारहवीं की परीक्षा में उसने और अच्छा प्रदर्शन करते हुए ९६ फीसदी अंक पाने में कामयाबी हासिल की।

उसका अगला लक्ष्य था एमआईटी कैम्ब्रिज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई। उसकी कड़ी मेहनत और लगन के कारण उसे न केवल एमआईटी कैम्ब्रिज में सीट मिली, बल्कि उसकी फीस भी माफ कर दी गई। उसकी प्रतिभा को देखते हुए जीई (जनरल इलेक्ट्रिक) के वालंटियर्स ने उसकी अमेरिका यात्रा के लिए आर्थिक मदद की।

जब जीई ने उसका ग्रेजुएशन पूरा होने पर उसके समक्ष जॉब का प्रस्ताव रखा, तो उसने जवाब दिया कि यदि वह भारत का राष्ट्रपति नहीं बन पाया तो जरूर इस पर विचार करेगा। इस लड़के का आत्मविश्वास अद्भुत है। संकल्प और दृढ़ता एक दृष्टिबाधित लड़के के जीवन में भी व्यापक बदलाव ला सकते हैं।

सपनों से सोच, सोच से हकीकत : 7 जनवरी २क्११ को मैं मीनाक्षी मिशन हॉस्पिटल में पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी कैंसर यूनिट का शुभारंभ करने मदुरै गया था। कार्यक्रम के दौरान अचानक मैंने देखा कि एक व्यक्ति मेरी तरफ बढ़ा चला आ रहा है। मुझे उसकी शक्ल जानी-पहचानी लगी।

करीब आने पर मैंने देखा कि वह मेरा पूर्व ड्राइवर था। 1982 से 1992 के दौरान जब मैं हैदराबाद में डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैब का डायरेक्टर था, तब वह मेरे लिए काम किया करता था। उसका नाम था वी काथिरेसन। उन दस सालों के दौरान मैंने गौर किया था कि जब वह कार में मेरी प्रतीक्षा किया करता था तो वह उस समय का उपयोग कुछ न कुछ पढ़ने में करता था।

मैंने उससे पूछा तुम फुर्सत के क्षणों में कुछ न कुछ पढ़ते क्यों रहते हो? उसने जवाब दिया कि उसके बच्चे उससे बहुत सवाल पूछते हैं। इसलिए उसने पढ़ना शुरू कर दिया है, ताकि उनके सवालों का कुछ तो जवाब दे पाए। पढ़ाई के प्रति उसकी इस लगन ने मुझे प्रभावित किया।

मैंने उससे कहा कि वह पत्राचार पाठ्यक्रम के जरिये फिर से पढ़ाई की शुरुआत करे और बारहवीं पास करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए तैयारी करे। उसने इसे एक चुनौती की तरह लिया। बीए पास करने के बाद उसने इतिहास में एमए किया। इसके बाद उसने राजनीति विज्ञान में एमए के साथ ही बीएड व एमएड भी किया।

फिर उसने डॉक्टोरल स्टडीज के लिए पंजीयन कराया और वर्ष 2001 में उसने पीएचडी कर ली। तमिलनाडु सरकार के शिक्षा विभाग में उसने कई वर्षो तक सेवाएं दी। वर्ष 2010 में वह मदुरै के निकट मेल्लुर में शासकीय कला महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक बन गया।

हाल ही में, लगभग दस दिन पहले कोविलपट्टी तमिलनाडु के यूपीएमएस स्कूल में मेरी फिर प्रोफेसर काथिरेसन से भेंट हुई। मैंने सभी से उनका परिचय कराया और बताया कि किस तरह वे दो दशक की कड़ी मेहनत के बाद पीएचडी ग्रेजुएट और यूनिवर्सिटी प्रोफेसर बन पाए हैं। उनकी प्रेरक कहानी ने युवा श्रोताओं को बहुत प्रभावित किया।

निष्कर्ष : ‘मैं क्या कर सकता हूं’ : दोस्तो, हमारा देश आजादी के 65वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इस मौके पर मैं आपसे एक बहुत अहम बिंदु पर बात करना चाहता हूं, जो वर्ष 2020 तक आर्थिक रूप से विकसित देश के निर्माण के हमारे लक्ष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

यकीनन, हम सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति कर रहे हैं, जिसके कारण हमारा देश आठ फीसदी की विकास दर के साथ आगे बढ़ रहा है। लेकिन हमारे समक्ष कई गंभीर चुनौतियां भी हैं।

ये हैं भ्रष्टाचार और नैतिक पतन, पर्यावरण को क्षति और समाज में बढ़ती संवेदनहीनता। कुछ बुराइयां हैं, जिन्हें युवावस्था की भलाइयों से परास्त किया जा सकता है। ऐसी बुराइयां आखिर आती कहां से हैं? तमाम बुराइयों की जड़ है अंतहीन लोभ।

भ्रष्टाचार मुक्त और नैतिक समाज और स्वच्छ पर्यावरण के लिए ‘मैं क्या ले सकता हूं’ के स्थान पर ‘मैं क्या दे सकता हूं’ की भावना आनी चाहिए। देश के नागरिकों और खास तौर पर युवाओं को खुद से यह सवाल बार-बार पूछना चाहिए : ‘मैं अपने देश को क्या दे सकता हूं।’

क्या मैं पर्यावरण के लिए कुछ कर सकता हूं? क्या मैं इस धरती और इस पर रहने वाले मनुष्यों की रक्षा पर्यावरण की क्षति से होने वाली आपदाओं से कर सकता हूं? अरबों लोगों के लिए अरबों वृक्ष, इस बात को ध्यान में रखते हुए आज हम यह तय कर सकते हैं कि हम सभी पांच-पांच पौधे रोपेंगे और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेंगे।

या क्या मैं कुछ संवेदनाओं का परिचय दे सकता हूं? क्या मैं उन लोगों की सेवा कर सकता हूं, जो कष्ट में हैं और उनकी मदद करने वाला कोई नहीं है? हम किसी अस्पताल जाकर उन मरीजों को थोड़ी-सी खुशी दे सकते हैं, जिनसे मिलने कोई नहीं आता। आप फूल दे सकते हैं, फल दे सकते हैं, उनके मन में कुछ उत्साह जगा सकते हैं।

या फिर क्या मैं मुस्कराहटें बांट सकता हूं? क्या मैं अपने देशवासियों के लिए कुछ ऐसा कर सकता हूं कि उनके जीवन में मुस्कराहटें खिल जाएं? आज के दिन हर युवा यह शपथ ले सकता है कि मैं अपनी मां को खुशियां दूंगा। मां खुश होंगी तो घर खुश होगी, घर खुश होगा तो समाज खुश होगा और समाज खुश होगा तो पूरा देश खुश होगा।

या क्या मैं गांवों की स्थिति सुधारने के लिए ही कुछ प्रयास कर सकता हूं? क्या मैं प्रोवाइडिंग अर्बन एमेनेटीज इन रूरल एरियाज (पीयूआरए) कार्यक्रम के जरिये अपने गांव और देशभर के गांवों की तस्वीर बदल सकता हूं?

दोस्तो, मैं चाहूंगा कि यह लेख पढ़ने वाला हर व्यक्ति ‘मैं क्या दे सकता हूं’ अभियान (www.whatcanigive.info) का एक हिस्सा बने। मैंने और मेरी युवा टीम ने अभियान के लिए नौ चेप्टर तय किए हैं, जो कई महत्वपूर्ण सामाजिक, नैतिक और पर्यावरणगत प्रश्नों का सामना करते हैं। इस अभियान के केंद्र में हैं देश के युवा।

‘मैं क्या दे सकता हूं’ अभियान का लक्ष्य है नैतिक रूप से संपन्न युवाओं की पीढ़ी तैयार करना। हम युवाओं को बदल पाए तो देश को भी बदल पाएंगे। पाठकों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं।

लेने के बजाय देने का भाव

भ्रष्टाचार मुक्त समाज के लिए ‘मैं क्या ले सकता हूं’ के स्थान पर ‘मैं क्या दे सकता हूं’ की भावना आनी चाहिए। देश के नागरिकों और खास तौर पर युवाओं को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए : ‘मैं देश को क्या दे सकता हूं।’

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम
लेखक
भारत के पूर्व राष्ट्रपति हैं।
साभार:-दैनिक भास्कर
Source: डॉ. एपीजे अब्दुल कल� | Last Updated 00:24(15/08/11)
http://www.bhaskar.com/article/ABH-what-can-i-give-to-the-country-2355147.html

संसद से लेकर सड़क तक

अन्ना हजारे की गिरफ्तारी ने कई सवाल खड़े कर दिए। आखिर सरकार ने अन्ना को तिहाड़ जेल क्यों भेजा? अगर अन्ना से खतरा था तो उसी दिन शाम तक उन्हें रिहा करने का फैसला क्यों लिया? अगर अन्ना पहले ही अनशन पर बैठ जाते, तो कौन-सा पहाड़ टूट जाता? क्या सरकार को, कांग्रेस पार्टी को अंदाजा नहीं था कि अन्ना को जेल भेजने की देश में इतनी जबरदस्त प्रतिक्रिया होगी? क्या इसी से डरकर रातों-रात अन्ना को छोड़ने का फैसला लिया गया?

1975 में जब जयप्रकाश नारायण को इसी तरह सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए गिरफ्तार किया गया था तो उन्होंने कहा था, ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’। इस बार भी वही हुआ। अन्ना हजारे को इसलिए गिरफ्तार किया गया, क्योंकि इस सरकार के पास राजनैतिक सवालों के वकीलों वाले समाधान हैं। प्रधानमंत्री के सलाहकार मंत्री वे वकील हैं, जो हर समस्या के निदान के लिए कानून की किताब देखते हैं। जिस लड़ाई को कांग्रेस को सड़क पर लड़ना चाहिए था, वह सीआरपीसी और पुलिस के जरिए लड़ी जा रही है।

चिदंबरम और कपिल सिब्बल ने अन्ना की गिरफ्तारी के बाद जो बातें कहीं, उनके आधार पर चलें, तो कांग्रेस को उत्तरप्रदेश में मायावती के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए भी उन्हीं से अनुमति मांगनी पड़ेगी। मायावती तय करेंगी कि कांग्रेस के कितने व्यक्ति प्रदर्शन करें, कितने घंटे करें, कहां करें। अगर येदियुरप्पा के खिलाफ कांग्रेस को आवाज उठानी होगी, तो सदानंद गौड़ा से पूछेंगे कि बता दें किस तारीख को और कहां धरना दें?

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन के लिए अनुमति लेनी पड़े, ये मजाक की बात है।

मुझे लगता है सरकार में बैठे लोगों को जरा भी अंदाजा नहीं था कि अन्ना का आंदोलन इतना विशाल रूप ले लेगा। हर जगह लोग सड़कों पर उतर आए। इनमें बड़ी संख्या नौजवानों की है। प्रदर्शनकारियों में ऐसे युवा भी हैं, जिनका राजनीति से कोई वास्ता नहीं है। इसका असर राहुल गांधी की राजनीति पर पड़ सकता है, क्योंकि वे नौजवानों के नेता बनने के लिए जुटे हुए हैं।

कांग्रेस के नेताओं को भी अंदाजा नहीं था कि लोग भ्रष्टाचार से इतने परेशान हैं। पिछले साल भर में जिस तरह एक के बाद घोटाले सामने आए, उससे लोग गुस्साए हुए थे। अन्ना इसी गुस्से को जाहिर करने का बहाना बन गए हैं। यही अन्ना की ताकत है। जो लोग महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान हैं, अन्ना उनकी नाराजगी का प्रतीक बन गए हैं, इसीलिए तिहाड़ जेल के बाहर, इंडिया गेट से लेकर जंतर-मंतर तक, छोटे-बड़े शहरों में लोग इस अभियान में अन्ना-अन्ना करते नजर आ रहे हैं।

सवाल ये है कि अगर अन्ना पहले दिन ही अनशन कर लेते, तो क्या हो जाता? सरकार क्यों इतनी बौखला गई? मुझे लगता है इसकी वजह है सरकार में बैठे कुछ लोगों का अहंकार। वे लोग, जो कुछ दिन पहले अन्ना हजारे और रामदेव के सामने नतमस्तक हो गए थे, उन्हें अचानक लगा कि अन्ना और रामदेव से बात करके गलती कर दी। सरकार का इकबाल तो डंडे से कायम होता है, इसीलिए पुलिस की आड़ में डंडा चलाने का फैसला किया गया। मजे की बात ये है कि जब डंडा फेल हो गया तो अपनी दुर्गति के लिए सरकार ने मीडिया को जिम्मेवार बता दिया।

कपिल सिब्बल की सुनें तो अन्ना हजारे को मीडिया ने हीरो बना दिया है। अगर टीवी चैनल न होते, तो इस आंदोलन का असर नहीं होता। लेकिन मुझे लगता है कि अगर जनता भ्रष्टाचार से परेशान न होती और सरकार इतना अहंकार न दिखाती तो टीवी कैमरों का इतना असर नहीं होता। फर्क ये है कि टीवी कैमरे आम आदमी का दर्द दिखा रहे हैं और इस सरकार के सबसे ज्यादा बोलने वाले मंत्री इस दर्द को छुपा रहे हैं।

इससे ज्यादा शर्म की बात क्या हो सकती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाने वाले अन्ना को उसी जेल में रखा गया, जहां राजा और कलमाडी कैद हैं। अन्ना अपराधी नहीं हैं। उन्होंने कोई कानून नहीं तोड़ा, किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। उन्हें जेल भेजना कानूनन सही हो सकता है, लेकिन राजनीति की भाषा में इसे आत्मघाती कदम कहा जाएगा। आपातकाल में भी जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी को गिरफ्तार करके गेस्ट हाउस में रखा गया था, क्योंकि वे अपराधी नहीं थे।

मजे की बात ये है कि सरकार सब कुछ करने के बाद कह रही है कि अन्ना को गिरफ्तार करना पुलिस का फैसला है। क्या चिदंबरम लोगों को मूर्ख समझते हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि पुलिस अन्ना को बिना गृह मंत्री की अनुमति के गिरफ्तार कर ले? ये भी नहीं हो सकता कि चिदंबरम को जानकारी न हो कि अन्ना कहां हैं? एक बच्चा भी जानता है कि पुलिस कमिश्नर गृह मंत्री से पूछे बिना सांस भी नहीं ले सकते।

कपिल सिब्बल और चिदंबरम की इस गैरराजनीतिक शैली का नुकसान हुआ कांग्रेस को। एक तरफ तो लगा कि कांग्रेस के पास कोई दिशा नहीं है। कभी अन्ना के साथ पांच-पांच मंत्री बैठकर बिल बनाते हैं, फिर उसी अन्ना को सिर से पांव तक भ्रष्ट बताते हैं। कभी उन्हें जेल भेजते हैं, कभी सिर पर बिठाते हैं, कभी उन्हें खतरा बताते हैं, कभी उनसे खुद डर जाते हैं।

अब मुसीबत ये है कि अन्ना के सवाल पर कांग्रेस की विरोधी पार्टियां एक हो गई हैं। लेफ्ट के नेताओं ने भाजपा के साथ मिलकर प्रधानमंत्री से जवाब मांगा। चंद्रबाबू और मुलायम साथ हो गए। विरोधी दलों की एकता सरकार को भारी पड़ सकती है। दूसरी तरफ कांग्रेस के सहयोगी दल खामोश हैं। वे इसे सिर्फ कांग्रेस की लड़ाई मान रहे हैं।

यह गठबंधन की सरकार के लिए अच्छा संकेत नहीं है। संसद में विपक्ष और सड़क पर जनता, सरकार किस-किस को रोकेगी? अन्ना की गिरफ्तारी के बाद सवाल अब लोकपाल बिल तक ही सीमित नहीं रह गया है। सवाल ये है कि इस मुल्क में लोकतंत्र रहेगा या नहीं?

सवाल ये है कि आम आदमी को अपनी आवाज उठाने के लिए क्या सरकार से इजाजत लेनी होगी? क्या सत्ता के अहंकार में डूबे मंत्री हर आवाज उठाने वाले को भ्रष्ट करार देते रहेंगे? अगरये हुआ तो इतिहास 1970 के दशक की संपूर्ण क्रांति को दोहराएगा। देश का नौजवान फिर ‘दिनकर’ की कविता गाएगा : ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है..।’


सरकार की दिशाहीनता इसी से जाहिर होती है कि कभी अन्ना के साथ पांच-पांच मंत्री बैठकर बिल बनाते हैं, फिर उसी अन्ना को सिर से पांव तक भ्रष्ट बताते हैं, कभी उन्हें जेल भेजते हैं, कभी सिर पर बिठाते हैं, कभी उन्हें खतरा बताते हैं, कभी उनसे खुद डर जाते हैं।
rajat.sharma@indiatvnews.com
लेखक इंडिया टीवी के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ हैं
साभार:-दैनिक भास्कर
Source: रजत शर्मा | Last Updated 00:47(19/08/11)
http://www.bhaskar.com/article/ABH-up-the-road-from-parliament-2362627.html