Wednesday, August 24, 2011

आत्मघात पर आमादा सरकार

अन्ना हजारे के आंदोलन के संदर्भ में केंद्र सरकार की दलीलों में आपातकाल वाली मानसिकता देख रहे हैं स्वप्न दासगुप्ता

आपातकाल को लेकर मेरी स्मृति पर अमिट छाप दिल्ली विश्वविद्यालय के दो प्रगतिशील प्राध्यापकों की बातचीत की पड़ी। इनमें से एक ने उल्लासपूर्वक दूसरे से कहा कि संस्कृत विभाग में प्राध्यापकों की कमी हो गई है। इनमें से अधिकांश को गिरफ्तार कर लिया गया है। उनकी आवाज में न तो गुस्सा था और न ही भय, था तो तुच्छ आनंद। इस खुशी का अंतनिर्हित भाव विश्वविद्यालय से चिरपरिचित लोगों के लिए स्पष्ट था। संस्कृत विभाग में जनसंघी और खाकी हॉफ पैंट वाले थे और इसलिए वे सहानुभूति के पात्र नहीं थे। भय से भरे उन दिनों में विश्वविद्यालय के दो छोर थे। कृपापात्र ध्रुव में प्रगतिशील कांग्रेसी कार्यकर्ता और सोवियत संघ के मित्र भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य शामिल थे, जबकि दूसरे ध्रुव पर वे लोग थे जिन्हें प्रगतिशील दक्षिणपंथी, सांप्रदायिक और जातिवादी नामों से पुकारते थे। इतिहास के प्रगतिशील संस्करण के अनुसार, (जिसे भारत के प्रमुख पाठ्य पुस्तक इतिहासकारों ने बड़ी वफादारी से लिखा है) यह कट्टरपंथी, सांप्रदायिक और जातिवादी शक्तियों का इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल करने का अभियान था। इसके लिए संसदीय प्रक्रिया और पार्टी व्यवस्था को संकट में डाल दिया गया था। इसी कारण सरकार को आपातकाल लगाने को मजबूर होना पड़ा था। चूंकि लोकतंत्र को इसके शत्रुओं से बचाने के लिए आपातकाल लागू किया गया तो स्वाभाविक रूप से संवैधानिक सरकार के संस्कृत भाषी शत्रुओं का एक ही उचित स्थान था-जेल। पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में होने वाली नाटकीय घटनाओं, खासतौर पर प्रधानमंत्री के इस बयान कि संसद को सड़क की भीड़ के हवाले नहीं किया जा सकता, में संसद की शक्तियों और पवित्रता की वैसी ही गलत व्याख्या की जा रही है जैसी 36 साल पहले आपातकाल लागू करते वक्त की गई थी। उस समय भी इसे भ्रष्टाचार व स्वेच्छाचारिता में जंग और लोकतंत्र व संसदीय प्रक्रिया के लिए चुनौती के रूप में प्रचारित किया गया था। लामबंदी के संदर्भ में लोगों को सड़कों पर लाने की जयप्रकाश नारायण की क्षमता अन्ना हजारे के एकजुटता के प्रदर्शन से कहीं अधिक थी। 6 मार्च, 1975 को जयप्रकाश नारायण ने आठ किलोमीटर लंबे संसद मार्च का नेतृत्व किया था। हालांकि, प्रत्यक्ष समानताओं के बावजूद यह कहना गलत होगा कि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के प्रति मनमोहन सिंह का रवैया आपातकाल सरीखे हालात पैदा कर रहा है। इसमें कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं। अन्ना का आंदोलन स्वत:स्फूर्त, मीडिया समर्थित और मैगसेसे पुरस्कार विजेता लोगों के भरोसे है, वहीं इसके विपरीत जेपी आंदोलन इससे कहीं अधिक संगठित था और इसे सभी प्रमुख गैरकम्युनिस्ट पार्टियों और उनसे संबंधित छात्र संगठनों का समर्थन हासिल था। जयप्रकाश नारायण प्रतीकात्मक नेता मात्र थे। उनके आंदोलन में मुख्य भूमिका राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने निभाई। जबकि अन्ना आंदोलन से जानबूझ कर राजनीतिक पार्टियों को दूर रखा गया है। इसका एक कारण यह भी है कि पूरा राजनीतिक तबका ही अपने आप में समस्या बन गया है। इसके अलावा तथाकथित अन्ना टीम को राजनेताओं द्वारा आंदोलन ग्रहण कर लिए जाने का भी खतरा है। राजनीतिक दलों से अलगाव के कारण अन्ना की नैतिक श्रेष्ठता का आभामंडल बन गया है। हालांकि, इस सच्चरित्रता के अतिरंजित भाव की कीमत भी चुकानी पड़ी है। अन्ना आंदोलन की सामाजिक गहराई सीमित है। भौगोलिक रूप से यह मेट्रो और बड़े शहरों तक सीमित है और सामाजिक रूप से यह मुख्यत: छात्रों, सेवानिवृत्त लोगों और छोटे व्यापारियों तक सीमित रह गया है। अयोध्या और मंडल आंदोलन की तुलना में अन्ना का आंदोलन एक उत्सव सरीखा लगता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा अन्ना हजारे के खिलाफ कार्रवाई को दिल्ली पुलिस प्रमुख का स्वायत्त ऑपरेशन बताना राजनीतिक अक्षमता और संप्रग सरकार की कमजोरी को उजागर करता है। आपातकालीन मन:स्थिति के कारण ही गलत आकलनों का सिलसिला शुरू हुआ। रामदेव आंदोलन के दमन की सफलता से उत्साहित सरकार ने सोचा कि यही प्रक्रिया अन्ना हजारे के खिलाफ भी कारगर साबित होगी। अन्ना हजारे और उनकी टीम के चरित्रहनन के प्रयासों और बाद में गिरफ्तारी से यह साफ हो गया था कि कांग्रेस टकराव की लाइन पर चल रही है। यह सरकार की आपातकालीन मन:स्थिति ही थी जिस कारण उसने एक दुरूह बिल के मुद्दे को व्यापक जनाक्रोश में बदल दिया और अपनी ऐसी छवि बना ली कि उसे लोकतांत्रिक अधिकारों की लेशमात्र भी परवाह नहीं है। ठीक ऐसा ही रामदेव प्रकरण में हुआ था, किंतु इस बार अन्ना मामले में सरकार ने गलत नंबर मिला दिया। तिहाड़ जेल में समर्थन ने सरकार की कमजोरी को उजागर कर दिया। इससे सरकार की स्थिति हास्यास्पद हो गई। साथ ही जानते-बूझते हुए मनमोहन सिंह ने सिविल अधिकारों पर आपातकालीन सरीखा कुठाराघात कर दिया। आपातकाल एक मजबूत नेता का योगदान था और वह इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थीं। आज सरकार की राजनीतिक अधिसत्ता शक्ति के दो केंद्र होने के कारण गिर चुकी है। प्रधानमंत्री कमजोर मिट्टी के हैं और इसके युवा आइकन की भूमिका को 73 साल के पुराने गांधीवादी ने हथिया लिया है।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
साभार:-दैनिक जागरण
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/article/index.php?page=article&choice=print_article&location=8&category=&articleid=111719275674360784

इरादों पर संदेह

जनलोकपाल को लेकर अन्ना हजारे के प्रचंड आंदोलन से उपजे विषम हालात के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चुप्पी तोड़ते हुए जो कुछ कहा उससे गतिरोध टूटने के बारे में सुनिश्चित नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि उन्होंने बातचीत के संकेत देने के साथ ही यह भी कहा कि संसदीय प्रक्रिया समय लेती है। इसमें संदेह नहीं कि संसदीय प्रक्रिया समय लेती है, लेकिन आम जनता शायद ही इस पर भरोसा कर सके कि मनमोहन सरकार मजबूत और प्रभावी लोकपाल लाने के लिए प्रतिबद्ध है। यदि वह प्रतिबद्ध है तो फिर एक लचर लोकपाल विधेयक लेकर क्यों आई? इस विधेयक का टीम अन्ना और उनके लाखों समर्थक ही नहीं, बल्कि मुख्य विपक्षी दल के साथ नौ दलों का एक समूह भी विरोध कर रहा है? क्या सरकार के पास इस सवाल का कोई जवाब है कि वह ऐसा विधेयक लेकर क्यों आई जो उसके अलावा अन्य किसी को रास नहीं आ रहा? ध्यान रहे कि ऐसा कमजोर विधेयक तब आया जब सरकार ने टीम अन्ना से न केवल लंबी बातचीत की, बल्कि उसके जनलोकपाल को अच्छी तरह देखा-परखा भी। यदि जनलोकपाल के कुछ बिंदु सरकारी लोकपाल विधेयक में शामिल हो सकते थे तो ऐसा पहले ही क्यों नहीं किया गया और यदि जनलोकपाल विचार करने योग्य नहीं था तो अब यह क्यों कहा जा रहा है कि उसके कुछ बिंदुओं को अपनाया जा सकता है? सरकार ने जिस तरह संसद के मानसून सत्र को आगे खिसकाया और ऐसे हालात पैदा किए जिससे कमजोर लोकपाल विधेयक भी इस सत्र में पारित न हो सके उससे आम जनता को यही संदेश गया कि अन्ना के साथ-साथ देश को भी धोखा देने की सोची-समझी चाल चली गई। सरकार ने रही-सही कसर अनशन पर बैठने जा रहे अन्ना को गिरफ्तार कर पूरी दी। आखिर ऐसी सरकार पर जनता इतनी आसानी से यह यकीन कैसे कर ले कि वह एक मजबूत और प्रभावी लोकपाल लाने के लिए तैयार है? सरकारी लोकपाल विधेयक पर विचार-विमर्श कर रही कार्मिक, जन शिकायत और विधि एवं न्याय मंत्रालय की स्थाई समिति भले ही जनलोकपाल के कुछ बिंदुओं को अपनाने के संकेत दे रही हो, लेकिन तथ्य यह है कि इस समिति में ऐसे प्रभावशाली सांसदों की अच्छी-खासी संख्या है जिन्हें न तो अन्ना हजारे रास आ रहे हैं और न ही उनका जनलोकपाल। इनमें एक सदस्य तो अन्ना को सिर से पैर तक भ्रष्ट बताने के साथ उन्हें अपराधी भी ठहरा चुके हैं। यह निराशाजनक है कि अपने कर्मो से साख गंवाने वाली सरकार ऐसी कोई ठोस पहल नहीं कर सकी जिससे आम जनता उस पर भरोसा कर सके और साथ ही एक सक्षम लोकपाल व्यवस्था के निर्माण का रास्ता साफ हो सके। अब वह जनता को संतुष्ट करने के बजाय संसद की आड़ ले रही है। निश्चित रूप से अन्ना हजारे की इस मांग का समर्थन नहीं किया जा सकता कि 30 अगस्त तक जनलोकपाल विधेयक संसद से पारित कर दिया जाए, लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि सरकार यह प्रदर्शित करे कि वह कुछ करने की स्थिति में नहीं। यह समझना कठिन है कि जनलोकपाल पर संसद में चर्चा करने में क्या कठिनाई है? जब राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के विधेयकों पर संसद में विचार हो सकता है तो जनलोकपाल पर क्यों नहीं? बेहतर हो कि सरकार संसद की आड़ में अडि़यल रवैया अपनाने के स्थान पर लचीला रुख अपनाए।
साभार:-दैनिक जागरण
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/article/index.php?page=article&choice=print_article&location=8&category=&articleid=111719209374199000

भ्रष्टाचार से मुक्ति का मार्ग

लोकपाल पर सरकार और सिविल सोसाइटी से टकराव का रास्ता छोड़कर सुलह के प्रयास करने की अपेक्षा कर रहे हैं सुभाष कश्यप

भ्रष्टाचार को लेकर मध्य वर्ग और युवाओं में भारी आक्रोश है। इससे आज देश का एक बड़ा जनमानस प्रभावित और परेशान है। इसलिए भ्रष्टाचार को लेकर लड़ाई लड़ रही सिविल सोसाइटी की मांगों के प्रति सरकार का टकरावपूर्ण रवैया किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह सरकार की हठधर्मिता का परिचायक है। यह संसदीय लोक प्रक्रिया की दृष्टि से भी हटकर है। देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान ने यह अधिकार दिया है कि वह न केवल अपनी मांगें कर सकता है, बल्कि इससे संबंधित प्रस्ताव अथवा बिल सरकार के पास विचारार्थ प्रस्तुत कर सकता है। इस प्रस्ताव अथवा बिल को मानना या न मानना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और वह चाहे तो इसे संसद में रखे अथवा न रखे? अन्ना हजारे की टीम द्वारा बनाया गया जनलोकपाल बिल भी इसी श्रेणी में आता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अन्ना हजारे की टीम और सरकार के प्रतिनिधियों के बीच लंबे विचार-विमर्श और मेल-मिलाप के बावजूद संसद की स्थाई समिति के पास जो प्रस्ताव भेजा गया वह सशक्त लोकपाल की संभावनाओं को कमजोर करने वाला है। इससे साफ जाहिर होता है कि सरकार भ्रष्टाचार से लड़ाई के प्रति बहुत प्रतिबद्ध नहीं है और उससे यह अपेक्षा भी नहीं की जा सकती, क्योंकि वर्तमान राजनीतिक दल व्यवस्था और निर्वाचन व्यवस्था दोषपूर्ण होने से भ्रष्ट लोगों की संख्या संसद में अधिक है और भ्रष्ट लोग कतई नहीं चाहेंगे कि ऐसा कोई प्रस्ताव पारित हो अथवा कानून बने जिससे उनकी बाहें आसानी से मरोड़ी जा सकें। भ्रष्टाचार से लड़ाई के लिए अन्ना की टीम को और देश के दूसरे वर्गो को कुछ अधिक व्यावहारिक बातों पर जोर देने की आवश्यकता है। सबसे पहले हमें इस बात को समझना होगा कि भ्रष्टाचार है क्या और इसके कारण व Fोत क्या हैं? भ्रष्टाचार की जड़ में व्यवस्था सर्वोपरि है और व्यवस्था को बदले बिना हम भ्रष्टाचार से लड़ाई नहीं लड़ सकते। इस व्यवस्था में बदलाव के लिए जो सबसे पहला कदम है वह दोषपूर्ण राजनीतिक दल व्यवस्था और निर्वाचन प्रक्रिया में तत्काल सुधार लाने का है। इसके अलावा हमें संसदीय, प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था में भी बड़े स्तर पर बदलाव करने होंगे, जिसके लिए अधिक बड़े प्रयास की आवश्यकता है। अन्ना हजारे को समझना चाहिए कि उनकी लड़ाई भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए है, न कि जनलोकपाल के लिए। एक सशक्त लोकपाल की उनकी लड़ाई सही है, लेकिन यह मान लेना भी ठीक नहीं होगा कि केवल लोकपाल बना देने से भ्रष्टाचार का रावण मर जाएगा। लोकपाल के दायरे में न्यायपालिका और प्रधानमंत्री को अनिवार्य रूप से शामिल करने की उनकी मांग भी सही नहीं है, क्योंकि किसी एक संस्था के पास इतनी अधिक शक्तियां होना किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं होगा। एक ही लोकपाल को इतनी अधिक शक्तियां देने से बेहतर यह है कि हम संसदीय लोकपाल अलग बनाएं और न्यायिक लोकपाल अलग। इससे संस्थाओं के बीच परस्पर टकराव को भी रोका जा सकेगा और उनके अधिकार क्षेत्रों की विशिष्टता भी कायम रहेगी, लेकिन इसके लिए दोनों ही पक्षों को फिर से मिल-बैठकर एक राजनीतिक समाधान तलाशने की दिशा में काम करने की जरूरत है। जहां तक अन्ना के आमरण अनशन की बात है तो यह भी सही नहीं है, क्योंकि समाधान का रास्ता बातचीत से ही निकल सकता है, न कि अपनी बातों पर अड़े रहने से। सरकार ने शुरुआत में ही अन्ना को गिरफ्तार करके उन्हें और उनके समर्थकों को और अधिक आक्रोशित होने का मौका दे दिया जिसके लिए निश्चित रूप से सरकार दोषी है, लेकिन अब जब सरकार ने भी बातचीत की पेशकश की है तो अन्ना की टीम को फिर से अपनी बातें रखनी चाहिए। एक रास्ता यह भी हो सकता है कि अन्ना की टीम संसद की स्थाई समिति के सामने अपनी बातें और प्रस्ताव पेश करे। इसके अलावा कोई सांसद व्यक्तिगत रूप से भी सिविल सोसाइटी के बिल को संसद में पेश कर सकता है। संसद की स्थाई समिति के पास सरकार द्वारा रखा गया लोकपाल बिल का स्वरूप अभी अंतिम नहीं है और इसमें फेरबदल किया जा सकता है। स्थाई समिति जब इसे अंतिम स्वरूप दे देगी तो इसे संसद के पटल पर पेश किया जाएगा, जिस पर संसद सदस्य बहस करेंगे और यदि आवश्यक हुआ तो इसके प्रावधानों में अंतिम अनुमति मिलने से पहले बदलाव किया जा सकता है। इसलिए अभी भी वक्त है कि टकराव के रास्ते को छोड़कर आम सहमति का रास्ता तलाशा जाए। दूसरे यह भी समझना होगा कि सरकार और संसद एक नहीं है। यदि सरकार अन्ना की बातों को नहीं मानती है तो संसद में जाया जा सकता है, जिसके लिए बाकी राजनीतिक दलों को पहल करने की जरूरत है। अन्ना हजारे को चाहिए कि वह अपना आमरण अनशन खत्म करें और संवैधानिक प्रक्रिया में किसी तरह की बाधा न पैदा होने दें। सिविल सोसाइटी पूरे देश की प्रतिनिधि नहीं हो सकती और संसद उससे कहीं अधिक सर्वोच्च और संप्रभु है। इसलिए अपनी बात अनिवार्य रूप से मनवाने के लिए संसद पर किसी तरह का दबाव अथवा शर्ते थोपना ठीक नहीं होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्तमान व्यवस्था में तमाम खामियों, व्यापक भ्रष्टाचार और असंवेदनशीलता के कारण ही स्थितियां इतनी उलझी हैं। सरकार का यह कहना सही नहीं है कि सिविल सोसाइटी का मसौदा संसद में नहीं पेश किया जा सकता है। यदि सोनिया गांधी के नेतृत्व में बनी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के प्रस्तावों को कैबिनेट की मंजूरी से संसद में रखा जा सकता है तो सिविल सोसाइटी के प्रस्तावों को सरकार अपने प्रस्ताव में शामिल क्यों नहीं कर सकती? इस संदर्भ में हमें नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद जैसी सुपर कैबिनेट संस्थाओं की कोई वैधानिकता नहीं है इसलिए सिविल सोसाइटी को भी संसद का पर्याय नहीं माना जा सकता, लेकिन यहां सवाल भ्रष्टाचार के मुद्दे का है। लोकतांत्रिक संस्थाओं के दायरे और अधिकार क्षेत्र की व्याख्या में पड़ने से ज्यादा जरूरी भ्रष्टाचार के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का है, जो अन्ना का भी उद्देश्य है। आज जो सबसे बड़ी जरूरत है वह है पूरी व्यवस्था में बदलाव लाने की, क्योंकि सख्त कानून बना देने भर से परिवर्तन आ जाने की अपेक्षा करना ठीक नहीं होगा। तात्कालिक तौर पर निर्वाचन और राजनीतिक दल व्यवस्था में ऐसा बदलाव लाया जाए ताकि भ्रष्ट लोग चुनकर ही न आ सकें और जब तक ऐसा नहीं होता तब तक भ्रष्टाचार का कैंसर खत्म नहीं होने वाला।
(लेखक संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
साभार:-दैनिक जागरण
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भ्रष्टाचार पर सही संदेश

जब देश भ्रष्टाचार के विरोध में उबल रहा है तब यह सुखद है कि राज्यसभा ने धन की हेराफेरी और कदाचार के आरोपी कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन को हटाने संबंधी महाभियोग आवश्यक बहुमत से पारित कर दिया। इस महाभियोग प्रस्ताव का पारित होना एक ऐतिहासिक घटना है, क्योंकि स्वतंत्र भारत में यह पहली बार है जब किसी न्यायाधीश के खिलाफ संसद के उच्च सदन ने महाभियोग प्रस्ताव पारित किया हो। इस ऐतिहासिक क्षण के बावजूद तथ्य यह है कि सौमित्र सेन की न्यायाधीश पद से विदाई तब हो सकेगी जब लोकसभा से भी ऐसा ही प्रस्ताव पारित होगा। इससे यह स्पष्ट है कि उच्चतर न्यायपालिका के किसी भ्रष्ट न्यायाधीश को हटाना कितना जटिल काम है। सौमित्र सेन के खिलाफ राज्यसभा की कार्रवाई के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह एकलौते ऐसे न्यायाधीश हैं जो कदाचार में लिप्त पाए गए। सच्चाई यह है कि ऐसे न्यायाधीशों के नाम सामने आते रहे हैं जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते रहे और फिर भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। यदि सिक्किम उच्च न्यायालय के न्यायाधीश दिनकरन त्यागपत्र नहीं देते तो वह महाभियोग प्रस्ताव का सामना करने तक अपने पद पर बने रहते। भ्रष्ट न्यायाधीशों को महाभियोग के जरिये हटाने की प्रक्रिया का एक पहलू यह भी है कि जब कभी ऐसी नौबत आती है तो संकीर्ण राजनीति भी सतह पर आ जाती है। यह जानना कठिन है कि बसपा को सौमित्र सेन के बचाव में खड़े होने की क्यों सूझी? सौमित्र सेन के पहले 1993 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश वी रामास्वामी ने महाभियोग का सामना किया था, लेकिन तब कांग्रेस ने उनका वैसे ही बचाव किया था जैसे बसपा ने सौमित्र सेन का किया। सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान राज्यसभा ने लगभग एक मत से महसूस किया कि न्यायिक जवाबदेही विधेयक के पारित होने में आवश्यकता से अधिक देरी हो रही है। दुर्भाग्य से यह राजनीतिक दलों को ही बताना है कि यह विधेयक पारित होने का नाम क्यों नहीं ले रहा है? जनता को केवल इस सवाल का ही जवाब नहीं चाहिए, बल्कि वह यह भी जानना चाहती है कि आखिर संसद सार्वजनिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में समर्थ क्यों नहीं हो पा रही है? पिछले दिनों अन्ना हजारे की गिरफ्तारी के मुद्दे पर संसद में चर्चा के दौरान ज्यादातर नेताओं ने जन लोकपाल के खिलाफ तो ढेरों तर्क दिए, लेकिन उनमें से कोई भी आम जनता को इस पर संतुष्ट करने में समर्थ नहीं हो सका कि सरकार द्वारा पेश लोकपाल विधेयक भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने में समर्थ साबित होगा। यह निराशाजनक है कि जब जन लोकपाल के मुद्दे पर सारा देश अन्ना हजारे के पीछे खड़ा हो गया है तब संसद में एक ऐसे लोकपाल विधेयक पर विचार होने जा रहा है जिस पर जनता भरोसा करने के लिए तैयार नहीं। यह सही है कि कानून बनाने का अधिकार संसद को ही है, लेकिन उसने यह देखने-समझने की दृष्टि खो दी है कि कानून का निर्माण जन भावनाओं के अनुरूप हो। संसद का यह दायित्व बनता है कि देश को यह भरोसा दिलाए कि वह सर्वोच्च होने के साथ-साथ सक्षम भी है।
साभार:-दैनिक जागरण
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/article/index.php?page=article&choice=print_article&location=8&category=&articleid=111719108074071968

संसद के लिए संदेश सुनने का समय

अन्ना हजारे के आंदोलन से संसदीय गरिमा घटने की दलील को अनुचित और सच्चाई की अनदेखी करने वाली मान रहे हैं अंशुमान तिवारी

सरकार ठीक कहती है, दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर मुंबई के आजाद मैदान तक हवा में लहराती हजारों मुट्ठियां संसद पर ही सवाल उठा रही हैं। जनता के सवाल लोकतंत्र में महाप्रतापी संसद की गरिमा और सर्वोच्चता पर हैं नहीं, लोग तो संसद की स्थिति, उपयोगिता, योगदान, नेतृत्व, दूरदर्शिता, सक्रियता और मूल्यांकन पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। बदहवास सरकार, जड़ों से उखड़ी कांग्रेस और मौकापरस्त विपक्ष को यह कौन बताए कि जब-जब संसदीय गरिमा का तर्क देकर संविधान दिखाते हुए पारदर्शिता रोकने (जनलोकपाल) की कोशिश होती है तो लोग और भड़क जाते हैं। देश उस संसद से ऊब रहा है जो चलती ही नहीं है। वह संसद, जिसका आचरण शर्म से भर देता है। वह संसद, जहां नोट बांटने वाले सम्मान के साथ बरी हो जाते हैं। वह संसद, जो उन्हें लंबे इंतजार के बावजूद भ्रष्टाचार का एक ताकतवर पहरेदार यानी लोकपाल नहीं दे सकी। वह संसद, जो महिलाओं के आरक्षण पर सिर्फ सियासत करती है। वह संसद, जहां से दूरदर्शी सुधार और कानून निकलते ही नहीं। वह संसद, जो सरकार के अधिकांश खर्च पर अपना नियंत्रण खो चुकी है, जनता इस संसद से खफा हैं, उस संवैधानिक संसद से नहीं। गरीबों को रैन बसेरा दिलाने से लेकर पुलिस को सुधारने तक और गंगा से लेकर भ्रष्टाचारियों की सफाई तक जब बहुत कुछ सुप्रीम कोर्ट ही कराता है तो अपनी विधायिका यानी संसद के योगदान व भूमिका पर सवाल उठाना नागरिकों का हक बनता है। जनलोकपाल का आंदोलन दरअसल संसद पर ही सवाल उठा रहा है, जिनके दायरे में सत्ता पक्ष व विपक्ष, दोनों आते हैं। यह एक नए किस्म का मुखर लोकतांत्रिक मोहभंग है। राजनीति अभी भी भाड़े की भीड़ वाली रैली छाप मानसिकता में है। उन्हें अन्ना के आंदोलन में जुटी भीड़ तमाशाई लगती है, जबकि अन्ना के पीछे खड़ी भीड़ आधुनिक संचार की जबान में एक वाइज क्राउड है यानी एक समझदार समूह। यह छोटा समूह जो संवाद, संदेश और असर में बहुत बड़ा है। तकनीक जिसकी उंगलियों पर है, जिसे अपनी बात कहना और समझाना आता है। जिसके पास भाषा, तथ्य, तजुर्बे और तर्क हैं। भ्रष्टाचार पूरे देश की पोर-पोर में भिदा है इसलिए अन्ना की आवाज से वह गरीब ग्रामीण भी जुड़ जाता है, जिसने बेटे की लाश के लिए पोस्टमार्टम हाउस को रिश्वत दी है और वह बैंकर भी सड़क पर आ जाता है जो कलमाड़ी व राजा की कालिख से भारत की ग्रोथ स्टोरी को दागदार होता देखकर गुस्साया है। जनलोकपाल की रोशनी में जनता यह तलाशने की कोशिश कर रही है कि आखिर पिछले तीन दशक में उन्हें संसद से क्या मिला है? 15 लोकसभाएं बना चुके मुल्क के पास अब इतिहास, तथ्य व अनुभवों की कमी नहीं है। अगर ग्रेटर नोएडा के किसान हिंसा पर न उतरते तो संसद को यह सुध नहीं आती कि उसे सौ साल पुराना जमीन अधिग्रहण कानून बदलना है। अगर सुप्रीम कोर्ट आदेश (विनीत नारायण केस) न देता तो सीबीआइ प्रधानमंत्री कार्यालय के दरवाजे बंधी रहती। केंद्रीय सतर्कता आयोग के मातहत शायद न आई होती। दलबदल ने जब लोकतंत्र को चौराहे पर खड़ा कर दिया तब संसद को कानून बनाने की सुध आई। आर्थिक सुधारों के लिए संकट क्यों जरूरी था? नक्सलवाद जब जानलेवा हो गया तब संसद को महसूस हुआ आदिवासियों के भी तो कुछ कानूनी हक हैं। वित्तीय कानून बदलने के लिए सरकार ने शेयर बाजारों में घोटालों की प्रतीक्षा की। संसद से मोहभंग के जायज कारण हैं। भारतीय संसद की कानून रचना क्षमता भयानक रूप से संदिग्ध है। एक युवा देश आधुनिक कानूनों के तहत जीना चाहता है, मगर भारतीय विधायिका के पास हंगामे का वक्त है, कानून बनाने का नहीं। कानून बनाने में देरी अच्छे कानून की गारंटी नहीं है, बल्कि यह साबित करती है कि विधायिका गंभीर नहीं है। हमारी संसद न तो वक्त पर कानून दे पाती और न कानूनों की गुणवत्ता ऐसी होती है जिससे विवाद रहित व्यवस्था खड़ी हो सके। जनलोकपाल के लिए सड़क पर खड़े तमाम लोगों के पास कार्यपालिका के भ्रष्टाचार के व्यक्तिगत अनुभव हैं। संविधान ने विधायिका यानी संसद को पूरे प्रशासन तंत्र (कार्यपालिका) की निगरानी का काम भी दिया था। संसद यह भूमिका गंवा चुकी है या राजनीति को सौंप चुकी है। इसलिए अब नए मसीहा उभरते हैं और अदालतें इंसाफ ही नहीं करतीं, बल्कि लोगों को रोटी, शिक्षा तक दिलाती हैं। लोग महसूस करते हैं कि संसद प्रभावहीन है। इसलिए न्यायपालिका को आधारभूत ढांचे की तरफ लौटना पड़ा, जिसके तहत संविधान के बुनियादी मूल्यों को बचाना भी अदालत की जिम्मेदारी है (गोलकनाथ केस-1967)। नेता जब अदालतों पर गुस्साते हैं या संवैधानिक संस्थाओं को उनकी सीमाएं बताते हैं तो लोग और चिढ़ जाते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का अंतरराष्ट्रीय इतिहास जनता और स्वयंसेवी संस्थाओं ने बनाया है। सरकारें दबाव के बाद ही बदलती हैं। इन जन आंदोलनों की बदौलत ही आज भ्रष्टाचार के तमाम अंतरराष्ट्रीय पहरेदार हमारे पास हैं। यह पहला मौका नहीं है जब जनता विधायिका को राह दिखा रही है। 2002 में निकारागुआ में पांच लाख लोगों ने एक जन याचिका के जरिए संसद को इस बात पर बाध्य कर दिया था कि भ्रष्ट राष्ट्रपति अर्नाल्डो अलेमान पर मुकदमा चलाया जाए। संसद की सर्वोच्चता पर किसे शक होगा, मगर इसके क्षरण पर अफसोस सबको है। जनता, अदूरदर्शी, दागी और निष्प्रभावी संसद से गुस्सा हैं। वह संसद को उसकी संवैधानिक साख लौटाना चाहती है। कानून तो संसद ही बनाएगी, लेकिन इससे अच्छा लोकतंत्र क्या होगा कि जनता मांगे और संसद कानून बनाए। जनलोकपाल की कोशिश को क्या संसद की गरिमा बढ़ाने वाले अनोखे लोकतांत्रिक प्रयास के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
(लेखक दैनिक जागरण के राष्ट्रीय ब्यूरो प्रमुख हैं)
साभार:-दैनिक जागरण
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/article/index.php?page=article&choice=print_article&location=8&category=&articleid=111719108074130088

जनता का अभूतपूर्व आंदोलन

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन की प्रकृति, स्वरूप और उद्देश्य का विश्लेषण कर रहे हैं निरंजन कुमार

अन्ना हजारे के आंदोलन ने देश को एक अभूतपूर्व दोराहे में ला खड़ा किया है, जहां से एक रास्ता देश को दुनिया के शिखर पर ले जा सकता है तो दूसरा एक अंतहीन गर्त में। अब सरकार ही नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक पार्टियों के साथ -साथ अन्य बुद्धिजीवियों पर निर्भर करेगा कि देश को किस दिशा में ले जाना है। पूरे प्रकरण को समझने के लिए यह जानना होगा कि इस पूरे आंदोलन की प्रकृति क्या है, स्वरूप क्या है, इसकी दिशा क्या है, इसके व्यापक उद्देश्य क्या हैं और क्या सबक लिए जा सकते हैं? आजादी के बाद यह एक ऐसा देशव्यापी आंदोलन है जिसका नेतृत्व राजनेताओं के हाथ में न होकर आम नागरिक के पास है। इसके कुछ आंदोलन जिन्होंने पूरे देश को अपने आगोश में ले लिया था उनमें जेपी का 74 का आंदोलन, 89 का वीपी सिंह का आंदोलन, मंदिर आंदोलन और फिर मंडल आंदोलन को शामिल किया जा सकता है। मंदिर आंदोलन से जहां मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध आदि धर्मावलंबी और हिंदुओं का सेक्युलर तबका अलग थे तो मंडल आंदोलन से सवर्ण बाहर थे। इनमे जेपी का आंदोलन अपेक्षाकृत एक अखिल भारतीय आंदोलन था, लेकिन इसका नेतृत्व राजनेताओं के पास था और जिनका उद्देश्य संपूर्ण क्रांति के साथ-साथ सत्ता परिवर्तन भी था, लेकिन अन्ना का आंदोलन नेतृत्व, भागीदारी से लेकर उद्देश्य तक आम जनता का आंदोलन है और इसका तात्कालिक लक्ष्य भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए एक सशक्त लोकपाल कानून को लाना है, हालंकि इसके देश हितकारी अन्य दूरगामी परिणाम भी होंगे। अनेक राजनीतिक चिंतक इस आंदोलन को संसदीय लोकतंत्र या दलगत राजनीति के लिए एक खतरा बताते हैं, लेकिन इस सवाल का वे जवाब नहीं देते कि इन परिस्थियों के लिए जिम्मेदार कौन है। कठघरे में सिर्फ कांग्रेस ही नहीं खड़ी है, बल्कि भाजपा, कम्युनिस्ट पार्टियां और अन्य अधिकांश दल शामिल हैं। वरना क्या कारण है कि आज किसी राजनेता या दल में वह नैतिक साहस नहीं है कि वह किसी मुद्दे पर खड़े हों और पूरा देश उनके पीछे आ जाए। इसके लिए क्या अन्ना या जनता जिम्मेदार है? इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत है कि इतना बड़ा, देशव्यापी और स्वत:स्फूर्त होने के बावजूद यह पूरी तरह से अहिंसक रहा है और यह इस आंदोलन की शक्ति भी है, क्योंकि सरकार को जरा भी मौका मिलता तो इसे कुचलने में वह देर नहीं करती। अहिंसक होने से ही इसे व्यापक जनसमर्थन मिलता चला गया और सरकार हिल गई। यह अनायास नहीं है कि पूरी दुनिया के मीडिया ने इस आंदोलन को प्रमुखता से कवरेज देते हुए इसकी सफलता का गुणगान किया है। और तो और पाकिस्तान जैसे सैन्य तानाशाही वाले देश या खूनी संघर्ष से उथल-पुथल हो रहे अरब देशों में अन्ना हजारे से प्रेरणा लेने की बात होने लगी है। इस आंदोलन के स्वरूप पर आरोप लगाते हुए सरकारी प्रतिनिधि ने इसे मीडिया मैनेज्ड या आरआरएस द्वारा प्रायोजित या अमेरिकी सरकार द्वारा समर्थित बता रहे है। उसी तरह कुछ विश्लेषक इसे सवर्णवादी, अभिजन वादी, कारपोरेटवादी बता रहे हैं, लेकिन सच इनसे कोसों दूर है। यह सही है कि आंदोलन को मीडिया ने खासा कवरेज दिया, लेकिन सिर्फ मीडिया के सहारे कोई आंदोलन नहीं चल सकता जब तक उसके पीछे कोई ठोस सामाजिक-आर्थिक कारण न हो। आंदोलन अभी नगरों तक सीमित है और शिक्षित युवा वर्ग ही इसमें बड़ी भूमिका निभा रहा है, लेकिन आग धीरे धीरे कस्बों तक फैल रही है और आने वाले दिनों में इसकी आंच गांवों तक पहुंच सकती है। इसी तरह शुरू से सरकार अन्ना टीम को आरएसएस-भाजपा द्वारा प्रायोजित बता कर तोड़ने की कोशिश कर रही है, पर अन्ना टीम के कोर सदस्य संतोष हेगड़े ने कर्नाटक की भाजपा सरकार के खिलाफ अपनी रिपोर्ट पेश कर इस दावे को पंचर ही कर दिया है। अन्ना के समर्थन में अब आरएसएस जरूर उतर पड़ी है, लेकिन आज अन्ना के साथ घोर आरएसएस विरोधी लोग भी कूद पड़े हैं। यह अनायास नहीं है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जो देश की मुस्लिम राजनीति को एक बौद्धिक दिशा देता है, के शिक्षकों और छात्रों ने अन्ना के समर्थन में उद्घोष किया है। उसी तरह यह भी गलत है कि यह आंदोलन सवर्णवादी, अभिजनवादी है। यह ठीक है कि इसका नेतृत्व अभी सवर्ण और अभिजन कर रहे हैं, लेकिन आंदोलन से सबसे अधिक फायदा समाज के निम्न वर्ग के लोगों को ही होगा, जिनके बुनियादी हक भ्रष्टाचार का दानव हड़प और हजम किए जा रहा है। इस रूप में यह आंदोलन दलितों, पिछड़ी जातियों और मुसलमानों के लिए सबसे अधिक हितकारी है। अनेक दलित और पिछड़ी जातियों के बुद्धिजीवियों ने बताया है कि वे पूरी तरह से अन्ना के साथ हैं। इस आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति युवा वर्ग है, जो समाज के सभी धर्म-जाति-वर्ग-क्षेत्र के हैं और जिनकी संख्या 15 करोड़ से ज्यादा है। यह युवा वर्ग पहले के किसी भी भारतीय आंदोलनों की अपेक्षा ज्यादा शिक्षित, ज्यादा सूचनाओं से लैस और ज्यादा जागरूक और समझदार है। सबसे बड़ी बात है कि दिग्भ्रमित कहे जाने वाले इस युवा पीढ़ी की ऊर्जा अभूतपूर्व रूप से जाग गई है और इसकी आकांक्षाओं को ज्यादा दबाया नहीं जा सकता। सरकार, कांग्रेस, भाजपा या अन्य सभी राजनीतिक दलों को समझ लेना चाहिए कि उनका कोई भी गलत कदम राजनेताओं और राजनीति पर पहले से ही गहरे अविश्वास को और मजबूत ही करेगा और इसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार होंगे। सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा आंदोलन को अमेरिका पोषित कहना या इसे भ्रष्ट बताते हुए यह कहना कि कहां से आंदोलन के लिए पैसा आ रहा है, सच्चाई को ठुकराने वाली बात है। अन्ना में लोगों का इतना विश्वास है कि उनके आंदोलन को धन की कमी नहीं है और न होगी। एक सरल गणित को समझ लें कि देश के एक करोड़ लोग इतने सक्षम तो हैं ही कि हर कोई अन्ना को सिर्फ सौ-सौ रुपये भी दे तो यह राशि सौ करोड़ हो जाती है। हालांकि अन्ना के आंदोलन का कुल खर्च अब तक एक करोड़ का आंकड़ा नहीं पार कर पाया है। आज अन्ना का समर्थन करने के बावजूद जनलोकपाल बिल से अन्य राजनीतिक पार्टियां भी पूरी तरह से सहमत नहीं हैं, लेकिन क्या इसमें उनका स्वार्थ आड़े आ रहा है या सचमुच इसके दूरगामी दुष्परिणाम हो सकते हैं, इसका विश्वास दिलाने की जिम्मेदारी अब सभी राजनीतिक पार्टियों की ही है और इसके लिए हर प्रावधान पर एक खुली बहस होनी चाहिए। वरना याद रखिए-न तो आपको इतिहास माफ करेगा, न ही भविष्य स्वीकारेगा और वर्तमान में तो आप अपनी विश्वसनीयता खो ही चुके हैं।
(लेखक दिल्ली विवि में प्राध्यापक हैं)
साभार:-दैनिक जागरण
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शासन करना सीखे सरकार

अन्ना हजारे को पहले केवल तीन दिन तक अनशन की इजाजत देने पर अड़ी सरकार अब जिस तरह उन्हें 15 दिन का समय और अपेक्षाकृत बड़ा मैदान उपलब्ध कराने पर मजबूर हुई उससे न केवल उसकी राजनीतिक अपरिपक्वता और अदूरदर्शिता पर मुहर लगी, बल्कि रही-सही प्रतिष्ठा भी धूल में मिल गई। यह शुभ संकेत नहीं कि नैतिक शक्ति खो चुकी सरकार अभी भी अपना दंभ छोड़ने के लिए तैयार नहीं। वह यह प्रदर्शित कर उपहास का पात्र ही बन रही है कि रामलीला मैदान में अन्ना हजारे को अनशन करने की अनुमति देने में उसकी कोई भूमिका नहीं। यह न केवल शर्मनाक है, बल्कि चिंताजनक भी कि केंद्रीय सत्ता अभी भी दिल्ली पुलिस की आड़ में अपना चेहरा छिपा रही है। जब उसे आगे बढ़कर अपने अच्छे-बुरे फैसलों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए तब देश-दुनिया को यह बताने की कोशिश हो रही है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद वह तो परिदृश्य में ही नहीं है। आखिर ऐसी सरकार शासन करने में समर्थ कैसे हो सकती है जो देश में उबाल लाने वाले इतने बड़े घटनाक्रम से मुंह मोड़ती नजर आए? इस सरकार में कई ऐसे लोग होंगे जो आपातकाल के माहौल को भूले नहीं होंगे। उन्हें यह अनुभूति होनी चाहिए कि तब के मुकाबले आज देश की जनता कहीं अधिक कुपित और मुखर है। वह केंद्रीय सत्ता पर भरोसा भी खोती जा रही है। केंद्र सरकार इस तर्क की आड़ में ज्यादा दिन नहीं छिपी रह सकती कि कानून बनाना संसद का काम है। संसद की यह भी जिम्मेदारी है कि कानून का निर्माण करते समय जनता की भावनाओं का ध्यान रखा जाए-ठीक वैसे ही जैसे भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के मामले में रखा जा रहा है। संसद अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वाह तब कर पाएगी जब राजनीतिक दल और विशेष रूप से सत्तापक्ष इस अहंकार से उबरेगा कि सही-गलत का फैसला करने का अधिकार केवल उसे ही है। यदि जनता को कानून बनाने का अधिकार नहीं तो सत्तापक्ष भी स्वर्ग से नहीं उतरा। केंद्र सरकार यह कहकर देश को गुमराह करने से बचे तो बेहतर है कि अन्ना हजारे द्वारा संसद की सर्वोच्चता को चुनौती दी जा रही है। सच्चाई यह है कि यह सरकार है जो संसद का दुरुपयोग कर उसकी गरिमा से खेल रही है। जो सरकार राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा तैयार विधेयकों को संसद में रखने के लिए तैयार है वह जन लोकपाल के मसौदे से क्यों बिदक रही है? सामान्य परिस्थितियों में तो सरकारी लोकपाल विधेयक को कानून में तब्दील होते सहन किया जा सकता था, लेकिन बदले हालात में जनता उसे स्वीकार करने वाली नहीं है। चूंकि भ्रष्टाचार से लड़ने के मामले में केंद्र सरकार के छल-छद्म के चलते परिस्थितियां असामान्य हो चली हैं इसलिए बेहतर यही होगा कि सरकारी लोकपाल विधेयक वापस लेकर एक सक्षम लोकपाल व्यवस्था बनाने के लिए नए सिरे से प्रयास किए जाएं। यदि सरकार ऐसा करने के लिए तैयार होती है तो सिविल सोसाइटी के लिए भी यह उचित होगा कि वह उसे एक मौका और दे। बेहतर हो कि केंद्र सरकार सिविल सोसाइटी से संवाद की पहल करे और उसके समक्ष यह भी स्वीकार करे कि उससे भूल हुई। इससे ही सुलह का कोई रास्ता निकल सकता है।
साभार:-दैनिक जागरण
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