Thursday, January 13, 2011

न्यायपालिका पर भीतरी आघात

भारतीय न्यायपालिका में पनपते भ्रष्टाचार के विविध रूपों को उजागर कर रहे हैं एस। शंकर

बिहार में एक दिलचस्प जिला जज थे। वह मुकदमों की निष्पक्ष सुनवाई करते थे तथा वही फैसला देते थे जो न्यायोचित और साक्ष्य-आधारित हो। किंतु फैसला सुनाने से पहले जीतने वाले को संदेश भिजवा कर उससे दक्षिणा वसूल करते थे। हारने वाला कुछ नहीं कर सकता था, क्योंकि फैसला वस्तुत: विधि-अनुरूप होने के कारण ऊंची अदालत उसे निरस्त नहीं करती थी। यह जज साहब के भ्रष्टाचार का ऐसा अनोखा रूप था जिसे साबित करना कठिन था। आज उच्चतर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के कुछ और अनोखे रूप सामने आ रहे हैं। इन्हें पहचाना तो जा सकता है, पर साबित नहीं किया जा सकता। जैसे, किसी बड़े न्यायाधीश की संतान या संबंधियों का एकाएक बहुत धनी हो जाना अथवा महत्वपूर्ण पदों के लिए चुन लिया जाना। किसी सर्वोच्च न्यायाधीश द्वारा अधीनस्थ न्यायालय के पत्र या शिकायत को अनदेखा कर देना। किसी मुकदमे को जानबूझ कर लंबित रखना अथवा विशेष रुचि लेकर जल्द निपटाना। इसी क्रम में कार्यपालिका के महत्वपूर्ण व्यक्ति द्वारा किसी न्यायाधीश को प्रभावित करने की बात भी है। इसमें बिना किसी लेन-देन के भी बड़ी गड़बड़ी की जा सकती है। उदाहरण के लिए, किसी महत्वपूर्ण अ‌र्द्ध-न्यायिक पद को महीनों भरा नहीं जाता। अब यह प्रमाणित करना संभव नहीं है कि यह किसी मित्र न्यायाधीश को कार्य-मुक्त होने पर देने के लिए जानबूझ कर बचा कर रखा गया है या काम के दबाव में अभी तक भरा नहीं जा सका है। किंतु काफी समय से ऐसा हो रहा है, जो न्याय को निस्संदेह प्रभावित कर रहा है। न्यायिक उच्च गलियारों में पहले से चर्चा होने लगती है कि अमुक आयोग की कुर्सी अमुक मूर्ति के लिए बचा कर रखी जा रही है। किसी विशेष व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण पद को खाली रखा जाना लोकहित की बात भी हो सकती है और किसी गुप्त अहसान का पुरस्कार भी। किंतु संबंधित लोग अनुमान लगा लेते हैं कि किसी विशेष को ही पुरस्कृत करने में किसी विशेष का क्या उद्देश्य है। यह ठीक है कि चतुर राजनेताओं द्वारा न्यायपालिका में इस प्रकार सेंध लगाने का कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया जा सकता, किंतु न्याय प्रक्रिया में पारिस्थितिक प्रमाण भी महत्व रखता है। पिछले वषरें में तरह-तरह के स्थायी और अस्थायी आयोगों में नियुक्त पूर्व न्यायाधीशों के विचित्र, विवादाग्रस्त कायरें से इसका पर्याप्त संकेत मिल चुका है। कुछ न्यायपाल थोड़ा-बहुत लाभ पाने के लिए स्वार्थी नेताओं की इच्छित मदद करने के लिए तैयार रहते हैं। एक पूर्व रेलमंत्री द्वारा बनाए गए गोधरा जांच आयोग के विलक्षण निष्कर्ष ने इसे हास्यास्पद और दुखद रूप से दर्शाया था। अभी-अभी आयकर न्यायाधिकरण द्वारा बोफोर्स मामले पर किए नए रहस्योद्घाटन से साफ है कि क्यों बड़े सत्ताधारी खास पदों पर मित्रवत या दुर्बल व्यक्तियों को रखने की आदत बना रहे हैं। किंतु इसी से न्यायिक भ्रष्टाचार के ऐसे रूपों का संकेत मिलता है जिन्हें समझा तो जा सकता है, किंतु रोकने में केवल कानून समर्थ नहीं हो सकता। कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्तियां संविधान में इसीलिए अलग-अलग रखी गई हैं, ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर कार्यपालकों का नियंत्रण या प्रभाव न पड़े। किंतु यदि कुछ कार्यपालक और न्यायपालक अपनी-अपनी दुर्बलताओं की संतुष्टि के लिए मिलीभगत करने लगें, तब संविधान असहाय हो जाता है। नियम, कानून और संरचनाएं कितनी भी अच्छी हों, उनका क्रियान्वयन व्यक्ति ही करता है। यदि किसी पदधारी में अपेक्षित चारित्रिक गुण न हों तो नियम धरे रह जाते हैं। हमारी न्यायपालिका पर आंतरिक प्रहार केवल राजनेताओं द्वारा ही नहीं, देशी-विदेशी गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा भी हो रहा है। जुलाई 2007 में नर्मदा बचाओ संबंधी किसी मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के बाद अमेरिका के इंटरनेशनल रिवर नेटवर्क के प्रमुख पैट्रिक मैक्कली ने मेधा पाटकर को पत्र लिख कर उस न्यायाधीश को किसी न किसी तरह पुरस्कृत करने की इच्छा जताई थी। उसमें यह उल्लेख भी था कि वह न्यायाधीश बाद की लड़ाइयों में भी उपयोगी हो सकता है। यह भी भ्रष्टाचार का ही एक रूप है। आज कई विदेश-संचालित एन।जी।ओ. हमारे उच्च-पदस्थ लोगों से किसी न किसी बहाने लाभकारी संपर्क बना रहे हैं। यह अकारण नहीं कि उच्च स्थानों से सेवानिवृत्त हुए कुछ विशेष लोग तुरंत किन्हीं विदेशी संस्थाओं के वेतनभोगी या अवैतनिक सलाहकार बन जाते हैं। उनके पूर्व पद की वजह से महत्वपूर्ण स्थानों पर अपेक्षित निर्णय करवाना आसान हो जाता है। विशेषकर विदेशी चर्च-मिशनरी प्रायोजित संस्थाएं यहां अपनी परियोजनाओं में वर्तमान और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, प्रशासनिक अधिकारियों आदि को जोड़ने का प्रयत्न कर रही हैं। वस्तुत: भ्रष्टाचार की समझ को बहुत संकुचित कर दिया गया है। केवल अवैध रूप से पैसे के लेन-देन को ही भ्रष्टाचार कहा जाता है, किंतु देश के लिए निर्णायक, संवैधानिक तथा विशिष्ट महत्व के पदों के लिए भ्रष्टाचार की परिभाषा इतनी सीमित नहीं रहनी चाहिए। बड़े पदों पर रहकर जानबूझ कर बुरे या गलत निर्णय लेना, जिम्मेदारी के पदों पर अक्षम लोगों की नियुक्ति कराना, राजनीतिक या अन्य कारणों से काम में पक्षपात, सार्वजनिक हित से ऊपर निजी या पार्टी हित को रखना आदि भी भ्रष्टाचार के ही रूप हैं। इनसे देश और समाज की भारी हानि होती है। जिस न्यायपालिका पर देश के संविधान के पालन का भार हो, यदि वहीं न्यायेतर कारणों से निर्णय होने लगें तो यह पूरी व्यवस्था चरमराने जैसी बात होगी। न्यायपालकों को न केवल निष्पक्ष रहना चाहिए, बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए। जिस तरह अब जहां-तहां उच्चतर न्यायाधीशों के विरुद्ध आवाज उठने लगी है, उससे स्पष्ट है कि पानी सिर के ऊपर जाने लगा है। अभी सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और बड़े विधिवेत्ता ने एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध आरोप लगाए हैं, जो अभी एक महत्वपूर्ण अ‌र्द्ध-न्यायिक आयोग के अध्यक्ष हैं। उन पर पहले भी आरोप लगते रहे हैं। अब उस आयोग के कार्य पर किसी को कैसे भरोसा होगा? इससे पहले कि उच्च न्यायपालकों से लोगों का विश्वास उठ जाए, दृढ़ कदम उठाए जाने चाहिए। इक्का-दुक्का बड़े लोगों के निजी स्वार्थ में पूरी राजनीतिक प्रणाली को कमजोर होने देना अंतत: सबके लिए घातक होगा।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
साभार :-दैनिक जागरण

देशद्रोह को संरक्षण

कांग्रेस पर वोट की राजनीति के लिए राष्ट्रद्रोही तत्वों को प्रश्रय देने का आरोप लगा रहे हैं राजनाथ सिंह सूर्य

क्या आप यह विश्वास करेंगे कि मुंबई में 26/11 के हमले की साजिश आरएसएस और इजराइल की गुप्तचर संस्था मोसाद ने रची थी और इसमें शामिल पाकिस्तानियों को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुंबई के होटलों में ठहराया था। इस तथ्य का रहस्योद्घाटन उर्दू की एक पुस्तक आरएसएस की साजिश 26/11 में किया गया है, जिसका लोकार्पण दिल्ली और मुंबई में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने किया है। संभवत: इसका अगला लोकार्पण इस्लामाबाद में हो और वहां भी दिग्विजय सिंह ही इस रस्म को अदा करें। इस पुस्तक में यह भी रहस्योद्घाटन किया गया है कि विश्व हिंदू परिषद के महासचिव प्रवीण तोगडि़या के पैसे से आरएसएस कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार को मारने के लिए हथियार खरीदे गए थे। पुस्तक में कुछ और भी रहस्योद्घाटन किए गए हैं, जैसे अमेरिका की शह पर सऊदी अरब के मौलाना बेदी ने 26/11 के जिहादियों को इकट्ठा किया था और नरेंद्र मोदी ने हमलावरों को मुंबई पहुंचाने और होटलों में रुकवाने में मदद की थी। यह पुस्तक एक उर्दू समाचार पत्र के संपादक ने संपादित की है। इसमें कुछ और भी सनसनीखेज रहस्योद्घाटन हैं जैसे कि इंडियन मुजाहिद्दीन और इस्लामिक सिक्योरिटी फोर्स जैसे आतंकवादी संगठनों को तैयार कर संघ और विश्व हिंदू परिषद ने मुसलमानों को बदनाम करने की साजिश रची है। असम में बम धमाकों के पीछे इंडियम मुजाहिद्दीन का हाथ नहीं था क्योंकि वह एक काल्पनिक संगठन है। बजरंग दल एक संदिग्ध संगठन है और इंडियन मुजाहिद्दीन बजरंग दल का ही कूट नाम है। यह भी कहा गया है कि सीबीआइ ने हिंदू आतंकवाद पर परदा डालने की कोशिश की है और बाटला हाउस मुठभेड़ फर्जी थी। आरएसएस नौजवानों और औरतों को त्रिशूल बांट रहा है। बजरंग दल लोगों को बम बनाने और धमाके करने की ट्रेनिंग दे रहा है तथा विश्व हिंदू परिषद ने महाराष्ट्र की कई मस्जिदों में धमाके किए हैं। पुस्तक में एक और बड़ा रहस्योद्घाटन यह भी किया गया है कि आरएसएस के नेता इंद्रेश कुमार ने पाकिस्तान की गुप्तचर इकाई आइएसआइ से तीन करोड़ रुपये लिए थे। इस पुस्तक के रचियता और ऐसे ही अनेक कुप्रचारकों के लिए ऐसी छूट शायद ही किसी देश में हो, जैसी भारत में है। इस पुस्तक को पढ़ने से तो ऐसा लगता है कि मुंबई पर 26 नवंबर, 2008 को हुए आतंकी हमले को अंजाम देने वाले पाकिस्तानी आतंकी आरएसएस की साजिश का हिस्सा थे। आश्चर्य की बात है कि पुस्तक के लेखक को जिन तथ्यों की जानकारी बंद कमरों में हो गई, उनका कोई सुराग खुफिया एजेंसियों, पुलिस एवं गृह मंत्रालय को नहीं लग पाया और मीडिया भी उनसे पूरी तरह अनभिज्ञ रहा। यह जानकारी एक संपादक को कहां से प्राप्त हुई? इस पुस्तक के प्रकाशन से यदि कोई सबसे अधिक प्रसन्न होगा तो वह पाकिस्तान है क्योंकि उसने जो तरह-तरह के हस्तक खड़े किए हैं, उनमें से कुछ की पैठ कांग्रेस में भी है। कांग्रेस के प्रवक्ता के दिलोदिमाग पर ये कुत्सित विचार इस कदर छा गए हैं कि वह सारे सरकारी सबूतों को नकारते हुए देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हिंदू आतंकवादियों को बताते फिर रहे हैं। यही नहीं पूरी पार्टी और इसके युवराज भी इसी लाइन पर चल रहे हैं। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने जब यह दिशा पकड़ी और हेमंत करकरे की हत्या के संदर्भ में बयान जारी किए तब लगा था कि यह उनकी व्यक्तिगत सनक है, लेकिन अब तो पूरी पार्टी इसी सनक के सहारे जीवित रहना चाहती है। जिस एक पुस्तक में अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को खंडित किया गया, समाज में वैमनस्य, अविश्वास और भ्रम फैलाने की साजिश की गई तथा सेना, जांच एजेंसियों, पुलिस और न्यायालय की वैधानिकता पर गंभीर सवाल खड़ा किया है, उसका विमोचन करके दिग्विजय सिंह क्या साबित करना चाहते हैं। यह पुस्तक देश के न्यायालय, पुलिस, खुफिया तंत्र, नागरिक समाज और बुद्धिजीवियों को कठघरे में खड़ा करती है। लगता है कि अनर्गल प्रचार और दुष्प्रचार से शत्रु देशों को मदद पहुंचाने और मित्र देशों से संबंध बिगाड़ने वाले क्रियाकलाप देशभक्ति के पर्याय बन गए हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो कांग्रेस आज भी तिब्बत की आजादी के लिए सम्मेलन करती मिलती और चीन के हमले के प्रति नित्य सचेत करना नहीं भूलती। इसमें घरवापसी के बाद कोई व्यक्ति यह कहने का साहस कैसे कर सकता है कि पता नहीं कश्मीर भारत का हिस्सा है भी या नहीं या फिर कश्मीर की स्वतंत्रता के लिए कोई चंडीगढ़, दिल्ली या कोलकाता में प्लेटफार्म कैसे पाता? कांग्रेस जिस वोट के लालच में ऐसी कुत्सित मानसिकता को प्रश्रय दे रही है, वह दिग्विजय सिंह के इस संशोधित कथन मात्र से अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकती कि 26/11 के हमले को पाकिस्तानियों ने ही अंजाम दिया था। यदि उनका और कांग्रेस का यह मानना है तो फिर ऐसी पुस्तक का एक नहीं, दो बार लोकर्पण का दायित्व उन्होंने क्यों निभाया, जिसमें अनर्गल प्रलाप के अलावा और कुछ नहीं है। या फिर कांग्रेस ने मात्र यह कहकर कि यह दिग्विजय सिंह का व्यक्तिगत मामला है अपना पिंड क्यों छुड़ाना चाहा। घिनौनी और निराधार अभिव्यक्तियों वाली पुस्तक से संबद्ध होकर कांग्रेस ने देश के स्वाभिमान पर चोट की है। यह हमारी चिंता का विषय नहीं है कि कांग्रेस को इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा। चिंता इस बात की है कि वोट की राजनीति के लिए देशद्रोह जैसी हरकतों को खुलेआम संरक्षण मिलने लगा है।
(लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

देशद्रोह को संरक्षण

कांग्रेस पर वोट की राजनीति के लिए राष्ट्रद्रोही तत्वों को प्रश्रय देने का आरोप लगा रहे हैं राजनाथ सिंह सूर्य

क्या आप यह विश्वास करेंगे कि मुंबई में 26/11 के हमले की साजिश आरएसएस और इजराइल की गुप्तचर संस्था मोसाद ने रची थी और इसमें शामिल पाकिस्तानियों को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुंबई के होटलों में ठहराया था। इस तथ्य का रहस्योद्घाटन उर्दू की एक पुस्तक आरएसएस की साजिश 26/11 में किया गया है, जिसका लोकार्पण दिल्ली और मुंबई में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने किया है। संभवत: इसका अगला लोकार्पण इस्लामाबाद में हो और वहां भी दिग्विजय सिंह ही इस रस्म को अदा करें। इस पुस्तक में यह भी रहस्योद्घाटन किया गया है कि विश्व हिंदू परिषद के महासचिव प्रवीण तोगडि़या के पैसे से आरएसएस कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार को मारने के लिए हथियार खरीदे गए थे। पुस्तक में कुछ और भी रहस्योद्घाटन किए गए हैं, जैसे अमेरिका की शह पर सऊदी अरब के मौलाना बेदी ने 26/11 के जिहादियों को इकट्ठा किया था और नरेंद्र मोदी ने हमलावरों को मुंबई पहुंचाने और होटलों में रुकवाने में मदद की थी। यह पुस्तक एक उर्दू समाचार पत्र के संपादक ने संपादित की है। इसमें कुछ और भी सनसनीखेज रहस्योद्घाटन हैं जैसे कि इंडियन मुजाहिद्दीन और इस्लामिक सिक्योरिटी फोर्स जैसे आतंकवादी संगठनों को तैयार कर संघ और विश्व हिंदू परिषद ने मुसलमानों को बदनाम करने की साजिश रची है। असम में बम धमाकों के पीछे इंडियम मुजाहिद्दीन का हाथ नहीं था क्योंकि वह एक काल्पनिक संगठन है। बजरंग दल एक संदिग्ध संगठन है और इंडियन मुजाहिद्दीन बजरंग दल का ही कूट नाम है। यह भी कहा गया है कि सीबीआइ ने हिंदू आतंकवाद पर परदा डालने की कोशिश की है और बाटला हाउस मुठभेड़ फर्जी थी। आरएसएस नौजवानों और औरतों को त्रिशूल बांट रहा है। बजरंग दल लोगों को बम बनाने और धमाके करने की ट्रेनिंग दे रहा है तथा विश्व हिंदू परिषद ने महाराष्ट्र की कई मस्जिदों में धमाके किए हैं। पुस्तक में एक और बड़ा रहस्योद्घाटन यह भी किया गया है कि आरएसएस के नेता इंद्रेश कुमार ने पाकिस्तान की गुप्तचर इकाई आइएसआइ से तीन करोड़ रुपये लिए थे। इस पुस्तक के रचियता और ऐसे ही अनेक कुप्रचारकों के लिए ऐसी छूट शायद ही किसी देश में हो, जैसी भारत में है। इस पुस्तक को पढ़ने से तो ऐसा लगता है कि मुंबई पर 26 नवंबर, 2008 को हुए आतंकी हमले को अंजाम देने वाले पाकिस्तानी आतंकी आरएसएस की साजिश का हिस्सा थे। आश्चर्य की बात है कि पुस्तक के लेखक को जिन तथ्यों की जानकारी बंद कमरों में हो गई, उनका कोई सुराग खुफिया एजेंसियों, पुलिस एवं गृह मंत्रालय को नहीं लग पाया और मीडिया भी उनसे पूरी तरह अनभिज्ञ रहा। यह जानकारी एक संपादक को कहां से प्राप्त हुई? इस पुस्तक के प्रकाशन से यदि कोई सबसे अधिक प्रसन्न होगा तो वह पाकिस्तान है क्योंकि उसने जो तरह-तरह के हस्तक खड़े किए हैं, उनमें से कुछ की पैठ कांग्रेस में भी है। कांग्रेस के प्रवक्ता के दिलोदिमाग पर ये कुत्सित विचार इस कदर छा गए हैं कि वह सारे सरकारी सबूतों को नकारते हुए देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हिंदू आतंकवादियों को बताते फिर रहे हैं। यही नहीं पूरी पार्टी और इसके युवराज भी इसी लाइन पर चल रहे हैं। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने जब यह दिशा पकड़ी और हेमंत करकरे की हत्या के संदर्भ में बयान जारी किए तब लगा था कि यह उनकी व्यक्तिगत सनक है, लेकिन अब तो पूरी पार्टी इसी सनक के सहारे जीवित रहना चाहती है। जिस एक पुस्तक में अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को खंडित किया गया, समाज में वैमनस्य, अविश्वास और भ्रम फैलाने की साजिश की गई तथा सेना, जांच एजेंसियों, पुलिस और न्यायालय की वैधानिकता पर गंभीर सवाल खड़ा किया है, उसका विमोचन करके दिग्विजय सिंह क्या साबित करना चाहते हैं। यह पुस्तक देश के न्यायालय, पुलिस, खुफिया तंत्र, नागरिक समाज और बुद्धिजीवियों को कठघरे में खड़ा करती है। लगता है कि अनर्गल प्रचार और दुष्प्रचार से शत्रु देशों को मदद पहुंचाने और मित्र देशों से संबंध बिगाड़ने वाले क्रियाकलाप देशभक्ति के पर्याय बन गए हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो कांग्रेस आज भी तिब्बत की आजादी के लिए सम्मेलन करती मिलती और चीन के हमले के प्रति नित्य सचेत करना नहीं भूलती। इसमें घरवापसी के बाद कोई व्यक्ति यह कहने का साहस कैसे कर सकता है कि पता नहीं कश्मीर भारत का हिस्सा है भी या नहीं या फिर कश्मीर की स्वतंत्रता के लिए कोई चंडीगढ़, दिल्ली या कोलकाता में प्लेटफार्म कैसे पाता? कांग्रेस जिस वोट के लालच में ऐसी कुत्सित मानसिकता को प्रश्रय दे रही है, वह दिग्विजय सिंह के इस संशोधित कथन मात्र से अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकती कि 26/11 के हमले को पाकिस्तानियों ने ही अंजाम दिया था। यदि उनका और कांग्रेस का यह मानना है तो फिर ऐसी पुस्तक का एक नहीं, दो बार लोकर्पण का दायित्व उन्होंने क्यों निभाया, जिसमें अनर्गल प्रलाप के अलावा और कुछ नहीं है। या फिर कांग्रेस ने मात्र यह कहकर कि यह दिग्विजय सिंह का व्यक्तिगत मामला है अपना पिंड क्यों छुड़ाना चाहा। घिनौनी और निराधार अभिव्यक्तियों वाली पुस्तक से संबद्ध होकर कांग्रेस ने देश के स्वाभिमान पर चोट की है। यह हमारी चिंता का विषय नहीं है कि कांग्रेस को इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा। चिंता इस बात की है कि वोट की राजनीति के लिए देशद्रोह जैसी हरकतों को खुलेआम संरक्षण मिलने लगा है।
(लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

Wednesday, January 12, 2011

तबाही की तरफदारी

जैव संविर्द्धत अर्थात जीएम फसलों के कृषि और मानव जीवन पर खतरों के प्रति आगाह कर रहे हैं देविंदर शर्मा
जैव संव‌िर्द्धत (जीएम) फसलें एक बार फिर चर्चा में हैं। मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने अपनी पूर्ववर्ती नीति से पलटी मारकर अब सार्वजनिक रूप से जीएम फसलों को समर्थन देना शुरू कर दिया है। बहस गरमा रही है। यह उसी लाइन पर जा रही है, जिस पर शरद पवार जोर दे रहे हैं। इसमें हैरत की बात नहीं है। मैं देर-सबेर इसकी उम्मीद कर रहा था। आखिरकार, विकिलीक्स पहले ही खुलासा कर चुका है कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन जीएम फसलों के पक्ष में राय व्यक्त कर चुके हैं। विकिलीक्स के एक और खुलासे में, पेरिस में अमेरिकी दूतावास ने जीएम फसलों का विरोध कर रहे यूरोप के खिलाफ वाशिंगटन को सैन्य व्यापार युद्ध छेड़ने की सलाह दी थी। 2008 में अमेरिका और स्पेन ने यूरोप में खाद्यान्न की कीमतें बढ़ने पर जीएम खाद्यान्न फसलों की आवश्यकता को उचित ठहराया था। यूरोप अब भी जीएम फसलों को स्वीकार नहीं कर रहा है, ऐसे में केवल भारत ही निशाने पर है। 2010 के शुरू में भारत के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन के व्यावसायीकरण को स्थगित कर दिया था। इसके बाद भारत पर अमेरिका ने कूटनीतिक और राजनीतिक दबाव बढ़ा दिया था। बहुराष्ट्रीय बीज उद्योग ने तेजी से कदम उठाते हुए बड़ी संख्या में पत्रकारों को अमेरिका की शैक्षिक यात्रा कराई और भारत में भी जीएम फसलों के पक्ष में मीडिया अभियान छेड़ दिया। उसी समय, विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने जीएम फसलों के पक्ष में राजनीतिक दृष्टिकोण को प्रभावित करने के प्रयास तेज कर दिए थे। माकपा के दृष्टिकोण में बदलाव इन्हीं प्रयासों का नतीजा है। हमें कुछ ऐसे मुद्दों की पड़ताल करना बेहद जरूरी है, जो जीएम फसलों को बढ़ावा देने के शोरशराबे में गुम हो गए हैं। पहली और सबसे महत्वपूर्ण दलील यह दी जाती है कि एक अरब से अधिक की आबादी वाले देश का पेट जीएम फसलें ही भर सकती हैं। इससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी। सच्चाई इसके उलटी है। विश्व में कोई ऐसी जीएम फसल नहीं है, जो उत्पादकता को बढ़ा सके। वास्तव में, अधिकांश जीएम फसलों ने असलियत में उत्पादकता को घटाया ही है। अमेरिकी कृषि विभाग भी स्वीकार करता है कि जीएम मक्का और जीएम सोया की उत्पादकता सामान्य प्रजातियों से कम है। अगर जीएम फसलों की उत्पादकता सामान्य फसलों से भी कम है तो आश्चर्य है कि हमारे राजनेता जीएम फसलों से खाद्य सुरक्षा बढ़ने की बात क्यों कर रहे हैं! सच्चाई यह है कि विश्व में खाद्यान्न की कमी ही नहीं है। पृथ्वी पर 6.5 अरब लोग रहते हैं, जबकि खाद्यान्न का उत्पादन 11.5 अरब लोगों के लिए हो रहा है। अगर विश्व में रोजाना एक अरब से अधिक लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं तो इसका कारण खाद्यान्न की अनुपलब्धता न होकर दोषपूर्ण वितरण प्रणाली है। यही बात भारत पर भी लागू होती है, जहां एक-तिहाई आबादी उपलब्ध भोजन खरीदने की स्थिति में नहीं है, जिसे गोदामों में चूहे चट कर रहे हैं। अब तक विकसित करीब सभी जीएम फसलों की विशेषता कीटरोधी होना बताया जाता है। उदाहरण के लिए बीटी कॉटन पिंक बॉलवर्म जैसे कीटों के मारने के लिए विकसित की गई, जिससे कीटनाशकों का इस्तेमाल घट जाए। यह लंबे समय तक सही सिद्ध नहीं हुआ। चीन में, बीटी कॉटन उगाने वाले किसान अब दस फीसदी अधिक कीटनाशकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत में भी, बीटी कॉटन की पैदावार में अधिक कीटनाशकों का इस्तेमाल होने लगा है। सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ कॉटन रिसर्च, नागपुर की रिपोर्ट के अनुसार, 2006 में, 640 करोड़ रुपये के कीटनाशकों का कॉटन पर छिड़काव किया गया। 2008 में यह राशि 800 करोड़ से अधिक हो गई। यहां तक कि अमेरिका में भी, जहां जीएम फसलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है, कीटनाशकों पर खर्च 30 करोड़ डॉलर बढ़ गया है। जीएम फसलें अपनी जड़ों के माध्यम से मिट्टी में जहरीले तत्व छोड़ती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के शोध के अनुसार इससे मिट्टी के लिए लाभदायक माइक्रोफ्लोरा को नुकसान पहुंचता है। किसानों की शिकायतें बढ़ती जा रही हैं कि बीटी कॉटन की हर अगली पैदावार पहले से कम हो रही है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश और हरियाणा में बीटी फसल की पत्तियां खाने से पशु मर रहे हैं। आंध्र प्रदेश पशुपालन विभाग ने किसानों को चेतावनी जारी की है कि वे पशुओं को बीटी कॉटन के खेत में न चरने दें। जीएम फसल कुछ ऐसे कीट (सुपरकीट) भी पैदा करती हैं, जो किसी भी कीटनाशक से नहीं मरते। अमेरिका में, 1.5 करोड़ एकड़ जमीन पर सुपरकीट फैल चुके हैं। इन कीटों के फैलने से अमेरिका का जार्जिया प्रांत तेजी से बंजर होता जा रहा है। उत्तरी अमेरिका में कम से कम 30 सुपरकीट विकसित हो गए हैं, जो किसी भी रसायन से खत्म नहीं होते। दुनिया भर में अनेक उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि जीएम फसल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। यहां तक कि बहुराष्ट्रीय कंपनी मोंसेंटो के खुद के अध्ययन भी बताते हैं कि इसके कारण यूरोप में चूहों को किडनी, लिवर, पैंक्रियाज और खून की गंभीर बीमारियां हो गई हैं। ऑस्टि्रया में कुछ हालिया अध्ययनों से पता चला है कि जीएम फसलों से नपुंसकता भी होती है। जिन भी वैज्ञानिकों ने जीएम फसलों के मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव पर सवाल उठाने की हिम्मत दिखाई है, उन्हें जीएम उद्योग के इशारे पर नौकरी से निकाल दिया गया। अगर हम लोगों के हाथ में नुकसानदायक प्रौद्योगिकी सौंप देंगे तो देर-सबेर विश्व की अप्राकृतिक मौत हो जाएगी। उदाहरण के लिए सिगरेट के हर पैकेट पर स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होने की चेतावनी छपी रहती है, फिर भी इसकी बिक्री बढ़ रही है। चूंकि यह स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है इसलिए सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर इसके इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया है। क्या यह गलत फैसला है? इसी प्रकार जीएम फसलों के इस्तेमाल करने या न करने का फैसला किसानों पर नहीं छोड़ा जा सकता। किसान ताकतवर कंपनियों के आक्रामक मार्केटिंग हथकंडों के जाल में फंस जाते हैं। पूरा सरकारी तंत्र, कृषि विश्वविद्यालय, कंपनियां और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जीएम फसलों को प्रोत्साहन देने में जुटा है। किसान इनका मुकाबला नहीं कर सकते। किसानों पर दोषपूर्ण प्रौद्योगिकियां थोपने पर वे पहले ही आत्महत्या कर रहे हैं। हत्यारी प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल न रोक कर हम और कितने किसानों की हत्या करना चाहते हैं?
(लेखक कृषि नीतियों के विश्लेषक हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

आत्मजागरण

ऊर्जा आत्मजागरण मनुष्य का निद्रारूपी अविद्या को छोड़कर विद्या से चेतन हो भली-भांति ज्ञान प्राप्त करना आत्मजागरण है। ज्ञान को प्राप्त करने के लिए सबसे आवश्यक तत्व बोध है। बोध की प्राप्ति होने पर इसके प्रकाश में सब यथावत दिखाई देता है। ज्ञानपिपासु ज्ञान और विज्ञान की प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य बनाकर इसकी प्राप्ति की ओर सदा उन्मुख रहते हैं। आत्मा को जगाना है तो उसके लिए न तो बहुत पढ़ने की आवश्यकता है, न बहुत सुनने की। इसका जागरण तो केवल आत्म संबोधन से ही संभव है। इसके बाद ज्ञान और विज्ञान का सारा खजाना स्वत: ही हमें प्राप्त हो जाता है। जब तक मनुष्य की आत्मा सो रही है तब तक उसका ज्ञान, साधना, धर्म, शास्त्र सब कुछ सोता रहता है। आत्मजागरण प्राप्त हो जाने पर हमारे अंदर मान-अपमान, हानि-लाभ, जय-पराजय, सफलता-विफलता और संयोग-वियोग, प्रत्येक प्रकार के द्वंद्वों का सामना करते हुए आत्मविकास की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा मिलती है। यह मानव शरीर हमें एक इष्ट की पूर्ति के लिए मिला है। मानव शरीर इसका साधन मात्र हैं। वह इष्ट है ब्रंा की प्राप्ति। आज हम अपने परम इष्ट को भूलकर केवल साधना देह की संतुष्टि पर ही लगे रहते हैं। आत्मजागरण के बिना समस्त कर्म व्यर्थ हैं। आत्मजागरण के द्वारा आत्मोदय होने पर इसके प्रकाश से मनुष्य श्रेय के मार्ग पर आगे बढ़ जाता है अर्थात् मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होता है। यह पवित्र भावनाओं को विकसित करके मन, बुद्धि और इंद्रियों को प्रशस्त करता हुआ श्रेष्ठ मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करता है, जिससे कर्म की परिसमाप्ति और ब्रंा की प्राप्ति होती है। हमारी चेतना मूलरूप से परमात्मा से संबद्ध है, जिससे हमारे अंदर दैवीय गुणों का समावेश होता रहता है। भौतिकता के चक्कर में हम आध्यात्मिकता की उपेक्षा करते रहते हैं, जिसके दुष्परिणाम हमारे सामने आते हैं। कटुता, स्वार्थपरता, वैरभाव आदि दुष्प्रवृत्तियां जाने अनजाने हमारे आचरण में आती रहती हैं, जो हमारे व्यक्तित्व को धूमिल करती हैं। आत्मजागरण के द्वारा हमें इनसे बचना है।
कृष्णकांत वैदिक

साभार:-दैनिक जागरण

विवेकानंद का विलक्षण दर्शन

स्वामी विवेकानंद की जयंती पर अमेरिकी समाज को राह दिखाने में उनके योगदान का स्मरण कर रहे हैं जगमोहन
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने नवंबर में अपनी भारत यात्रा के दौरान कई ऐसी बातें कहीं जो भारतीयों को सुनने में अच्छी लगीं। उन्होंने बड़े ही अच्छे शब्दों में भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता का उल्लेख किया, विशेषकर शांति और बहुलवाद पर उसके अटूट विश्वास का। मानवता और वैश्विक बंधुत्व के दो महान प्रचारकों-गांधी और विवेकानंद का भी विशेष उल्लेख हुआ। ओबामा ने अमेरिका की नैतिक कल्पनाशक्ति के विस्तार में भारतीय योगदान को भी रेखांकित किया। अमेरिका के नैतिक भाव के इस विस्तार में स्वामी विवेकानंद ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। हमारे समय के महान अमेरिकी शिक्षाविद् एलेनर स्टार्क के शब्दों में अमेरिका में पूरब की आवाज हावी हुई। इसने कुछ ही वर्षो के भीतर यहां के लोगों में नवजागरण के बीज बो दिए। शताब्दी में बदलाव के साथ पूरे देश में एक खामोश क्रांति का सूत्रपात हो गया। अमेरिकी लोगों को स्वामी विवेकानंद ने ऐसे विवेक और शक्ति के साथ अपना संदेश दिया जिससे उस समय उनको सुनने वाले हर व्यक्ति ने अपने जीवन को बदला हुआ पाया। उन सभी के मन-मस्तिष्क मुक्त हो गए। विवेकानंद ने अमेरिका की अच्छी-खासी आबादी पर अपना गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने लोगों को नई प्रेरणा दी और नैतिक विभ्रम से बाहर निकलने का एक स्पष्ट मार्गं बताया। 19वीं शताब्दी के अंत तक अमेरिका एक विशाल आर्थिक महाशक्ति बन चुका था। इसके समाज अभूतपूर्व समृद्धि-संपन्नता अर्जित कर रहे थे। विज्ञान और तकनीक के कदम बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे थे। लोगों के स्वास्थ्य के क्षेत्र में उसने नाटकीय सुधार किया था। नगर बड़े-बड़े महानगरों में तब्दील हो रहे थे, जो उसकी बढ़ती संपन्नता और ऐश्वर्य के साथ-साथ अत्यंत कुशल प्रबंधन के प्रतीक थे। उद्योग और उद्यम में विकास की रफ्तार ने पूरी दुनिया को चमत्कृत कर दिया। कम शब्दों में कहा जाए तो अमेरिका में भौतिक उन्नति विलक्षण, शानदार और दर्शनीय थी। उसी दौर में अमेरिका का एक संवेदनशील वर्गं यह महसूस कर रहा था कि उनके जीवन से कुछ न कुछ रोज ही खोता जा रहा है। उसने खुद को एक रोबो की तरह काम करते हुए पाया-यानी जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में गाड़ी लाल और हरी बत्ती देखकर रुकती-चलती थी। निजी जीवन की स्थिरता और शांति में खतरा लगातार बढ़ता जा रहा था। आम अमेरिकी समाज एक नई तरह की अशांति का अनुभव कर रहा था। यह अशांति लोगों के घरों, परिवार में बिखराव से उपजी थी। मादक पदार्थो का इस्तेमाल बढ़ने लगा। हथियारों के प्रति आकर्षण बढ़ा। धन और भौतिक सामग्री की कभी न खत्म होने वाली भूख ने अमेरिकी समाज में एक तरह की तबाही ही ला दी। आर्थिक और तकनीकी प्रगति एक ओर आसमान छू रही थी तो दूसरी ओर सामाजिक और नैतिक पतन नए निम्न तलाश रहा था। इस दौरान आय में असाधारण विषमताओं ने हालात और जटिल बना दिए। संपन्न अमेरिका के भीतर एक नया अमेरिका आकार लेने लगा। यह नया अमेरिका था-वंचित और पिछड़े लोगों का समाज। इन विषमताओं, विडंबनाओं और जीवन की जटिलताओं के बीच स्वामी विवेकानंद परिदृश्य में उभरे। अपनी दो यात्राओं (पहली 1893 से 1896 और दूसरी 1899-1900) में विवेकानंद ने अमेरिकी मनोभावों को इस तरह छू लिया जैसा किसी विदेशी दार्शनिक और गुरु ने अब तक नहीं किया था। उनका भाव, शैली, आशय, सभी कुछ विलक्षण था। वह विश्वविद्यालयों में बोले, चर्च, शहर के मशहूर केंद्रों और कुल मिलाकर हर तरह की सार्वजनिक और निजी बैठकों में उनकी वाणी ने अपना असर दिखाया। शिकागो में सभी धर्मो की विश्व संसद में उनके संबोधन के एक-एक शब्द ने पूरी दुनिया में उनकी ख्याति फैला दी। उन्होंने सामाजिक और नैतिक जीवन के लगभग सभी पहलुओं में अपने विशिष्ट विचार विशिष्ट शैली में दुनिया के सामने रखे, लेकिन वह अपने श्रोताओं को कभी यह बताना नहीं भूले कि यदि पूरी दुनिया में हमें खुशहाल, सौहार्द्रपूर्ण और संतुलित समाजों की रचना करनी है तो इस विश्व के सभी लोगों के लिए व्यावहारिक वेदांत को जीवन का निर्देशक तत्व बनाना होगा। विवेकानंद ने यह स्पष्ट कर दिया था कि व्यावहारिक वेदांत का उनका विचार धार्मिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक है। यह जीवन का नया सिद्धांत है, जो इस विश्वास पर आधारित है कि जीवन और प्रकृति की सभी चीजों में एक ही दैवीय चेतना भरी है और सभी विश्वास इस चेतना के साथ आपस में जुड़े हुए हैं। विवेकानंद यह बताते हुए कभी नहीं थके कि कभी किसी दूसरे को चोट मत पहुंचाओ, क्योंकि यह पूरा जगत एक है और किसी को चोट पहुंचाने का अर्थ है कि आप खुद को क्षति पहुंचा रहे हैं। विवेकानंद ने कहा कि उद्यम और जीवन के ऊंचे मानकों की तलाश की अमेरिकी भावना में कोई बुराई नहीं है, लेकिन सभी गतिविधियां अद्वैत संस्कृति के दायरे के भीतर होनी चाहिए और इस प्रक्रिया में एकीकृत अस्तित्व के किसी अन्य भाग पर किसी तरह का दुष्प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। उन्होंने अंधाधुंध तरीके से धन अर्जित करने की प्रवृत्ति की निंदा की। उस समय अमेरिकी लोग अपने विश्वास और आधुनिक विज्ञान के रहस्योद्घाटनों के विरोधाभासों को लेकर दुविधा का सामना कर रहे थे। यहां भी विवेकानंद ने उन्हें राह दिखाई। उन्होंने कहा कि लौकिक ऊर्जा उस व्यापक ऊर्जा से किसी भी तरह भिन्न नहीं है जिस पर वैज्ञानिक विश्वास करते हैं। उन्होंने लौकिक ऊर्जा के सभी रूपों-पदार्थ, विचार, बल, बुद्धि-विवेक को ईश्वरीय अंश मानते हुए उसी ऊर्जा का रूप बताया जो विज्ञान का आधार है।
(लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

Monday, January 10, 2011

अनैतिकता पर अतिरिक्त कृपा

मनमोहन सिंह सरकार के आचरण से अनैतिक और संदिग्ध तत्वों को बल मिलता देख रहे हैं राजीव सचान
इसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का दुर्भाग्य कहें या उनके कर्मो का फल कि बोफोर्स मामला एक बार फिर सतह पर आ गया। यह प्रकरण जिस तरह इस तथ्य के साथ उभरा है कि ओट्टावियो क्वात्रोची और विन चड्ढा को दलाली दी गई थी उससे मनमोहन सिंह की मुसीबत बढ़ना तय है। विन चड्ढा की तो मौत हो चुकी है, लेकिन कमबख्त क्वात्रोची अभी जिंदा है। जिस तरह देश इस सच्चाई से परिचित है कि क्वात्रोची को गुपचुप रूप से भगाने का काम नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल में हुआ उसी तरह इससे भी कि लंदन स्थित उसके बैंक खातों पर लगी रोक हटाने का काम मनमोहन सिंह के शासन में हुआ। बोफोर्स मामले में सामने आया नया तथ्य केंद्रीय जांच ब्यूरो की साख का भी कचरा करने वाला है, क्योंकि यह तथ्य ऐसे समय सामने आया है जब दिल्ली की एक अदालत को सीबीआइ की उस याचिका पर निर्णय देना है जिसमें उसने सबूतों के अभाव में क्वात्रोची के खिलाफ मामला बंद करने की अनुमति मांगी है। चूंकि देश को यह भी पता है कि प्रधानमंत्री के वायदे के बावजूद उन लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई जिन्होंने क्वात्रोची पर मेहरबानी दिखाई इसलिए कुछ कठिन सवाल नए सिरे से उनके सामने होंगे? चूंकि मनमोहन सरकार दागियों पर विशेष मेहरबानी दिखाती रही है इसलिए अनैतिक और संदिग्ध तत्वों को समर्थन देना उसका अलिखित एजेंडा नजर आने लगा है। यदि ऐसा नहीं होता तो केंद्र सरकार के सबसे बड़े संकटमोचक प्रणब मुखर्जी यह नहीं कहते कि ए। राजा ने कुछ गलत नहीं किया और उन्होंने तो स्पेक्ट्रम आवंटन में वही नीति अपनाई जो राजग शासन के समय तय की गई थी। यह एक पुराना और लचर तर्क है। अब यदि प्रणब मुखर्जी भी इस फटेहाल तर्क की शरण लेने को विवश हैं तो इसका मतलब है कि स्पेक्ट्रम घोटाले पर केंद्र सरकार को कुछ सूझ नहीं रहा। अगर राजा ने कुछ गलत नहीं किया तो उनकी स्पेक्ट्रम आवंटन नीति पर खुद प्रधानमंत्री को एतराज क्यों था? इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि राजा गलत नहीं थे तो फिर उनसे त्यागपत्र क्यों लिया गया? यदि स्पेक्ट्रम आवंटन में हेराफेरी नहीं हुई तो प्रधानमंत्री पौने दो लाख करोड़ रुपये की राजस्व क्षति का आकलन करने वाली नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रपट की छानबीन कर रही लोक लेखा समिति के समक्ष हाजिरी लगाने को क्यों तैयार हैं? इस सवाल के जवाब में यह एक पुराना प्रश्न उठ खड़ा होता है कि जब प्रधानमंत्री को लोक लेखा समिति के सामने हाजिर होने में हर्ज नहीं तो फिर संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष पेश होने में क्या परेशानी है? यदि केंद्र सरकार इस एक सवाल का कोई तर्कसंगत जवाब दे दे तो वह इस संदेह से मुक्त हो सकती है कि स्पेक्ट्रम घोटाले में कुछ छिपाने-दबाने की कोशिश नहीं की जा रही है। केंद्र सरकार और उसका नेतृत्व कर रही कांग्रेस यह माहौल बनाने की कोशिश में है कि स्पेक्ट्रम घोटाले में सरकार की भूमिका पर सिर्फ भाजपा को संदेह है। यथार्थ यह है कि यह संदेह सारे देश को है। यदि किन्हीं कारणों से भाजपा अथवा अन्य विपक्षी दल स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की मांग करने की जगह मौन साध लें तो भी जनता के मन में घर कर चुका संदेह मिटने वाला नहीं है। प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह का यह दायित्व बनता है कि वह जनता के संदेह को दूर करने के लिए हर संभव उपाय करें, लेकिन इसके उलट वह निष्कि्रयता दिखा रहे हैं और वह भी तब जब उनकी छवि पर बन आई है। यदि उनकी यह निष्कि्रयता कायम रही तो वह इतिहास में अनैतिक और भ्रष्ट तत्वों को प्रोत्साहन देने वाले शासक के रूप में भी याद किए जाएंगे। विडंबना यह है कि ऐसे तत्वों को प्रोत्साहन देने का काम केवल स्पेक्ट्रम घोटाले में ही नहीं किया जा रहा है। राष्ट्रमंडल घोटाले की जांच में भी यही हो रहा है। देश इस नतीजे पर पहुंच चुका है कि मनमोहन सिंह द्वारा नियुक्त केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस इस पद के लिए सर्वथा अनुपयुक्त भी हैं और दागदार भी, लेकिन केंद्र सरकार उनसे पीछा छुड़ाने के लिए तैयार नहीं। सवाल एक अकेले पीजे थॉमस का ही नहीं है, क्योंकि देश यह भी देख रहा है कि अन्य महत्वपूर्ण पदों पर कैसे-कैसे लोगों को नियुक्त किया गया? आखिर मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के रूप में केजी बालाकृष्णन ही सरकार की पहली पसंद क्यों थे? बालाकृष्णन के सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश पद से रिटायर होने के पहले ही यह तय हो गया था कि वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष बनेंगे। अब उन पर राजा का बचाव करने और अपने संबंधियों को अनुचित तरीके से संपन्न बनाने के जो आरोप लग रहे हैं उसके छींटों से केंद्र सरकार बच नहीं सकती। केंद्र सरकार पर कुछ ऐसे ही छींटे उन आरोपों के कारण भी पड़ रहे हैं जो प्रसार भारती के सीईओ बीएस लाली पर लग रहे हैं। यदि लाली, बालाकृष्णन और थॉमस मनमोहन सिंह की पसंद नहीं थे तो फिर वह प्रधानमंत्री हैं ही क्यों? इस पर भी गौर करें कि इस नए वर्ष में मनमोहन सरकार क्या करने जा रही है? सूचना अधिकार कानून की धार कुंद करना पहले से ही उसके एजेंडे में है। इसके अतिरिक्त वह लोकपाल विधेयक पेश करने का इरादा जाहिर कर रही है, लेकिन इस विधेयक का मसौदा सिर्फ यह बताता है कि भ्रष्टाचार से लड़ाई का दिखावा करने वाली एक और नख-शिख-दंत विहीन संस्था का निर्माण करने की तैयारी हो रही है। यह लोकपाल आवश्यक अधिकारों से वंचित एक सलाह देने वाली संस्था भर तो होगा ही, उसके दायरे में केवल राजनेता होंगे, नौकरशाह और न्यायाधीश नहीं। केंद्रीय सत्ता के ऐसे आचरण से यदि किसी को सबसे अधिक बल मिल रहा होगा तो वे होंगे भ्रष्ट तत्व। आश्चर्य नहीं कि नया वर्ष सबसे अधिक उन्हें ही शुभ-लाभ दे।
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)
साभार:-दैनिक जागरण