Sunday, January 22, 2012

फौजी के सम्मान का सवाल

सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह की उम्र से संबंधित विवाद के लिए सरकार को जिम्मेदार मान रहे हैं प्रदीप सिंह
क्या थल सेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह अपने पद से इस्तीफा देंगे? क्या सरकार उन्हें बर्खास्त करेगी? क्या दोनों के बीच कोई समझैता होगा? क्या इतनी दूर तक जाने के बाद सेना अध्यक्ष किसी समझौते के लिए तैयार होंगे? या दोनों सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करेंगे। पूरा देश जानना चाहता है कि आखिर सरकार ने इस बारे में अब तक कोई फैसला क्यों नहीं लिया? क्यों उसने ऐसी परिस्थिति पैदा की कि देश के सेनाध्यक्ष को न्याय और अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। क्या जो रहा है उसे टाला नहीं जा सकता था? क्या सरकार ने जो अब तक किया है उसके अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं था? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब पूरा देश जानना चाहता है। सब तरफ सवाल हैं जवाब कहीं से नहीं आ रहा। एक सेनाध्यक्ष जिसकी बहादुरी और निष्ठा की कसम उसके विरोधी भी खाते हैं, जिसने उच्च सैन्य अधिकारियों के भ्रष्टाचार से भारतीय सेना की धूमिल होती छवि को सुधारने के लिए सख्त कदम उठाए, जो सेना के भीतर से भ्रष्टाचार से कामयाबी से लड़ रहा है उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है। क्या जनरल वीके सिंह अपने राजनीतिक आकाओं के लिए समस्या बन गए हैं? क्या भारत के सेना अध्यक्ष अपना कार्यकाल बढ़ाने के लिए यह सब कर रहे हैं? ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं हैं। ऐसा मानने वालों का आरोप है कि वे अपने निजी लाभ के लिए सेना जैसे संस्थान की प्रतिष्ठा गिरा रहे हैं। ऐसे लोगों का मानना है कि जनरल वीके सिंह को अपने पद से इस्तीफा देने के बाद मामले को अदालत में ले जाना चाहिए था। उनके करीबियों का मानना है कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है जिसकी वजह से उन्हें इस्तीफा देना चाहिए। पूर्व सैन्य अधिकारियों का एक बड़ा वर्ग जनरल वीके सिंह के साथ खड़ा है। सरकार को भी पता है कि जनरल वीके सिंह अपनी जन्मतिथि के बारे में जो कह रहे हैं वह सही है। उनका जन्म पूना के सैनिक अस्पताल में हुआ। उनके पिता भी सेना में थे। उनके हाई स्कूल के सर्टीफिकेट में भी उनके जन्म का वर्ष 1951 ही दर्ज है। उन्हें राष्ट्रपति के जितने मेडल मिले हैं उन पर भी यही लिखा है। सेना के अधिकारियों का सारा रेकार्ड रखने वाले एजी (एडजुटेंट जनरल) ऑफिस में भी उनकी जन्मतिथि दस मई 1951 ही है। देश के चार मुख्य न्यायाधीशों (जिनमें न्यायमूर्ति जेएस वर्मा भी शामिल हैं) ने सेना को भेजी अपनी लिखित राय में जनरल वीके सिंह के पक्ष को सही माना है। सरकार का कहना है कि थल सेना अध्यक्ष बनने से पहले उन्होंने अपनी जन्मतिथि 10 मई, 1950 स्वीकार कर ली थी। अब दो सवाल उठते हैं। क्या सरकार के पास ऐसा कोई दस्तावेज है? दूसरा सवाल कि किसी की जन्मतिथि का फैसला दस्तावेजों के आधार पर होगा या उस व्यक्ति की स्वीकृति के आधार पर। सरकार ने अभी तक ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं किया है- सिवाय उस पत्र के जिसमें जनरल वीके सिंह ने कहा है कि संस्था के हित में वह अपने सेनाध्यक्ष (जनरल दीपक कपूर) का आदेश मानने को तैयार हैं। यह पत्र उन्होंने उस समय लिखा था जब उनसे कहा गया कि उनके अड़ने की वजह से थल सेना में अधिकारियों की तरक्की रुक जाएगी। उन्हें आश्वस्त किया गया कि सेना की कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के जरिए इसका न्यायोचित समाधान हो जाएगा, लेकिन उसके बाद रक्षा मंत्रालय ने इस संबंध में कुछ नहीं किया। मंत्रालय ने इस संबंध में उनकी वैधानिक याचिका खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में जनरल वीके सिंह ने कहा है कि उन्हें सम्मान के साथ रिटायर होने का अधिकार है। सरकार ने एक कैविएट दाखिल करके कहा है कि इस मामले में उसका पक्ष सुने बिना अदालत कोई फैसला न करे। अब प्रधानमंत्री खुद इस मामले को देख रहे हैं। सवाल है कि सरकार को जनरल वीके सिंह की बात मामने में ऐतराज क्या है? सरकार की ओर से कोई बात इस संबंध में नहीं कही गई है, पर अटार्नी जनरल की राय से इसका संकेत मिलता है। अटार्नी जनरल ने अपनी राय में कहा है कि जनरल वीके सिंह की जन्मतिथि 10 मई 1951 मानने से पहले से तय सक्सेशन चेन (उत्तराधिकार की श्रृंखला) गड़बड़ा जाएगी। दरअसल जनरल जेजे सिंह ने 2006 में रिटायर होने से पहले तय कर दिया था कि उत्तराधिकार की श्रृंखला क्या होगी। इसके जवाब में जनरल सिंह का प्रस्ताव था कि सरकार उत्तराधिकार की श्रृंखला को बरकरार रखे। सरकार उनकी जन्मतिथि 1951 मान ले और वह 2013 के बजाय 2012 में पद छोड़ने को तैयार हैं। जनरल वीके सिंह का कहना था कि अगर वह सरकार की बात मानकर अपनी जन्मतिथि 10 मई 1950 मान लेते हैं तो फौजियों और आम जनता की नजर में झूठे साबित हो जाएंगे। लोग कहेंगे कि वह चालीस साल तक झूठ बोलते रहे। सरकार ने इस प्रस्ताव को क्यों नहीं माना, इस बारे में कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। केंद्र की संप्रग सरकार की समस्या यह है कि वह पहले अपने लिए गड्ढा खोदती है और उसमें गिरने के बाद निकलने के उपाय खोजती है। इस मामले में भी यही हो रहा है। पूरे देश में जिस मुद्दे पर बहस चल रही है उस पर सरकार तब जागी है जब जनरल वीके सिंह सुप्रीम कोर्ट चले गए। सरकार ने उनके सामने कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा। भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ने वाले जनरल के सम्मान को ठेस पहुंचाकर सरकार क्या संदेश देना चाहती है। सरकार और सेनाध्यक्ष की यह लड़ाई सेना बनाम नागरिक प्रशासन बनती जा रही है। यह जनतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। सरकार सेना जैसी मजबूत संस्था को तो कमजोर कर ही रही है, अपनी प्रतिष्ठा को भी चोट पहुंचा रही है। इससे सेना का मनोबल प्रभावित हो सकता है। सरकार के लिए अब जनरल वीके सिंह को बर्खास्त करना आसान नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर जनरल ने भी साफ कर दिया है कि वह इस मुद्दे का निपटारा होने से पहले इस्तीफा देने के मूड में नहीं हैं। जनरल वीके सिंह एक फौजी के सम्मान के लिए लड़ रहे हैं। वह उस कसम की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं जो उन्होंने हर फौजी की तरह खाई थी कि झूठ नहीं बोलेंगे, चोरी नहीं करेंगे और किसी और को ऐसा करने भी नहीं देंगे। सरकार इस बात को समझ ले तो मामला अब भी सुलझ सकता है, पर सवाल है कि क्या सरकार इसके लिए तैयार है? (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

शिक्षा के साथ खिलवाड़

ग्रामीण इलाकों में छह से चौदह वर्ष के बच्चों की शिक्षा पर जारी रपट ने जो तस्वीर पेश की है वह जितनी चिंताजनक है उतनी ही निराशाजनक। मानव संसाधन विकास मंत्री की ओर से जारी इस रपट के अनुसार कई राज्यों में कक्षा पांच के छात्र कक्षा दो की पुस्तक मुश्किल से पढ़ पा रहे हैं और तीसरी कक्षा के छात्रों को सामान्य जोड़-घटाव करने में भी कठिनाई पेश आ रही है। इसका सीधा मतलब है कि राज्य सरकारें और उनका तंत्र अपने बुनियादी दायित्व को पूरा करने के लिए गंभीर नहीं। इस पर संतोष जताने का कोई मतलब नहीं कि ग्रामीण इलाकों में 96 प्रतिशत छात्रों ने दाखिला ले लिया है, क्योंकि न तो उनकी उपस्थिति संतोषजनक है और न ही पढ़ाई-लिखाई का स्तर। पढ़ाई-लिखाई के स्तर को सुधारने की कहीं कोई गंभीर कोशिश नहीं हो रही, इसका प्रमाण यह है कि अभिभावक सरकारी स्कूलों से तौबा कर अपने बच्चों का दाखिला निजी स्कूलों में करा रहे हैं और जो ऐसा नहीं कर पा रहे वे अपने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने की जरूरत महसूस कर रहे हैं। यह शिक्षा के साथ मजाक के अतिरिक्त और कुछ नहीं कि छह से चौदह वर्ष की आयु के बच्चे ट्यूशन पढ़ने के लिए मजबूर हों। जिस देश में सरकारी स्कूलों की पढ़ाई ऐसी हो कि छोटी कक्षाओं के बच्चों को भी ट्यूशन पढ़ने के लिए विवश होना पड़े उसके भविष्य को लेकर सुनिश्चित नहीं हुआ जा सकता। ग्रामीण इलाकों में निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या और सरकारी स्कूल छोड़कर उनमें दाखिला लेने की बढ़ती प्रवृत्ति यह बताती है कि राज्य सरकारें इसके प्रति तनिक भी सजग-सचेत नहीं कि शिक्षा समाज और राष्ट्र के निर्माण की पहली सीढ़ी है। हर समय अपने अधिकारों को लेकर शोर मचाने और केंद्र पर दोषारोपण करने वाली राज्य सरकारों को इसके लिए कठघरे में खड़ा ही किया जाना चाहिए कि वे शिक्षा के ढांचे को दुरुस्त करने के प्रति तनिक भी गंभीर नहीं। इस संदर्भ में मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने राज्य सरकारों पर जो दोष मढ़ा उसमें कुछ भी अनुचित नहीं। उन्होंने यह बिल्कुल सही कहा कि जब राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं करेंगी तो हालात कैसे सुधर सकते हैं? शिक्षा के ढांचे को ठीक करने और पठन-पाठन के स्तर को सुधारने को लेकर राज्य सरकारें गंभीर नहीं, इसके एक नहीं अनेक प्रमाण सामने आ चुके हैं। ज्यादातर राज्यों में योग्य शिक्षकों का अभाव तो है ही, एक बड़ी संख्या में शिक्षकों को ठेके पर रखा जा रहा है। राज्यों की अगंभीरता का एक बड़ा प्रमाण यह है कि छह से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कानून बनने के डेढ़ साल बाद भी अनेक राज्यों ने इस संदर्भ में आवश्यक अधिसूचना भी जारी नहीं की है। इस पर आश्चर्य नहीं कि पठन-पाठन के स्तर के मामले में दक्षिण भारत के राज्यों के मुकाबले उत्तर भारत के राज्यों की स्थिति गई बीती है, क्योंकि इन राज्यों के नीति-नियंता हर मामले में अपने सामाजिक दायित्व के निर्वहन में ढिलाई बरतने के लिए जाने जाते हैं। यदि वे शिक्षा के मामले में भी इसी तरह ढिलाई का परिचय देते रहते हैं तो इसका अर्थ है कि वे राष्ट्र की भावी पीढ़ी के साथ हो रहे अन्याय के दुष्परिणामों को समझने के लिए तैयार नहीं। केंद्र सरकार के लिए केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि वह राज्यों पर दोष मढ़कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ले। उसे कुछ ऐसे उपाय खोजने ही होंगे जिससे राज्य सरकारें कम से कम शिक्षा के मामले में अपने दायित्वों के प्रति चेतें।
साभार:-दैनिक जागरण

आर्थिक विकास को झटका

दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधार लागू करने में सरकार की हिचक को अर्थव्यवस्था में गतिरोध का कारण बता रहे हैं डॉ. आनंद पी. गुप्ता
उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद पिछले दो दशकों में आर्थिक विकास की दिशा में देश ने नई ऊंचाइयों को छुआ है। आज हमारी गिनती न केवल ताकतवर अर्थव्यवस्था वाले देश, बल्कि एक उभरती हुई विश्वशक्ति के रूप में भी होने लगी है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1991 में जहां हमारा विदेशी मुद्रा भंडार एक अरब डॉलर भी नहीं था, आज वह बढ़कर लगभग 300 अरब डॉलर से अधिक हो गया है, लेकिन सच्चाई का स्याह पक्ष यह भी है कि अब सरकार एक ऐसे रास्ते पर चल पड़ी है जहां से हमारी आर्थिक तरक्की की रफ्तार धीमी पड़ रही है। अमेरिका और यूरोप का संकट फिलहाल खत्म होता नजर नहीं आ रहा। लेकिन देश के सामने अंतरराष्ट्रीय स्थितियों से कहीं ज्यादा बड़ा संकट सरकार की सोच, उसकी तैयारी और नीतियों में सही तालमेल के अभाव का है। अतीत के अनुभवों को देखते हुए सरकार चालू खाते के घाटे और पुनर्भुगतान के किसी भी संभावित संकट के प्रति तो सतर्क है, लेकिन विकास के लिए जरूरी दीर्घकालिक नीतियों और दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों को लागू करने से हिचक रही है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) जैसे सुधार तत्काल लागू किए जाने की आवश्यकता है। इस दिशा में सरकार इच्छाशक्ति नहीं दिखा रही है। लगातार बढ़ती महंगाई और ब्याज दरों के कारण भी समस्या बढ़ी और औद्योगिक उत्पादन दर गिरी, लेकिन रिजर्व बैंक के पास इसके अलावा और दूसरा कोई उपाय नहीं था। यदि रिजर्व बैंक यह कदम न उठाता तो मांग बढ़ने से महंगाई और बढ़ती। रुपये की गिरती कीमत को रोकने के लिए भी रिजर्व बैंक से हस्तक्षेप की अपेक्षा ठीक नहीं, क्योंकि मात्र मौद्रिक उपाय प्रबंधन द्वारा इन गुत्थियों को सुलझाया नहीं जा सकता। इसके लिए सरकार को राजस्व घाटे पर नियंत्रण पाना होगा और नीतियों की प्राथमिकता समेत उनके सही क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना होगा। लोक धन की बेतहासा लूट आज चिंता का विषय है। इससे लोगों में संदेश गया है कि सार्वजनिक या सरकारी धन किसी का नहीं है और इसे मनमाने तरीके से लूटा जा सकता है। मनरेगा, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसी योजनाओं में बड़े पैमाने पर हुई धांधली इस बात का प्रमाण है। पिछले सात वर्षो में सरकार की प्राथमिकता सिर्फ सत्ता में बने रहने और चुनाव जीतने के लिए लोकलुभावन नीतियां लागू करने पर केंद्रित रही है। इस संदर्भ में हालिया उदाहरण खाद्य सुरक्षा बिल का है, जिसके तहत देश की करीब दो-तिहाई गरीब आबादी को सस्ते दाम में चावल, गेहूं और मोटा अनाज मिलेगा। योजना के तहत बड़ी संख्या में लोगों को दो रुपये किलो गेहूं, तीन रुपये किलो चावल और एक रुपये किलो मोटा अनाज दिया जाएगा। यहां सवाल उठता है कि जब इतना सस्ता अनाज बांटा जाएगा तो कोई अपने लिए खेती-किसानी क्यों करेगा? स्वाभाविक है कि कृषि प्रभावित होगी और देश खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता की स्थिति खो देगा। इस तरह हमें फिर से अनाज विदेशों से आयात करना होगा और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा। यहां और भी प्रश्न हैं, जैसे गरीबों का निर्धारण व आकलन कैसे होगा, जब सार्वजनिक वितरण प्रणाली पहले ही विफल है तो इस योजना के सही क्रियान्वयन का तरीका या तंत्र क्या होगा और पैसा कहां से आएगा? इसी तरह खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का निर्णय लिए जाने से पहले दूसरे कई निर्णय लिए जाने आवश्यक थे, जिनमें ऊर्जा क्षेत्र में सुधार अत्यधिक जरूरी था। पर सरकार ने ऐसा करने की बजाय हड़बड़ी में एफडीआइ को पहले स्वीकृति देने की तैयारी कर ली। हमारे कुल विदेशी मुद्रा भंडार के 22 से 23 प्रतिशत के बराबर लिए गए अल्पकालिक ऋणों के भुगतान की समयसीमा 2012 में पूरी हो रही है और देश के वर्तमान राजनीतिक व आर्थिक माहौल में विदेशी निवेशकों का विश्वास डगमगा रहा है। ऐसे में यदि उन्होंने अपना पैसा वापस मांग लिया यानी रोलओवर न किया तो देश के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। सरकार इस बात को समझ रही है। 1991 के संकट को हम भूले नहीं हैं। यही कारण है कि जहां एक ओर चुनाव जीतने के लिए लोकलुभावन नीतियां बनाई जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर विदेशी निवेशकों को खुश करने के लिए आर्थिक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत दिया जा रहा है। सरकार का यह कहना भी सही नहीं है कि अर्थव्यवस्था की खराब होती हालत के लिए अंतरराष्ट्रीय हालात जिम्मेदार हैं। सच्चाई यह है कि हमारी घरेलू नीतियां व सरकार के अदूरदर्शितापूर्ण कदम हालात को अधिक जटिल बना रहे हैं। आखिर किसने सरकार को आर्थिक सुधार करने से रोक रखा है? रास्ता यही है कि सरकार अपनी नीतियों की प्राथमिकता फिर से तय करे, लोकधन की लूट को रोकने के लिए समुचित कदम उठाए और जनसांख्यिकीय बढ़त का फायदा उठाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य तथा विकास कार्यक्रमों पर अधिक ध्यान दे ताकि हमारे युवा देश के विकास का इंजन बन सकें। आज इस बात की भी आवश्यकता है कि खर्च किए जा रहे सार्वजनिक धन का लाभ आम लोगों को वास्तविक रूप में मिले। इसके लिए फरवरी 2005 में सरकार ने आउटकम बजट का प्रावधान किया था जिस पर अमल भी हो रहा है, लेकिन प्रभावी न होने से यह लगभग विफल हो चुका है। इसलिए जरूरत सही नीतियों के निर्माण के साथ ही उनके सही क्रियान्वयन की भी है। (लेखक आइआइएम, अहमदाबाद में अर्थशास्त्र के सीनियर प्रोफेसर रहे हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

महत्वाकांक्षाओं का टकराव

राजनीति में सिद्धांतों और मूल्यों में आ रही गिरावट पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं निशिकान्त ठाकुर

पंजाब में विधानसभा चुनाव के लिए पर्चे भरने का दौर संपन्न हो गया। चुनाव की घोषणा के बाद से लेकर इस बीच तक जितनी तरह की जद्दोजहद देखी गई, उसमें कुछ भी किसी के लिए नया नहीं है। निर्वाचन आयोग की सख्ती के कारण कुछ प्रवृत्तियों पर रोक लगी है तो कुछ नई प्रवृत्तियां पनपी भी हैं। पहले जैसा शोरगुल और धूम-धड़ाका अब चुनावों के दौरान नहीं देखा जा रहा है, इसे एक शुभ संकेत के रूप में देखा जा सकता है। सबसे अच्छी बात यह है कि निरर्थक मुद्दे और असंभव वादे भी इस बार चुनाव में दिखाई नहीं दे रहे हैं। आयोग की सख्ती इसके पीछे एक वजह है, लेकिन दूसरे कारण भी हो सकते हैं। शायद राजनेताओं को इस बात का एहसास हो गया है कि मतदाता अब पहले जैसे भोले-भाले नहीं रहे। आम नागरिक अब पहले की तुलना में बहुत ज्यादा जागरूक और सचेत हो गया है। इसीलिए राज्य का विकास ही मुख्य मुद्दे के रूप में उभरा है। विकास कितना हुआ, कितना नहीं हुआ, किन मसलों पर काम करने की जरूरत है और राज्य की दिशा क्या हो, ये सवाल ही चर्चा के केंद्र में हैं। इसके बावजूद राजनीति और उसके जरिये विकास के प्रति आश्वस्त होने जैसा माहौल अभी दिखाई नहीं देता है। इसके मूल में केवल चुनावी मैदान में पार्टियों और उम्मीदवारों के बीच चल रही जंग एवं उसके तौर-तरीके ही नहीं, परदे के पीछे चली लड़ाई भी है। पार्टियों के भीतर जिस तरह का संघर्ष हुआ है, उसका अंदाजा मैदान में आए विद्रोही उम्मीदवारों की तादाद से लगाया जा सकता है। कांग्रेस यहां अकेले चुनावी मैदान में है, जबकि शिरोमणि अकाली दल (बादल) और भाजपा एक गठबंधन के रूप में मिल कर जोर आजमा रहे हैं। दोनों प्रमुख पक्षों के लोगों में यह प्रवृत्ति देखी जा रही है कि कई उम्मीदवार अपनी-अपनी पार्टी से विद्रोह कर बागी के तौर पर मैदान में आ गए हैं। यह अलग बात है कि किसी का उद्देश्य खुद जीतना है तो किसी का इरादा किसी दूसरे उम्मीदवार को हराने भर का है। जो लोग खुद जीतने और विधानसभा में पहुंचकर जनता की सेवा को अपना उद्देश्य बता रहे हैं, वे भी अपनी जीत के प्रति कितने आश्र्वस्त हैं, यह बात लगभग साफ है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इनमें से कुछ जीत भी सकते हैं। ऐसा प्राय: होता रहा है कि कुछ बागी उम्मीदवार निर्दल या दूसरे दलों के प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीतते रहे हैं और बाद में वे राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाते रहे हैं। लेकिन यह बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। वास्तव में यह संकेत है राजनीति में मूल्यों और सिद्धांतों के कमजोर होने का। जहां तक बात पंजाब की है, विधानसभा की यहां कुल मिलाकर 117 सीटें हैं। अगर एक पार्टी के टिकट के दावेदारों की ही असली सूची बनाई जाए तो वह एक हजार से कम पर नहीं रुकेगी। एक अनार सौ बीमार की यह स्थिति हर चुनाव में हर पार्टी के सामने होती है। इससे सबसे पहली बात जो जाहिर होती है, वह यह है कि राजनीति में अब आकर्षण का कारण जनसेवा और विचार तो रहे ही नहीं। सबके लिए आकर्षण का केंद्र पद, प्रतिष्ठा और उससे जुड़े अधिकार एवं लाभ हो गए हैं। पार्टियों में लोग आ ही इस इरादे से रहे हैं कि ज्वाइन करते ही उन्हें पार्टी में कोई महत्वपूर्ण पद मिल जाए और चुनाव आते ही लोकसभा या विधानसभा का टिकट। इस महत्वाकांक्षा को मूर्त रूप देने के लिए क्षेत्र में मेहनत कोई नहीं करना चाहता है। न तो कोई आम जनता के दुख-दर्द से रूबरू होना चाहता है और न पार्टी के कार्यक्रमों-आयोजनों में ही योगदान करना चाहता है। सबसे बड़ी योग्यता अब गणेश परिक्रमा मानी जाती है और इसी पर पूरा जोर दिया जाता है। इसका नतीजा यह हुआ है कि पार्टियों के भीतर आपसी संघर्ष बहुत बढ़ गया है। गलाकाट प्रतिस्पर्धा की इस स्थिति के चलते न केवल मानवीय मूल्य, बल्कि सिद्धांत और प्रमुख राजनीतिक घरानों के आपसी रिश्ते तक सभी छीजते दिख रहे हैं। विभिन्न दल एक-दूसरे के भीतर मचे इस संघर्ष से कोई सीख लेने की स्थिति में भी नहीं हैं। क्योंकि एक तो उनके यहां भी हालात वही हैं और दूसरे सभी एक-दूसरे की कमजोरियों से सिर्फ फायदा उठाने की ताक में हैं, खुद अपनी उन्हीं कमजोरियों का इलाज किए बगैर। गणेश परिक्रमा को खुद पार्टियों के जिम्मेदार नेता ही बढ़ावा दे रहे हैं। आमतौर पर यह देखा जाता है कि बड़े नेता स्वयं अपने हित में भी अपने मन के खिलाफ कोई बात सुनना नहीं चाहते हैं। वे सिर्फ उन्हीं लोगों को अपने निकट रखते हैं जो उनके मन की बात करें, भले ही वह उनके तथा पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो। नतीजा यह हो रहा है कि बड़े नेताओं के इर्द-गिर्द चाटुकारों की फौज जुटती जा रही है और योग्य लोग उनसे दूर होते जा रहे हैं। चुनावों के दौरान जब टिकटों का बंटवारा होना होता है, उस वक्त भी यही आधार पूरे राजनीतिक परिदृश्य पर हावी हो जाता है। बड़े राजनेता इस मामले में सबसे पहले अपने परिजनों-रिश्तेदारों को तरजीह देते हैं। इसके बाद उनके निकट के दूसरे लोग आते हैं। फिर पार्टी के वरिष्ठ लोग और वे लोग जिनके जीतने की उम्मीद होती है, चाहे जीत कैसे भी क्यों न मिले। ऐसा नहीं है कि उम्मीदवारों के चयन के लिए कोई वैज्ञानिक आधार पार्टियों के पास हैं ही नहीं। वैज्ञानिक आधार हैं और अगर उन पर कायदे से काम किया जाए तो शायद उम्मीदवारों, पार्टियों और देश की स्थिति ही कुछ और हो। दुर्भाग्य यह है कि उन आधारों को अक्सर दरकिनार कर दिया जाता है और दूसरी तरफ उम्मीदवारों की महत्वाकांक्षाएं भी उबलने लगती हैं। फिर जो घमासान मचता है उसमें नीतियों-सिद्धांतों से लेकर जनहित और विवेक तक सभी तिरोहित हो जाते हैं। सच तो यह है कि इसके चलते आम जनता से राजनीतिक पार्टियों का संपर्क और जुड़ाव ही खत्म होता जा रहा है। ज्यादातर पार्टियों के पास अब सिर्फ नेता बचे हैं, कार्यकर्ता दिखते ही नहीं हैं। इसीलिए चुनाव में धनबल की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती जा रही है। हालांकि सभी जानते हैं कि यह स्थिति बहुत दिनों तक चल नहीं पाएगी। इसके बावजूद आत्मविश्लेषण का समय किसी के भी पास नहीं है। बेहतर यह होगा कि पार्टियां और राजनेता इस सोच से उबरें और पहले के नेताओं की तरह जनसेवा को महत्व दें। निजी महत्वाकांक्षा कोई खराब बात नहीं है, लेकिन इस मामले में थोड़े धैर्य और संयम से काम लें। अपने एवं अपने लोगों के साथ-साथ दूसरों की योग्यता का भी सम्यक मूल्यांकन करें और यथोचित महत्व दें। यह न केवल समाज के हित है बल्कि दीर्घकालिक राजनीति में स्वयं को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए भी जरूरी है। (लेखक दैनिक जागरण के स्थानीय संपादक हैं
साभार:-दैनिक जागरण

अप्रिय प्रसंग

यह असामान्य और अभूतपूर्व है कि थलसेनाध्यक्ष की उम्र से जुड़ा विवाद अदालत की चौखट तक पहुंच गया। थलसेनाध्यक्ष वीके सिंह का सुप्रीम कोर्ट जाना इसलिए चकित करता है, क्योंकि अभी तक उनके साथ-साथ सरकार भी यही संकेत दे रही थी कि इस विवाद को तूल नहीं पकड़ने दिया जाएगा। जहां जनरल वीके सिंह यह कह रहे थे कि वह इस विवाद पर रक्षामंत्री एके एंटनी की ओर से दिए गए भरोसे की सराहना करते हैं वहीं रक्षामंत्री के साथ-साथ अन्य केंद्रीय मंत्री भी यह संकेत दे रहे थे कि इस मामले का सहज तरीके से समाधान कर लिया जाएगा। जनरल वीके सिंह के सुप्रीम कोर्ट जाने से न केवल यह स्पष्ट हो गया कि सरकार सहज समाधान खोजने में नाकाम रही, बल्कि यह भी साफ हुआ कि अपने स्वभाव के अनुरूप उसने एक और विवादास्पद मामले को लटकाए रखा। सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस विवाद का निपटारा चाहे जैसे किया जाए, हर कोई यह महसूस करेगा कि शीर्ष स्तर के सैन्य अधिकारी की उम्र को लेकर एक तो कोई विवाद उपजना नहीं चाहिए था और यदि वह उपजा तो उसका समाधान सद्भावपूर्ण तरीके से होना चाहिए था। यह निराशाजनक है कि ऐसा नहीं हो सका। जनरल वीके सिंह के सुप्रीम कोर्ट जाने पर इस तर्क को महत्ता देना कठिन है कि आम भारतीय नागरिक की तरह वह भी अदालत जा सकते हैं, क्योंकि यह मामला थलसेनाध्यक्ष द्वारा सरकार को सुप्रीम कोर्ट में खींचने का बन गया है। यह शोभनीय प्रसंग नहीं कि जन्मतिथि को लेकर ही सही, थलसेनाध्यक्ष और सरकार सुप्रीम कोर्ट में आमने-सामने होंगे। भले ही यह रेखांकित करने की कोशिश की जाए कि वीके सिंह आम नागरिक की हैसियत से अदालत गए हैं, लेकिन इस तथ्य की अनदेखी नहीं हो सकती कि वह 13 लाख सैन्य कर्मियों का नेतृत्व कर रहे भारतीय थलसेना के सर्वोच्च अधिकारी हैं। अपनी उम्र को लेकर उपजे विवाद के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की जनरल वीके सिंह की पहल से जाने-अनजाने देश को यही संदेश जा रहा है कि सरकार ने अपने ही थलसेनाध्यक्ष के दावे पर यकीन नहीं किया। वैसे किसी के लिए भी यह कहना कठिन है कि सेना के दस्तावेजों में दर्ज जनरल वीके सिंह की दो जन्म तिथियों में से कौन सी सही मानी जानी चाहिए, लेकिन क्या कोई बताएगा कि आखिर सरकारी फाइलों में दो जन्म तिथियां दर्ज क्यों बनी रहीं? इससे भी जटिल सवाल यह है कि 36 वर्ष के सेवाकाल के बावजूद इस विवाद को क्यों नहीं सुलझाया जा सका? क्या सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वह जनरल वीके सिंह को थलसेनाध्यक्ष पद पर लाने के पहले उनकी उम्र से जुड़े विवाद का समाधान कर लेती? यदि वह किन्हीं कारणों से तब ऐसा नहीं कर सकी तो फिर उसे उनकी सेवानिवृत्ति का समय नजदीक आने के पहले ही समाधान तक पहुंच जाना चाहिए था? इसलिए और भी, क्योंकि वीके सिंह थलसेनाध्यक्ष बनने के पहले ही अपनी अलग-अलग जन्म तिथियों का मामला सतह पर ले आए थे। सरकार को यह अच्छे से पता होना चाहिए था कि यह अनसुलझा विवाद उसके समक्ष सिर उठाएगा। यह तो सबको ज्ञात है कि सरकार छोटे-छोटे मुद्दों पर ध्यान नहीं देती, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि वह बड़े मुद्दों की भी उपेक्षा करती है।
साभार:-दैनिक जागरण

चुनाव, धनबल और कानून

चुनावों में धनबल पर अंकुश लगाने के चुनाव आयोग के प्रयासों पर राजनीतिक दलों को पलीता लगाते देख रहे हैं सुधांशु रंजन

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां मतदाताओं की कुल संख्या 72 करोड़ से ज्यादा है जो बहुत से देशों की कुल आबादी से भी अधिक है। इतनी बड़ी आबादी के लिए चुनाव की व्यवस्था करना कोई आसान काम नहीं है। फिर भी यहां का चुनाव काफी हद तक स्वतंत्र तथा निष्पक्ष माना जाता है। 1952 का प्रथम चुनाव पूरी तरह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष था जिसमें धनबल, बाहुबल या जाति की कोई भूमिका नहीं थी, किंतु धीरे-धीरे बाहुबल एवं धनबल का प्रदर्शन बढ़ने लगा। टीएन शेषन के नेतृत्व में चुनाव आयोग की सक्रियता के कारण बाहुबल का प्रयोग तो लगभग समाप्त हो गया, लेकिन धनबल की भूमिका अभी भी काफी सशक्त है। इधर कुछ वषरें से चुनाव आयोग की तत्परता के कारण प्रशासन करोड़ों की धनराशि चुनाव के वक्त जब्त कर रहा है। लेकिन चुनाव में खपने वाली भारी-भरकम धनराशि की तुलना में जब्त की जाने वाली यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। अब तो चुनाव में नकद राशि के साथ-साथ शराब तक बांटी जाने लगी है। इस पर अंकुश लगाने की दिशा में उच्चतम न्यायालय एवं चुनाव आयोग लगातार प्रयास कर रहे हैं किंतु सफलता पूरी तरह नहीं मिल पाई है। दरअसल, राजनीतिक दलों ने उन प्रयासों को निष्प्रभावी करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। विभिन्न याचिकाओं के माध्यम से अदालतों के समक्ष यह प्रश्न उठता रहा है कि राजनीतिक दल, दोस्तों एवं संबंधियों द्वारा किए गए खर्च को भी उम्मीदवार के खर्च में शामिल माना जाना चाहिए या नहीं। प्रारंभ में अदालत इसे प्रत्याशी के खर्च में शामिल करने के पक्ष में नहीं थी। रणंजय सिंह बनाम बैजनाथ सिंह (1954) से लेकर बीआर राव बनाम एनजो रंजा (1971) मामलों में उच्चतम न्यायालय ने खर्च के बारे में यही रवैया अपनाया। किंतु 1975 में कंवरलाल बनाम अमरनाथ में व्यवस्था दी कि अत्यधिक संसाधन की उपलब्धता किसी उम्मीदवार को दूसरों के मुकाबले अनुचित लाभ प्रदान करती है जो अलोकतांत्रिक है। अदालत ने एक चेतावनी भी दी, चुनाव के पहले दिया गया चंदा चुनाव के बाद के वादे के रूप में काम करेगा जिससे आम आदमी के हितों पर कुठाराघात होगा। इसलिए उच्चतम न्यायालय ने राजनीतिक दल, दोस्तों एवं रिश्तेदारों द्वारा किए गए खर्च को उम्मीदवार के चुनावी खर्च का हिस्सा माना। अदालत के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए 1974 में जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 77 में संशोधन कर एक व्याख्या जोड़ दी कि ऐसे खर्च को उम्मीदवार के खर्च से अलग माना जाएगा। इस तरह चुनाव में ऊलजुलूल खर्च करने को वैधानिकता प्रदान की गई। 1994 में उच्चतम न्यायालय ने गडक वाईके बनाम बालासेह विखे पाटिल मामले में इस व्याख्या को खत्म करने पर जोर दिया। फिर गंजन कृष्णाजी बापट मामले में उच्चतम न्यायालय ने राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त एवं खर्च की गई राशि का सही हिसाब रखने के लिए नियम बनाने की जरूरत पर जोर दिया। 1996 में कॉमन कॉज मामले में उच्चतम न्यायालय ने जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 77 की व्याख्या कंपनी अधिनियम, 1956 के आलोक में की। कंपनी अधिनियम की धारा 293-ए के तहत कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा देना वैध है तथा आयकर अधिनियम की धारा 13-ए के अंतर्गत इस पर कर में छूट है, किंतु ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, जो राजनीतिक दलों को सही खाता रखने को मजबूर करे। इसलिए अदालत ने निर्णय दिया कि जो राजनीतिक दल आयकर रिटर्न नहीं भर रहे हैं वे आयकर कानून का उल्लंघन कर रहे हैं और केंद्रीय वित्त सचिव को इसकी जांच करने का निर्देश दिया। इस तरह अदालत ने लगातार स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करने के लिए धनबल की भूमिका को कम करने का प्रयास किया। आयोग ने पिछले कई दशकों से अपनी महती जिम्मेदारी का निर्वाह सराहनीय ढंग से किया है, किंतु उसे राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त नहीं होता है। आज भी कई राजनेता चुनावी कदाचार के लिए चुनाव आयोग की सख्ती को जिम्मेदार मानते हैं। उनका तर्क है कि चूंकि आयोग ने प्रचार पर इतनी तरह की पाबंदियां लगा दीं कि लाचार होकर उम्मीदवारों ने नोट और शराब बांटनी शुरू कर दीं। दिक्कत यह है कि निरक्षर या कम शिक्षित लोग अपने मत की महत्ता नहीं समझते और शिक्षित लोग कतार में खड़े होकर मतदान करना अपना अपमान समझते हैं; इसलिए उनके लिए मतदान का दिन मुफ्त का अवकाश होता है। कई बार यह सुझाव दिया गया कि राज्य चुनाव खर्च को वहन करे। यानि प्रत्याशियों को कोई खर्च नहीं करना होगा और केवल सरकार उनके प्रचार की व्यवस्था करेगी। शायद यह भी समाधान नहीं है। अगर ऐसा हो भी जाता है तो क्या जरूरी है कि सभी उम्मीदवार साधु हो जाएं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी ने भी इसका विरोध इसी आधार पर किया है। वैसे कुछ हद तक तो राज्य चुनाव का खर्च वहन करता ही है। मसलन, उम्मीदवारों को रियायती दरों पर कई सुविधाएं देना और आकाशवाणी-दूरदर्शन पर विभिन्न दलों को प्रचार का समय दिया जाना इसमें शामिल है। लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में तो फिर भी आयोग काफी हद तक धनबल पर रोक लगा पाता है, किंतु राज्यसभा चुनाव में थैलीशाह खुलकर विधायकों की खरीद-फरोख्त करते हैं और राज्यसभा में प्रवेश करते हैं। अभी तो कई राज्यसभा सदस्य ऐसे हैं जो उन राज्यों से निर्वाचित हुए हैं जहां चुनाव लड़ने से पहले वे कभी गए तक नहीं। धनबल के इस्तेमाल को रोकना भी असंभव नहीं है। आज चुनाव हिंसा मुक्त हो चुके हैं क्योंकि अपराधी समझ गए कि गुंडागर्दी करने पर वे कानून की गिरफ्त में होंगे। ऐसा ही संदेश धनबल के बारे में जाना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

छल-कपट की राजनीति

निर्वाचन आयोग की नोटिस और नाराजगी के बाद केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के नौ प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण संबंधी बयान को उनका निजी विचार बताने के 24 घंटे के अंदर ही कांग्रेस ने जिस तरह पलटी खाते हुए यह कहा कि वह अल्पसंख्यक आरक्षण बढ़ाने के पक्ष में है उससे यह साफ हो गया कि उसके सिर सांप्रदायिक राजनीति का भूत सवार हो गया है। कांग्रेस ने सलमान खुर्शीद के कथित निजी विचार को जिस तरह गले लगाया उससे इसकी आशंका और बढ़ गई है कि यह राष्ट्रीय दल उन राजनीतिक दलों को भी मात दे सकता है जो बिना किसी संकोच जाति और संप्रदाय की राजनीति करते हैं। उस देश की राजनीति के पतन का अनुमान अच्छे से लगाया जाता है जहां मुख्यधारा के राजनीतिक दल खुलकर जाति-मजहब की राजनीति करते हों। इस पर आश्चर्य नहीं कि कांग्रेस की ओर से अल्पसंख्यक अर्थात मुस्लिम आरक्षण में बढ़ोतरी के संकेत देते ही समाजवादी पार्टी ने 18 प्रतिशत आरक्षण की पेशकश कर दी। कांग्रेस चुनाव जीतने के लिए जैसे हथकंडे अपनाने पर उतर आई है उससे यह और अच्छे से स्पष्ट हो रहा है कि देश का सबसे बड़ा और पुराना राजनीतिक दल जानबूझकर अपनी गरिमा से खिलवाड़ करने पर आमादा है। नि:संदेह यह समझ आता है कि कांग्रेस पांच राज्यों और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में अपना खोया हुआ जनाधार पाने के लिए बुरी तरह बेचैन है, लेकिन इसकी उम्मीद नहीं थी कि इसके लिए वह समाज का मजहबी आधार पर ध्रुवीकरण करने की कोशिश करेगी। उसकी यह कोशिश विभाजन पैदा करने वाली राजनीति का पर्याय है। पहले साढ़े चार प्रतिशत अल्पसंख्यक आरक्षण का फैसला लेने और फिर उसे बढ़ाकर नौ फीसदी करने के पीछे कांग्रेस सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों के साथ-साथ 2009 के अपने घोषणा पत्र के कथित वायदे की आड़ ले रही है। यह और कुछ नहीं, अल्पसंख्यक समाज सहित पूरे देश को धोखा देने की कोशिश है, क्योंकि सब जानते हैं कि उक्त सिफारिशें सामने आए वर्षो बीत चुके हैं और उसका घोषणा पत्र भी करीब तीन वर्ष पुराना पड़ चुका है। कांग्रेस और साथ ही उसके नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता को पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के ठीक दो दिन पहले जिस तरह सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशें याद आईं उससे यह स्वत: स्पष्ट हो जाता है कि वह 2009 से लेकर अब तक हाथ पर हाथ धरे बैठे मुस्लिम समाज की दुर्दशा देखती रही। यदि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करना उसके लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनता तो वह मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन की परवाह अभी भी नहीं करती। पता नहीं मुस्लिम समाज कांग्रेस के इस चुनावी हथकंडे को समझ सकेगा या नहीं, लेकिन अब जब सलमान खुर्शीद का निजी विचार कांग्रेस की आधिकारिक नीति बन गया है तब फिर चुनाव आयोग को कुछ सख्ती दिखानी ही होगी। यदि यह आयोग चुनाव जीतने के लिए की जाने वाली मनमानी घोषणाओं पर कठोर रवैये का परिचय नहीं देता तो उसके लिए अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा कर पाना मुश्किल होगा। यह ठीक नहीं कि चुनाव आयोग सलमान खुर्शीद के नौ प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण संबंधी अपने विचार पर अडिग रहने के बावजूद उनके खिलाफ कार्रवाई करने के मामले में हिचकिचाहट का परिचय दे रहा है।
साभार:-दैनिक जागरण