Saturday, July 16, 2011
सांप्रदायिक हिंसा बिल पर गुलाब कोठारी के विचार
आतंकियों को अभयदान
वोट बैंक की राजनीति के चलते आतंकियों को प्रोत्साहन मिलता देख रहे हैं अरुण जेटली
मुंबई में हालिया बम धमाके हमें स्मरण दिलाते हैं कि हम आतंकी निशाने पर सबसे ऊपर हैं। हम इस दलील पर संतुष्ट नहीं हो सकते और अपनी तैयारियों को ढीला नहीं छोड़ सकते कि मुंबई पर 31 माह बाद आतंकी हमला हुआ है। बार-बार मुंबई पर ही क्यों आतंकी हमले किए जाते हैं? कारण स्पष्ट है। मुंबई पर हमले भारतीय अर्थव्यवस्था पर आघात हैं। इनकी दुनिया भर में चर्चा होती है। मुंबई पर बड़े आतंकी हमलों का सिलसिला 1993 से शुरू हुए। ट्रेन धमाके और 26/11 के आतंकी हमलों के बाद यह सिलसिला अब तक जारी है। मुंबई शहर की मूलभावना उद्यमिता है। यह समावेशी है और लचीली भी। किंतु इसका यह मतलब नहीं कि आतंक के विरुद्ध मुंबई का रवैया नरम है। मुंबई एक हमले के बाद दूसरे हमले का इंतजार नहीं कर सकती। मुंबई पर बार-बार होने वाले हमले पूरे देश को चेताते हैं कि हमें एक कारगर खुफिया, निरोधात्मक और दंडात्मक व्यवस्था तैयार करनी होगी। इसके तहत देश में कहीं भी किसी के भी खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की तैयारी करनी होगी। अगर कोई आतंक के माध्यम से भारत पर हमला करने की जुर्रत करता है तो हमें सुनिश्चित करना होगा कि उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़े। अमेरिका में 9/11 हमले के बाद कोई भी उसके खिलाफ आतंकी हमला करने का दुस्साहस नहीं कर पाया। मुंबई को भी इसी भावना के साथ चलना होगा कि इस पर यह अंतिम हमला है। भारत उपद्रवी पड़ोसियों से घिरा है। यद्यपि हालिया हमले से संबंधित तथ्यों की पड़ताल जारी है और ऐसे में यही उचित है कि कोई भी अभी अंतिम निष्कर्ष तक न पहुंचे। फिर भी इसमें कोई शक नहीं है कि सीमा पार के प्रोत्साहन पर ही लश्करे-तैयबा और इस जैसे अनेक आतंकी संगठन खड़े किए गए हैं। इनका लक्ष्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अस्थिरता फैलाना है। कसाब और शिकागो मामले से मिले साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते हैं। पश्चिमी सीमा पर हमारे पड़ोसी ने आतंकवाद को राष्ट्र नीति के औजार के तौर पर इस्तेमाल किया है। पाकिस्तानी से जुड़े सूत्रों के बिना विश्व में कहीं भी कोई बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ है। पाकिस्तान को उचित ही वैश्विक आतंक की धुरी बताया जाता है। विश्व के सर्वाधिक कुख्यात आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को विश्व में अगर कहीं पनाह मिली तो केवल पाकिस्तान में। इंडियन मुजाहिद्दीन का गठन इसलिए किया गया ताकि घरेलू आतंकियों को संगठित किया जा सके। हालिया वर्षो में भारत पर हुए अनेक आतंकी हमलों के सूत्र इंडियन मुजाहिद्दीन से जुड़े हैं। बड़ी संख्या में इसके सदस्यों की गिरफ्तारी के कारण यह पिछले कुछ वर्षो से शांत पड़ा था। लगता है अब ये फिर से संगठित हो रहे हैं। आतंकी घटनाओं के सिलसिले के प्रति भारत की प्रतिक्रिया क्या है? जाहिर है, हम इनकी भर्त्सना की रस्मअदायगी करते हैं। हम हादसों के शिकार लोगों की मौत पर विलाप करते हैं और घायलों को राहत प्रदान करते हैं। किंतु इस सबसे भारतीय समाज को क्या संकेत मिलता है, खासतौर पर उन लोगों के संबंध में जो सरकार में हैं और आतंकवाद के खिलाफ समर्पण कर रहे हैं। आतंकी घटनाओं की पड़ताल और आतंकियों को दंडित करने के लिए राजीव गांधी ने टाडा लागू किया था। कुछ राज्यों ने किसानों के खिलाफ इसका दुरुपयोग किया किंतु इसे रद नहीं किया गया। जब 1993 के विस्फोट करने वाले आतंकियों के खिलाफ इसका सही इस्तेमाल किया जा रहा था, तो इसे रद करने का एक अभियान छेड़ दिया गया और टाडा को रद कर दिया गया। इसके बाद पोटा को इस आधार पर रद किया गया कि हमें आतंक के खिलाफ विशेष कानून की आवश्यकता नहीं है। जो लोग आतंक के खिलाफ विशेष कानून लाने की आवश्यकता नहीं समझते, वे अब सांप्रदायिक हिंसा से निपटने के लिए एक बेहद पक्षपाती कानून लाने की सोच रहे हैं, जिसके तहत केवल एक समुदाय को ही दंडित किया जा सकेगा। जब आतंकवादी बटला हाउस में शरण पाते हैं तो कुछ वरिष्ठ राजनेता हमारे सुरक्षा बलों पर सवाल खड़े करते हैं जो बटला हाउस मुठभेड़ में शामिल थे। वोट बैंक की राजनीति के चलते कुछ राजनेता आजमगढ़ में संदिग्धों के घर जाकर उनसे सहानुभूति प्रकट करने को मजबूर हो जाते हैं। एक कांग्रेसी राजनेता तो आतंक के शिकार लोगों के परिजनों से मिलने के बजाए आरोपी के परिजनों से मिलने पहुंच जाते हैं। संसद हमले के दोषी की फांसी की सजा टालने के पीछे भी वोट बैंक और सिर्फ वोट बैंक की राजनीति ही जिम्मेदार है। सितंबर 2009 तक जिस नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर के गठन का वादा किया गया था, उसे अब तक पूरा नहीं किया गया। मुख्यधारा के कुछ राजनीतिक दलों ने आतंकियों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि आप आतंकी हमले करके साफ बच सकते हैं। इन हालात में हम सुनिश्चित नहीं हो सकते कि मुंबई पर फिर आतंकी हमले नहीं होंगे। माओवादी विद्रोह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती है। जब गृहमंत्री ने इसके खिलाफ कड़े कदम उठाने की कोशिश की तो उन्हीं की पार्टी ने कहा कि केंद्र सरकार को वैकल्पिक कदम उठाने चाहिए। जब माओवादी भारत के लोकतंत्र पर हमला करते हैं तो उनके खिलाफ कड़े कदम उठाने के बजाए आपको लचर दलीलें सुनने को मिलती हैं कि लोग माओवादी क्यों बनते हैं। क्या सिविल समाज के अलंबरदारों या राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के एजेंडे में राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा रहा है? मुंबई की भावना एक राष्ट्रीय हल की दिशा में कदम बढ़ाने की मांग करती है, ताकि तमाम राजनीतिक, प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी बाधाओं को दूर करते हुए आतंक का खात्मा किया जा सके। मुंबई की भावना को बार-बार होने वाले आतंकी हमलों से जख्मी नहीं किया जा सकता। जो लोग पाकिस्तान के साथ वार्ताओं के पक्षधर हैं, उन्हें स्मरण होना चाहिए कि आज पाकिस्तान में हालात बेकाबू हैं और वहां अराजकता फैली है। दिखावे के रूप में वहां आतंक के खिलाफ युद्ध चल रहा है। किंतु पाकिस्तान के उन लोगों से गहरे संबंध हैं जो आतंकवाद फैलाते हैं। जब तक पाकिस्तान कट्टरता को त्यागने, पारदर्शिता लाने, लोकतंत्र के पथ पर चलने और एक राष्ट्र के तौर पर खुद को आतंक से अलग करने का संकल्प नहीं लेता, इसके साथ किसी भी प्रकार के संबंध संदेहास्पद होंगे। पाकिस्तान के संबंध में सरकारी और गैरसरकारी तत्वों के बीच की विभाजन रेखा मिट चुकी है। भारत की विदेश नीति को जनवरी 2004 के उस संयुक्त बयान पर लौटना होगा कि वार्ता इस शर्त पर हो सकती है कि पाकिस्तान के भूभाग को भारत के खिलाफ आतंक के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। (लेखक राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं)
नाकामी के नए सबूत
मुंबई में करीब 20 लोगों की जान लेने और सौ से अधिक लोगों को लहूलुहान करने वाले बम विस्फोटों के बाद केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिंदबरम ने देश को यह विचित्र जानकारी दी थी कि इस आतंकी हमले की भनक न लगने के बावजूद खुफिया एजेंसियों से कोई चूक नहीं हुई। हो सकता है कि उनके पास इस सवाल का भी कोई ऐसा ही टेढ़ा जवाब हो कि 48 घंटे बाद भी खुफिया और जांच एजेंसियों के हाथ खाली क्यों हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि इससे न तो उन्हें कुछ हासिल होने वाला है और न ही देश को। मुंबई में फिर से बम धमाके यह बता रहे हैं कि देश की आर्थिक राजधानी आतंकियों के लिए कुछ उसी तरह आसान निशाना बन गई है जैसे एक समय विदेशी आक्रांताओं के लिए सोमनाथ मंदिर बना हुआ था। इस आतंकी हमले ने यह भी साबित किया कि 26-11 के बाद मुंबई में सुरक्षा व्यवस्था चुस्त करने के जो तमाम वादे किए गए थे उनमें से तमाम खोखले निकले। ये वादे किसी और ने नहीं, खुद केंद्रीय गृहमंत्री की ओर किए गए थे। शायद इसी कारण उन्होंने देश को यह समझाने की कोशिश की कि मुंबई जैसे बड़े शहर में आतंकी हमले रोकना कितना कठिन काम है? यह महज दुर्योग नहीं हो सकता कि गृहमंत्री चिदंबरम जैसी भाषा का इस्तेमाल राहुल गांधी ने भी किया। उनके हिसाब से हर आतंकी हमले को रोकना नामुमकिन है। मुंबई और साथ ही देश को दहलाने वाले बम धमाकों के 24 घंटे के अंदर ऐसा बयान न केवल अरुचिकर, बल्कि आपत्तिजनक भी है। मुंबई में विस्फोट के बाद राहुल गांधी का बयान आतंकवाद से लड़ाई की कड़वी सच्चाई को नहीं, बल्कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता की कमजोर इच्छाशक्ति को रेखांकित करता है। शर्मनाक यह है कि पूरी कांग्रेस यह सिद्ध करने में जुट गई है कि राहुल गांधी ने जो कुछ कहा वह इस-इस आधार पर सही है? यह और कुछ नहीं, आम जनता के मनोबल को ध्वस्त करने वाला आचरण है। कांग्रेस को इस पर आपत्ति हो रही है कि मुंबई में हमला होते ही केंद्र सरकार की आलोचना शुरू हो गई है। इस आपत्ति का इसलिए कहीं कोई मूल्य नहीं, क्योंकि केंद्रीय सत्ता आतंकवाद से लड़ने के लिए आवश्यक न्यूनतम राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी प्रदर्शन नहीं कर पा रही है। आतंकवाद से लड़ने के लिए जो कुछ भी किया जाना चाहिए उन सबसे बचा जा रहा है और कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि सिर्फ खोखले बयान देकर कर्तव्य की इतिश्री की जा रही है। यदि ऐसा नहीं है तो फिर क्या कारण है कि पुलिस सुधार लागू करने में भी आनाकानी की जा रही है? इस मामले में कांग्रेस और गैर कांग्रेसी दलों का रवैया एक जैसा है। दरअसल अन्य दलों की तरह कांग्रेस भी यह नहीं चाहती कि पुलिस और साथ ही खुफिया एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल करने की सुविधा समाप्त हो। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने जिस तरह यह कहा कि गृह विभाग सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के पास नहीं जाना चाहिए था उससे यह साफ है कि संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थो के कारण भी आंतरिक सुरक्षा ढुलमुल बनी हुई है। इस बयान का एक अर्थ यह भी है कि राजनीतिक स्वार्थो के फेर में राष्ट्रीय हितों की अनदेखी की जा रही है।
कमजोर लड़ाई का नतीजा
कमजोर नेतृत्व और लचर नीतियों को भारत पर बार-बार आतंकी हमलों का कारण मान रहे हैं ब्रह्मा चेलानी
यह महज संयोग नहीं है कि भारत की व्यावसायिक राजधानी मुंबई पर 1993 से बार-बार आतंकी हमले हो रहे हैं। मुंबई आतंकियों का पसंदीदा निशाना है, क्योंकि आतंकवाद के प्रायोजक भारत के उभरती शक्ति के दर्जे को गिराना चाहते हैं और विदेशी निवेशकों को हतोत्साहित करना चाहते हैं। भारत का आर्थिक उदय पाकिस्तान के पतन के उलट है, जहां आतंकवाद और अराजकता फैली हुई है। मुंबई पर हर हमला भारत की सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंताओं को बढ़ा देता है। इस कारण बहुत से विदेशी पर्यटक या तो भारत की यात्रा का विचार छोड़ देते हैं या फिर स्थगित कर देते हैं। व्यावसायिक राजधानी पर बार-बार हमले कर भारत की ताकत को घटाना एक भूराजनीतिक लक्ष्य है, जिसे राष्ट्र प्रायोजित आतंकवाद ही अंजाम दे सकता है, गली-मोहल्ले के छुटभैये गिरोह या माफिया नहीं। हालिया सुनियोजित बम विस्फोट उन्हीं बाहरी शक्तियों का काम नजर आते हैं, जो 26/11 समेत पहले हुए हमलों में संलिप्त थीं। 26/11 के हमले से इन शक्तियों ने एक सबक जरूर सीख लिया कि कोई ऐसा सबूत न छोड़ा जाए जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि इनमें उनका हाथ है। इसलिए इस बात की खासी संभावना है कि इन हमलों को आपराधिक जगत के कारिंदों के माध्यम से अंजाम दिया गया हो। मुंबई में हुए हालिया हमलों के पीछे एक खास उद्देश्य नजर आता है-पाकिस्तान आधारित सूत्रधारों और षडयंत्रकारियों को सजा दिलाने के लिए भारत, अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय दबाव को हलका करना। वे हमलों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय जगत का ध्यान बांटना चाहते हैं। अब भारत का ध्यान 26/11 हमले से बंटकर हालिया हमले की जांच में लग जाएगा। ऐसे नाजुक समय जब अमेरिका पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ पर दबाव बढ़ा रहा है और इसके लिए उसने पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक सहायता की किश्त भी रोक दी है, आतंकी हमलों के सूत्रधारों का एक और उद्देश्य हो सकता है-बिगड़ते पाक-अमेरिकी संबंधों से ध्यान हटाकर भारत-पाक संबंधों पर केंद्रित करना, किंतु आधिकारिक भारतीय सूत्रों ने, जो पाक नीति को लेकर जनता के आक्रोश से सरकार को बचाना चाहते हैं, इन हमलों का दोष इंडियन मुजाहिदीन गुट और अंडरवर्ल्ड पर थोप दिया है। यह अविश्वसनीय है कि इंडियन मुजाहिदीन या अंडरवर्ल्ड बिना बाहरी निर्देश और मार्गदर्शन के इन विस्फोटों को अंजाम दे सकते हैं। इसकी अधिक आशंका नजर आती है कि आइएसआइ के खुले संगठन लश्करे-तैयबा ने मुंबई में इस घटिया करतूत को अंजाम देने के लिए आतंकी समूहों या फिर अंडरवर्ल्ड को पैसा दिया होगा। 26/11 के हमले को भारत का 9/11 कहा जाता है। इन हमलों को पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के संदर्भ में भारत की सहनशीलता की आखिरी हद बताया गया था। हालांकि, हालिया विस्फोटों से स्मरण होता है कि कोई मूलभूत फर्क नहीं पड़ा है। पीछे हटते-हटते नई दिल्ली अब दीवार से सट गई है। सरकार ने पाकिस्तान से सभी मुद्दों पर सभी स्तरों की वार्ता शुरू करने का फैसला ले लिया-वह भी आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की वचनबद्धता हासिल किए बिना ही। यहां तक कि 26/11 हमलों के जिम्मेदार पाकिस्तान स्थित आतंकियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है और पाकिस्तान में आतंकियों के प्रशिक्षण शिविर अभी भी निर्बाध रूप से जारी हैं। ऐसे में भारत ने राजनीतिक वार्ता शुरू करके पाकिस्तान को आतंकी कार्रवाइयों को अंजाम देने की छूट दे दी है। 26/11 के बाद भारत के पास कूटनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक मोर्चो पर अनेक विकल्प मौजूद थे। निरर्थक बातचीत और युद्ध, इन दो विरोधी छोरों के बीच भारत पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक दबाव बढ़ाने का रास्ता अपना सकता था। इन उपायों में उच्चायुक्त को इस्लामाबाद से वापस बुलाना, संयुक्त आतंक-विरोधी तंत्र के प्रहसन को बंद करना और व्यापार प्रतिबंध लागू करना शामिल था, लेकिन कमजोर भारतीय नेतृत्व ने 26/11 हमले में पाकिस्तान की संलिप्तता पर आक्रोश जताने के लिए छोटे से छोटा कदम उठाना भी उचित नहीं समझा। इस परिप्रेक्ष्य में अमेरिकी उपमंत्री रॉबर्ट ब्लैक ने पाकिस्तान से वार्ता शुरू करने के लिए अपनी तमाम शर्तो को छोड़ देने पर भारत का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि जो भी मुंबई हमले के लिए जिम्मेदार हैं उन्हें दंड मिलना चाहिए और फिर पाकिस्तान को सीमापार घुसपैठ रोकने के लिए ऐसे उपाय करने चाहिए जो नजर आएं। जहां 26/11 की पटकथा लिखने में पाकिस्तानी सरकारी एजेंसियों की संलिप्तता स्पष्ट है, वहीं इस मुद्दे पर पाकिस्तान को कठघरे में न खड़ा करने के लिए भारतीय नीति-निर्माताओं के दोष पर अधिक ध्यान नहीं गया है। असल में इस सिलसिले में भारत ने बड़ा अजीबोगरीब उपाय खोज निकाला-दस्तावेजी बमबारी। नियमित अंतराल पर पाकिस्तान को साक्ष्यों के भारी-भरकम पुलिंदे भेजे जाते रहे। नतीजा यह रहा कि पाकिस्तान का कुछ नहीं बिगड़ा और भारत को नीचा देखना पड़ा। चिर-परिचित निरर्थक प्रलाप फिर से दोहराया जा रहा है-बम विस्फोटों की भर्त्सना की औपचारिकता और आतंक को परास्त करने का संकल्प। बम विस्फोटों का खतरनाक राजनीतिक संदेश भी गया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कद बढ़ने के बावजूद भारत में आतंकी हमले रोकने की शक्ति नहीं है। इन धमाकों से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साख पर और बट्टा लगा है। मनमोहन सिंह एक कमजोर प्रधानमंत्री हैं। निर्णय लेने की उनकी अक्षमता के कारण भारत आतंकवाद के खिलाफ कोई दृढ़ और कारगर नीति नहीं अपना सका है। सरकार की मूलभूत गलती की सजा पूरा देश भुगत रहा है-पाकिस्तान नीति और आतंकरोधी रणनीति को अलग करना। ये दोनों अविभाजित नहीं हैं। सरकारी तंत्र आतंकवाद को कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानता है, जिसका समाधान पुलिस बल में वृद्धि और दक्षता से हो सकता है। दरअसल, आतंकवाद को कानून-व्यवस्था की समस्या मान कर हम आतंकियों के हाथों में खेलते हैं। इससे हमारी ताकत घटती है। अगर आतंकी नेटवर्क और आतंकवाद के पनाहगारों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी तो कितनी भी पुलिस लगा लें, आतंकवाद पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। यह कटु सच्चाई है कि अंतरदेशीय आतंकवाद भारत को आसान निशाने के रूप में इसलिए देखता है, क्योंकि हम आतंकियों और उनके प्रायोजकों से कोई कीमत वसूल नहीं करते हैं। (लेखक रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं)
प्रधानमंत्री का पद और राहुल
देश को एक गैर-जरूरी बहस में व्यस्त किया जा रहा है कि राहुल गांधी अब प्रधानमंत्री का पद संभालने के योग्य हो गए हैं। यह कांग्रेस पार्टी का एक अंदरूनी मामला है कि वह सरकार चलाने के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदारी सौंपने का फैसला कब करती है। ईमानदारी से कहा जाए तो निर्णय पार्टी को भी कम और राहुल गांधी को ही ज्यादा करना है। वर्ष 2004 के चुनावों के बाद जब कांग्रेस ने सरकार बनाने की हैसियत प्राप्त कर ली तो पार्टी के ज्यादातर नेताओं ने श्रीमती सोनिया गांधी के ही प्रधानमंत्री बनने की घोषणा कर दी थी। पर कांग्रेस अध्यक्ष ने जिंदाबादियों की एक बड़ी जमात को निराश करते हुए प्रधानमंत्री की कुर्सी पर डॉ. मनमोहन सिंह की ताजपोशी कर देश और दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया। कहना होगा कि डॉ. सिंह ने भी न सिर्फ श्रीमती गांधी द्वारा अपने प्रति व्यक्त किए गए सम्मान का अनादर नहीं होने दिया, बल्कि अपनी छवि की मदद से वर्ष 2009 में पार्टी को फिर से सत्ता में लौटने में योगदान भी दिया। शायद इसीलिए उन्हें उनके पद से हटा देने की बार-बार की चर्चाओं के बीच डॉ सिंह को अपनी धीमी पर विश्वास भरी आवाज में जताते रहना पड़ता है कि वे अभी अपने पद पर बने रहना चाहते हैं और उन्हें बहुत से काम पूरे करना हैं। वैसे भी एक लोकतांत्रिक देश में सर्वमान्य प्रक्रिया के जरिए प्रधानमंत्री पद के लिए होने वाले चयन की इससे बड़ी अवमानना नहीं हो सकती कि एक सामंती तरीके से प्रजा को सूचित किया जाए कि कौन व्यक्ति अब राज-काज संभालने के योग्य हो गया है। इसमें तो डॉ. मनमोहन सिंह को भी शक नहीं है कि यूपीए-2 के वर्तमान कार्यकाल में राहुल गांधी जिस दिन चाहेंगे, प्रधानमंत्री बन सकते हैं। और वे बिना किसी विलंब या ना-नुकुर के राहुल गांधी के लिए अपनी कुर्सी खाली भी कर देंगे। दूसरी ओर, देश की जनता भी इतनी सीधी और ईमानदार रहती आई है कि वह प्रधानमंत्रियों की नियुक्तियों के प्रति कोई पूर्वाग्रह और दुराग्रह नहीं रखती। वह हरेक प्रधानमंत्री को आंखें बंद करके स्वीकार भी कर लेती है और चुपचाप आंखें खोलकर पद से हटाने के कारण भी ढूंढ़ लेती है। वर्ष 1977 में जनता ने श्रीमती इंदिरा गांधी को उनके पद से हटा दिया और वर्ष 1980 में दो-तिहाई से अधिक बहुमत प्रदान कर वह उन्हें वापस सत्ता में भी ले आई। साथ ही यह भी कि भारत की राजनीति अब उस दौर से लगभग मुक्त हो चुकी है, जिसमें किसी एक राष्ट्रीय व्यक्तित्व को धुरी बनाकर मतदाताओं से वोटों की मांग की जा सके। इंदिराजी के निधन और अटलजी की अस्वस्थता के बाद राष्ट्रीय स्तर के व्यक्तित्वों का देश में जो सन्नाटा पैदा हुआ है, उसने प्रधानमंत्री पद के लिए आवश्यक योग्यताओं के स्केल को ही बदलकर रख दिया है। पर यह भी एक सच्चाई है कि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के पद पर बैठाने का जितना ज्यादा ढिंढोरा सार्वजनिक रूप से पीटेंगे, युवा नेता को वे उतना ही जनता से दूर करने का जोखिम पार्टी के कंधों पर डालेंगे। कहना होगा कि राहुल गांधी के पक्ष में गैर-जरूरी प्रचार की ऐसी हरेक कोशिश के बाद डॉ. मनमोहन सिंह के प्रति जनता की सहानुभूति और ज्यादा बढ़ जाती है। और फिर कांग्रेस प्रवक्ताओं को टीवी चैनलों पर सफाई देने के लिए मजबूर होना पड़ता है कि डॉ. सिंह अच्छा कार्य कर रहे हैं और वे अपना वर्तमान कार्यकाल अवश्य पूरा करेंगे। श्री दिग्विजय सिंह द्वारा प्रारंभ की गई बहस के बाद कांग्रेस प्रवक्ता श्रीमती जयंती नटराजन द्वारा दी गई सफाई इसका ताजा उदाहरण है। इसमें कोई ज्यादा मतभेद नहीं है कि यूपीए-1 के मुकाबले यूपीए-2 का कार्यकाल कांग्रेस पार्टी के लिए अभी तक तो कोई खास उपलब्धियों वाला नहीं रहा है। पिछले दो सालों में पार्टी का ग्राफ नीचे ही गिरा है। 2004 में चुनाव जीतने के बाद अपार लोकप्रियता के रथ पर सवार श्रीमती गांधी को जिस तरह से प्रधानमंत्री की कुर्सी उपलब्ध थी, वैसी लोकप्रियता की सुविधा 2011 में राहुल गांधी को उपलब्ध नहीं है। आज की स्थिति में यह भी निश्चित नहीं है कि 2014 तक कांग्रेस के लिए हालात क्या बनेंगे। यूपीए-1 के सहयोगी वापमंथी इस समय परिदृश्य से बाहर हैं और यूपीए-२ की दोस्त द्रमुक का राजनीतिक भविष्य भी संकट में है। ऐसे में यूपीए-3 के लिए गठबंधन के साथी कौन होंगे और उनके चेहरे कैसे होंगे, विश्वासपूर्वक कुछ भी कहा नहीं जा सकता। देश की नई राजनीति में नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, जयललिता और मायावती के रूप में एक आक्रामक गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपाई नेतृत्व उभरकर सामने आ चुका है। यही नेतृत्व भी आने वाली संसद का भविष्य और बनने वाली सरकारों के लिए गठबंधन तय करेगा। अत: कांग्रेस की इस चिंता पर गौर किया जा सकता है कि उसके पास दो वर्षो से कुछ ज्यादा का ही वक्त कुछ कर दिखाने का बचा है और पार्टी को तत्काल किसी चमत्कारिक नेतृत्व की जरूरत है। शायद इसीलिए शोर भी मचाया जा रहा है कि पार्टी को फिर से सत्ता में लाने का नेतृत्व राहुल ही दे सकते हैं। पर राहुल या तो सरकार की बागडोर अभी से संभालकर 2014 में पार्टी को जीत हासिल कराने की चुनौती स्वीकार कर सकते हैं या फिर अगले लोकसभा चुनावों के परिणाम आने तक अपनी वर्तमान भूमिका में ही प्रतीक्षा करने का धर्य दिखा सकते हैं। दोनों ही विकल्पों के फायदे और नुकसान भी गिनाए जा सकते हैं। पर एक तीसरा विकल्प भी खुला हुआ है और वह यह कि वे मनमोहन सिंह के नेतृत्व में ही मंत्रिमंडल में शामिल होकर सरकार चलाने का अभ्यास प्रारंभ कर दें और समय आने पर प्रधानमंत्री पद भी संभाल लें। ऐसी स्थिति में वे मंत्रिमंडल के प्रस्तावित फेरबदल को भी अपनी पसंद के मुताबिक करवा सकते हैं। पर तब तक के लिए कांग्रेस को अपने अंदरूनी घमासान से निपटने के साथ ही राहुल गांधी की प्रशस्ति के मार्फत डॉ. मनमोहन सिंह को कमजोर दिखाने की कोशिशों को भी काबू में रखना होगा। पर शक है कोई भी कांग्रेस प्रवक्ता इस संबंध में पक्का आश्वासन देना चाहेगा।
