Tuesday, December 7, 2010

दोहरे आचरण का पुख्ता प्रमाण

विकिलीक्स पर जारी अमेरिका की अति गोपनीय सूचनाओं ने कूटनीतिक और राजनयिक दुनिया में संशय और दुविधा की स्थिति पैदा कर दी है। आज पूरी दुनिया अमेरिकी राजनयिकों के विचारों, सुझावों और उनकी नीतियों को विकिलीक्स की वेबसाइट पर देख और पढ़ रही है। गोपनीय रिपोर्ट के खुलासे के पहले ही दिन अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता पीजे क्राउलिंग ने बयान दिया कि राजनयिकों द्वारा जुटाई गई सूचनाएं हमारी नीतियों और कार्यक्रमों को अमलीजामा पहनाने में मददगार होती हैं और वास्तव में हमारे राजनयिक डिप्लोमैट हैं, न कि दूसरे देशों में खुफिया सूचनाएं इकट्ठा करने वाले जासूस। इससे अमेरिका की बेचैनी साफ समझी जा सकती है कि उसे इन रिपोर्टो के खुलासे से किस तरह की चिंता रही है। विकिलीक्स द्वारा करीब ढाई लाख सूचनाओं को सार्वजनिक किया गया है, इनमें तीन हजार से ज्यादा सूचनाएं दिल्ली से भेजी गई अमेरिकी राजनयिकों की हैं। इन रिपोर्टो में एक-एक करके बातें सामने आ रही हैं जिनमें अमेरिका की भारत और पाकिस्तान के प्रति और शेष दुनिया के प्रति वास्तविक नजरिए का भी पता चलता है। अब यह साफ है कि अमेरिका पाकिस्तान को खुश करने के लिए अफगानिस्तान में चल रही आतंकवाद की लड़ाई से भारत को अलग रखता रहा है। 26/11 की घटना के बाद अमेरिका की दोहरी नीति का भी खुलासा इस रिपोर्ट में किया गया है, जिससे पता चलता है कि अमेरिका आईएसआई और पाकिस्तान की चाहे जितनी आलोचना करता रहा है, लेकिन उसने मुंबई हमलों के बाद इन पर लगाम लगाने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया। आम लोगों के लिए भले ही यह रिपोर्ट चौंकाने वाली है, लेकिन कूटनीतिक और राजनयिक गलियारों में यह सब जानकारी पहले से ही है। इसी तरह यदि कुछ लोग लोग यह सोचते हैं कि गोपनीय सूचनाओं के उजागर होने के बाद अमेरिका और दुनिया के कई देशों के रिश्ते आपस में खराब हो जाएंगे अथवा खलबली मच जाएगी तो ऐसा भी कुछ नहीं होने जा रहा, क्योंकि यह सब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और राजनीति में होता ही रहता है। विकिलीक्स से जो नई बात सामने आई है वह यह कि अमेरिका की नीतियों और दूसरे देशों के बारे में उसकी सोच का पहली बार सार्वजनिक तौर पर खुलासा हो गया। यह आश्चर्यजनक है कि अमेरिका की मजबूत खुफिया एजेंसियां इन सूचनाओं को गोपनीय बनाए रख पाने में विफल रहीं। जहां तक विश्व के विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बारे में अमेरिकी राजनयिकों की अशिष्ट टिप्पणी का प्रश्न है तो यह उस मानसिकता का एक प्रमाण है जो अमेरिका की दुनिया पर थानेदारी और अपनी श्रेष्ठता की भावना की पुष्टि करता है। रिपोर्ट में रूस के पूर्व राष्ट्रपति और वर्तमान प्रधानमंत्री को अल्फा डॉग कहा गया है तो ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद को हिटलर कहकर संबोधित किया गया है। इसी तरह फ्रांस, इटली, अफगानिस्तान के राष्ट्राध्यक्षों के बारे में भी अशिष्ट टिप्पणियां की गई हैं। वास्तव में यह राजनयिक शिष्टाचारों का हनन है, जिसकी एक राजनयिक से अपेक्षा तो की ही जा सकती है। यह दूसरे राष्ट्र की संप्रभुता और उसकी गरिमा का अपमान है। विकिलीक्स की मानें तो भारत ने 2004 में वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में पाकिस्तान के प्रति कोल्ड स्टार्ट की नीति बनाई थी। इसके तहत भारत में मंुबई जैसे किसी आतंकवादी हमले की स्थिति में 72 घंटे के भीतर तत्काल कार्रवाई करते हुए भारतीय सेना पाकिस्तान के खिलाफ एक सीमित युद्ध छेड़ देती। हालांकि इस तरह की नीति से थल सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने इनकार किया है, लेकिन सच्चाई यही है कि भारत अब पाकिस्तान से उकता गया है और जरूरत पड़ने पर इस तरह का कोई भी कदम उठा सकता है। दूसरा विवादास्पद खुलासा पाकिस्तान में अमेरिकी राजनयिक एनी पैटरसन का है कि यदि मुंबई हमले के बाद भारत पाकिस्तान पर हमला करता तो शुरुआती जीत के बावजूद अंतत: भारतीय सेना कमजोर पड़ती और यह युद्ध परमाणु युद्ध के रूप में तब्दील हो सकता था। इसी तरह पाकिस्तान में आतंकवादियों के हाथों डर्टी बम के आने का मामला भी है। खुलासों में अमेरिका की इस विरोधाभासी नीति का भी पता चलता है कि पाकिस्तान अमेरिका से मदद लेने के बावजूद उसे अभी तक मूर्ख ही बनाता रहा है। इसी तरह यूरोप में अमेरिका द्वारा 200 परमाणु बमों का जखीरा बनाने का मामला भी प्रकाश में आया है, प्रत्युत्तर में रूस के प्रधानमंत्री पुतिन ने कहा कि रूस भी परमाणु हथियार तैनात कर सकता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि विकिलीक्स रिपोर्ट ने अमेरिका की दोमुंही नीतियों के संदेह को एक पुख्ता आधार दे दिया है। अब हमें अपनी विदेश और रक्षा नीति में और अधिक व्यवहारिकता अपनाने की आवश्यकता है। हमें अमेरिका पर अधिक निर्भर होने की नीति पर भी विचार करने की जरूरत है, क्योंकि वह अपने राष्ट्रहितों और लाभ के अनुकूल ही दूसरे देशों से रिश्ता कायम करता है। (लेखक विदेशी मामलों के विशेषज्ञ हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

द्रमुक के दबाव का दुष्परिणाम

प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भ्रष्टाचार के अनेक मसलों से संप्रग सरकार की मुश्किलें और अधिक बढ़ती देख रहे हैं अरुण नेहरू
देश में इस समय राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला ऑक्टोपस की तरह है, जिसकी दर्जनों भुजाएं हैं जो चारों दिशाओं में चल रही हैं। जैसे ही एक भुजा परेशानी खड़ी करती है और उसे काबू में किया जाता है, दूसरी सक्रिय हो कर संप्रग सरकार को मुसीबत में डाल देती है। जैसे-जैसे यह मुद्दा जनता के बीच चर्चा का विषय बनता जा रहा है, कांग्रेस की दिक्कतें बढ़ती जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशन में सीबीआइ जांच की कांग्रेस की पेशकश को विपक्ष ने नकार दिया है और वह संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) जांच पर अड़ा है। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है। 2-जी के प्रमुख मुद्दे के अलावा सीवीसी और नीरा राडिया टेप प्रकरण और इस पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने भी कांग्रेस को संकट में डाल रखा है। यह बहुत गंभीर मसला है। टेप के मामले में राहत की बात बस इतनी ही है कि नीरा राडिया की ए राजा और द्रमुक के अन्य नेताओं के अलावा मंत्रिमंडल के किसी सदस्य से बातचीत नहीं हुई है। बातचीत में शामिल लोगों की साख पर बट्टा लगना ही है और मीडिया के एक वर्ग के लॉबिंग के प्रयास का भी नकारात्मक संदेश गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से टेप तलब किया है। मेरे विचार से इस मामले में अटकलें लगाने के बजाय हमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार करना चाहिए। जैसे-जैसे स्पेक्ट्रम मामले में सीबीआइ जांच आगे बढ़ेगी, सीवीसी विवाद और गहराता जाएगा। दबाव में कार्रवाई से कांग्रेस को फायदा नहीं होगा। दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने समझदारी भरा बयान जारी किया है। मेरे विचार से सुधारवादी कदम उठाने से विपक्ष भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशन में सीबीआइ जांच के लिए तैयार हो सकता है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भ्रष्टाचार की जांच से जुड़े बहुत से मसले खुले हुए हैं। इनमें राष्ट्रमंडल खेल, आदर्श सोसायटी और 2-जी स्पेक्ट्रम शामिल हैं। इसके अलावा आईपीएल और पर्यावरण हितों की अनदेखी के मामले भी नए-नए पेच खड़े कर रहे हैं। राजनीतिक स्तर पर भारी उथल-पुथल चल रही है और निहित स्वार्थ खुलकर खेल रहे हैं। व्यवस्था में सफाई के प्रयासों में बाधा पहुंचाने के लिए वित्तीय दबाव समूह पुरजोर कोशिश करेगा। अगर ए राजा के खिलाफ कार्रवाई की जाती है तो द्रमुक जबानी मिसाइलें छोड़नी शुरू कर देगी। साथ ही इस मसले में कड़ी कार्रवाई से बचने के लिए दलित कार्ड भी खेला जा रहा है, पर इस मुद्दे पर अब सरकार और झुकने को तैयार नहीं है। ऐसे में क्या द्रमुक सरकार को अस्थिर करने की स्थिति में है? मेरे ख्याल से द्रमुक ऐसे कदम नहीं उठाएगी, क्योंकि तमिलनाडु में यह सत्ता विरोधी रुझान का सामना कर रही है। साथ ही द्रमुक में भीषण परिवार युद्ध भी छिड़ा हुआ है। अन्नाद्रमुक के रूप में वहां समर्थ विपक्ष मौजूद है और पीएमके तथा अन्य छोटे दल किसी भी दिशा में लुढ़क सकते हैं। कांग्रेस के पास भी विकल्पों की कोई कमी नहीं है। एनसीपी प्रमुख शरद पवार से जुड़ा लवासा का मुद्दा भी सामने आया है, किंतु इसके तार आईपीएल से जुड़े होने के कारण यह मुद्दा और भड़केगा। टेलीकॉम घोटाले और लाइसेंसिंग प्रक्रिया से संबंधित बहुत से मुद्दे, विशेष रूप से स्वान टेलीकॉम ध्यान खींच रहे हैं। सीबीआइ, ईडी और आइटी के अलावा अन्य किसी के पास तथ्य नहीं हैं। इस संबंध में अटकलबाजियां लगाना उचित नहीं होगा, किंतु शरद पवार का यह बयान तो सही है ही कि औद्योगिक हितों को अनुचित तरीके से निशाना नहीं बनाना चाहिए, किंतु जहां तक 2-जी स्पेक्ट्रम का सवाल है इससे उद्योग जगत और राष्ट्रीय संपदा की कीमत पर बहुत छोटे समूह ने लाभ उठाया है। क्योंकि अब लाइसेंस राज अतीत की बात हो चुका है, इसलिए उद्योग जगत इनके खिलाफ उठाए जाने वाले कदमों का स्वागत ही करेगा। लवासा मामले का फैसला तो अदालत में ही संभव है, किंतु आदर्श सोसायटी में पर्यावरण और सुरक्षा की अनेक चिंताओं की अनदेखी के बावजूद परियोजना को अनुमति क्यों दी गई? निर्माता द्वारा भारी धनराशि खपा देने के बाद मामला काफी जटिल हो गया है। राष्ट्रमंडल खेलों में कोई राजनीतिक समूह शामिल नहीं है। जैसे ही सीबीआइ, ईडी और आइटी विभाग की जांच पड़ताल शुरू हुई, कांग्रेस बड़ी खूबसूरती से इससे अलग हो गई। सुरेश कलमाड़ी के सभी महत्वपूर्ण सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। उनसे पूछताछ जारी है, किंतु हर सूरत में संदेह की उंगली तो आयोजन समिति के अध्यक्ष की तरफ ही उठ रही है। शहरी विकास मंत्री, दिल्ली की मुख्यमंत्री और लेफ्टिनेंट गवर्नर तथा खेल मंत्री पर दोषारोपण उनकी साख पर नकारात्मक असर डालेगा। वैसे किसी भी वित्तीय मामले में उनकी संलिप्तता का दूर-दूर तक कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। हमारे पास निर्दोष व्यवस्था, निर्दोष सरकार और निर्दोष समाज नहीं है, जहां कानून का शासन चलता है। अगर व्यवस्था में परिवर्तन के बजाय वर्तमान मन:स्थिति के आधार पर फैसला आता है तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। (लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

राष्ट्रीय बेचैनी का विषय

जेपीसी के मुद्दे पर संसद में जारी गतिरोध में एक सकारात्मक संदेश देख रहे हैं हृदयनारायण दीक्षित

संसदीय गतिरोध से राजनीति निर्वस्त्र हो रही है। भ्रष्टाचार राष्टीय बहस के केंद्र में है। राष्ट्रमंडल खेल आयोजन का भारी भ्रष्टाचार छुपाया नहीं जा सका। दूरसंचार घोटाला देश के कोने-कोने में चर्चा का विषय है। अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के साथ भ्रष्टाचार में भी उदारीकरण चलाना संप्रग को महंगा पड़ा है। संप्रग कंपनी के प्रबंधक हलकान हैं। सर्वोच्च न्यायपीठ ने मुख्य सतर्कता आयुक्त को इंगित किया है। दूरसंचार घोटाले की परतें खुल रही हैं। केंद्र सरकार दबाव में है। केंद्र सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में सीबीआइ जांच को तैयार है उसने आरोपी मंत्री ए। राजा से पल्ला झाड़ लिया है, लेकिन विपक्ष हमलावर है। विपक्ष संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से ही जांच की मांग कर रहा है। केंद्र ने इस मांग को खारिज कर दिया है। संसदीय कार्यवाही दो सप्ताह से ठप है। विपक्ष पर संसद न चलने देने के आरोप हैं। तर्क यह भी है कि नियंत्रक महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट अपने आप संसद की लोकलेखा समिति में जाएगी। समिति अनियमितताओं की जांच करेगी। तब अलग से जेपीसी की मांग का औचित्य क्या है? आम लोग लोकलेखा समिति और जेपीसी के फर्क नहीं जानते। सत्तापक्ष विपक्ष पर संसद न चलने देने का आरोप लगाकर भ्रष्टाचार के मुख्य मुद्दे को पीछे करना चाहता है, बावजूद इसके भ्रष्टाचार राष्ट्रीय बेचैनी है। जेपीसी और लोकलेखा समिति बेशक संसदीय समितियां हैं लेकिन लोक लेखा समिति संयुक्त संसदीय समिति नहीं होती। लोकसभा अध्यक्ष मावलंकर ने 10 मई 1954 के दिन लोकसभा में ही यह व्यवस्था दी थी कि यह संयुक्त समिति नहीं है। यह लोकसभा की समिति है। इसमें भी दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। लोकलेखा समिति के गठन का लक्ष्य सार्वजनिक धन के सदुपयोग को जांचना है। लोकसभा विभिन्न मदों के लिए बजट पारित करती है। नियंत्रक महालेखा परीक्षक इस खर्च के सदुपयोग को जांचकर एक रिपोर्ट बनाते हैं। लोकसभा इस भारी रिपोर्ट की विवेचना स्वयं नहीं करती, वह यह कार्य लोकलेखा समिति से कराती है। बेशक इस समिति को भी साक्ष्य लेने, कोई भी दस्तावेज मंगाने और संबंधित प्राधिकारी को बुलाकर तथ्य जांचने के अधिकार हैं, लेकिन यह समिति नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा तैयार रिपोर्ट का ही विवेचन करती है। वह कैग द्वारा खोजी गई वित्तीय अनुशासनहीनता को व्यापक फलक पर दस्तावेजी व मौखिक साक्ष्य लेकर जांचती है। तर्क हैं कि संप्रति इस समिति के सभापति मुरली मनोहर जोशी भाजपा नेता हैं तो भी जेपीसी की ही मांग क्यों की जा रही है? बेशक यह समिति दूरसंचार मामले से जुड़ी कैग रिपोर्ट का परीक्षण करेगी, लेकिन विपक्ष की मांग समग्र जांच की है। दूरसंचार घोटाला वित्तीय अनुशासनहीनता अथवा राजकोष अपव्यय का साधारण मसला नहीं है। यह मसला भ्रष्टाचार का है, मंत्री पद के दुरुपयोग का है, कतिपय संस्थाओं/व्यक्तियों को सीधे लाभ पहुंचाने और उनसे लाभ कमाने का है। इससे जुड़े भ्रष्टाचार का नेटवर्क बहुत बड़ा है। इसके खिलाडि़यों की संख्या, पहुंच और पकड़ का व्यापक दायरा है। जेपीसी की जांच का जाल दूर तक फैलाकर ही बड़े घोटाले के पीछे काम करने वाले बड़ों तक पहुंचने की राह आसान होगी। सरकार जेपीसी की जांच का सामना नहीं कर सकती। सीबीआइ जांच का दायरा भी बड़ा होता है, लेकिन सीबीआइ अपनी जांच प्रक्रिया में जांच दायरा तय करने व पूछताछ के लिए व्यक्तियों के चयन में चतुराई बरतती है। वह केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाली एजेंसी है। अपने बिगबास के संकेत पर काम करना उसकी विवशता है। सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी का अर्थ बहुत सीमित है। वह न्यायालय को जांच रिपोर्ट देती रह सकती है, न्यायालय समय-समय पर उचित मार्गदर्शन दे सकता है, पर सीबीआइ से व्यापक जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती। ईमानदार जांच से नहीं डरते। प्रधानमंत्री सहित पूरी सत्ता ए. राजा को निर्दोष बताती रही है। प्रधानमंत्री ने पहले यों ही उनका पक्ष नहीं लिया होगा। अबकी बात दीगर है। अब मामला ज्यादा उछल गया है। पल्ला झाड़ने की बात ताजा रणनीति हो सकती है। आखिरकार सरकार जेपीसी की जांच से क्यों डरी हुई है? सरकार स्वयं अपनी ओर से जेपीसी के गठन का प्रस्ताव क्यों नहीं लाती? जाहिर है कि सरकार के सामने इस खेल के बड़े खिलाडि़यों के पर्दाफाश हो जाने का खतरा है। इसीलिए संसदीय गतिरोध दूर करने के लिए लोकसभाध्यक्ष द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भी सरकार का रुख अडि़यल ही रहा। सत्तापक्ष ने जेपीसी गठन के विरोध में अनेक हास्यास्पद तर्क दिए और जेपीसी को बेकार की कसरत बताया गया। कांग्रेस संसदीय प्रणाली से प्रेरित नहीं होती। संसदीय गतिरोध का कारण सत्तापक्ष का अडि़यल रुख है। संसदीय संस्थाएं लोकतंत्र की रक्तवाही नलिकाएं होती हैं। सत्ता-विपक्ष को उनका सम्मान करना चाहिए। सत्तापक्ष के पास बहुमत है तो विपक्ष के पास सरकारी कामकाज की निगरानी करने का जनादेश। विपक्ष सच्चा चौकीदार है, सत्तापक्ष उससे आत्मसमर्पण क्यों चाहता है? बोफोर्स मसले पर 45 दिन के संसदीय गतिरोध के बाद 1987 में जेपीसी बनी थी। हर्षद मेहता मसले में संसद में 17 दिन बवाल हुआ, 1992 में गठित जेपीसी का कार्य उत्साहव‌र्द्धक था। समिति ने तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह को भी साक्ष्य के लिए बुलाकर एक नई परंपरा की शुरुआत की थी। 2001 में बनी जेपीसी ने 105 बैठकें की थीं। कोल्ड्र डिंक्स में रसायनों के सवाल पर 2003 में गठित जेपीसी ने उपयोगी संस्तुतियां की थीं। न्यायालय जेपीसी का विकल्प नहीं हो सकते। संसदीय गतिरोध शुभ नहीं होता, लेकिन इसका सारा अपयश विपक्ष के खाते ही डालना अनुचित है। संसद चलाना दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है। विपक्ष ने परमाणु करार और उससे जुड़े तमाम कार्यो पर रचनात्मक भूमिका निभाई है। प्रश्नकाल विपक्ष का हथियार होता है। विपक्ष ने प्रश्नकाल जैसे महत्वपूर्ण अवसर का त्याग किया है। सत्तापक्ष ने इस मामले में बहुमत की बेजा ताकत दिखाई है। देश संसदीय बहसों पर टकटकी लगाता है। देश संसद का संदेश सुनता है। संसद की ताकत अपरिमित है। इस दफा बिना बहस ही उसने देश को एक उत्साहजनक संदेश दिया है कि यहां निरर्थक शोरगुल करने या मौन रहने वाले माननीय ही नहीं बैठते। यह प्राणवान संस्था है। ताजा संसदीय गतिरोध ने सारे राष्ट्र का ध्यान भ्रष्टाचार के मूल मुद्दे पर खींचने में भारी सफलता पाई है कि भ्रष्टाचारियों पर शिकंजा अपरिहार्य है। सत्तापक्ष कब तक बचेगा? (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

कठघरे में प्रधानमंत्री

2-जी स्प्केक्त्रम आवंटन घोटाले में ए राजा और संचार मंत्रालय के साथ-साथ प्रधानमंत्री की निष्कि्रयता को भी कठघरे में खड़ा कर रहे हैं ए सूर्यप्रकाश
कठघरे में प्रधानमंत्री जबसे 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है, कांग्रेस प्रधानमंत्री को आलोचना से बचाने का पुरजोर प्रयास कर रही है। संयुक्त संसदीय समिति की जांच का कड़ा विरोध करने के अलावा कांग्रेस के प्रवक्ता दिन-रात इस तथ्य से ध्यान हटाने पर काम कर रहे हैं कि जब देश में जनता के पैसे की सबसे बड़ी लूट चल रही थी, तब प्रधानमंत्री आंखें मूंदें बैठे थे। साथ ही वे लोगों को यह भी स्मरण कराना चाहते हैं कि मनमोहन सिंह एक सम्मानित व्यक्ति हैं। साक्ष्यों के अभाव में यह स्वीकार करना होगा कि फिलहाल मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत साख पर कोई कलंक नहीं लगा है। किंतु यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। कैग की रिपोर्ट लाइसेंसिंग प्रक्रिया का गहन और समग्र परीक्षण करती है। रिपोर्ट में सरकार को पूरी तरह निष्कि्रय बताया गया है। यद्यपि रिपोर्ट में सीधे-सीधे प्रधानमंत्री पर उंगली नहीं उठाई गई है, फिर भी इसमें दर्ज घटनाक्रम से यह सवाल जरूर उठता है कि क्या मनमोहन सिंह ने 2007 में सरकारी जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया था। यह सच है कि रिपोर्ट में तत्कालीन संचार मंत्री ए राजा और संचार विभाग (डॉट) को दोषी ठहराया गया है, किंतु कहानी यहीं खत्म नहीं होती। कैग का निष्कर्ष है कि डॉट ने अक्टूबर, 2003 में मंत्रिमंडल द्वारा जारी लाइसेंसिंग नियमों का पालन नहीं किया, न ही उसने टेलीकॉम आयोग से सलाह ली। यही नहीं, उसने वित्त मंत्रालय के निर्देशों का उल्लंघन किया, प्रधानमंत्री की राय की अनदेखी की, कानून और वित्त मंत्रालय की सलाह की अवहेलना की कि लाइसेंसिंग प्रक्रिया मंत्रियों के समूह के हवाले कर देनी चाहिए, मनमर्जी से अंतिम तिथि में परिवर्तन किया और अयोग्य दावेदारों को थोक के भाव लाइसेंस जारी कर दिए गए। ऐसा कोई और उदाहरण देखने को नहीं मिलता जब किसी मंत्री ने इतने बड़े पैमाने पर सरकारी कायदे-कानून ताक पर रख दिए हों। जब यह सब हो रहा था तो मनमोहन सिंह जी आप कहां थे? कैग ने यह भी सवाल उठाया है कि वित्त मंत्री ने अपनी राय को लागू क्यों नहीं किया कि स्पेक्ट्रम का आवंटन और मूल्य निर्धारण के लिए मंत्रिमंडल की अनुमति लेनी जरूरी है। इस मंत्रालय ने सुनिश्चित किया कि यह फाइलों में बहुत ईमानदारी और कुशलता से काम करता है। कैग के अनुसार लंबे अरसे बाद इस साल के शुरू में बार-बार स्मरण भेजने के बाद भी डॉट ने अंतर-मंत्रालय चर्चाओं में हिस्सा नहीं लिया। डॉट के रवैये से इसके फैसलों की वैधता पर संदेह उभरता है। यद्यपि कैग ने प्रधानमंत्री को दोषी नहीं ठहराया फिर भी उनका आचरण संदिग्ध है। रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री, कानून मंत्रालय, वित्त सचिव, डॉट के सचिव और विभाग में वित्त सदस्य कीमतें बढ़ाए बिना जल्दबाजी में 2-जी स्पेक्ट्रम का आवंटन करना नहीं चाहते थे। दूसरे शब्दों में, मंत्रिमंडल में राजा द्वारा घटी दरों पर मूल्यवान राष्ट्रीय संपत्ति को बेचने के खिलाफ काफी असंतोष था। हैरानी की बात यह है कि नवंबर, 2007 में प्रधानमंत्री ने खुद भी राजा को पत्र लिखकर आपत्तियां दर्ज कीं। जब जून से नवंबर 2007 के बीच कानून और वित्त मंत्रालयों ने महसूस किया कि मामला मंत्रियों के समूह के हवाले किया जाना चाहिए, तो प्रधानमंत्री ने इस सलाह की अवहेलना कैसे की? उनकी निष्कि्रयता जायज नहीं है, क्योंकि सरकार के निर्णय लेने की प्रक्रिया नियमों से बंधी होती है। इन नियमों को गवर्नमेंट ऑफ इंडिया (ट्रांसेक्शन ऑफ बिजनेस) रूल्स, 1961 कहा जाता है। इन्हीं के तहत मंत्रालय की शक्तियां निर्धारित होती हैं। कैग ने इन प्रावधानों को इंगित करते हुए कहा कि जब किसी मामले के वित्तीय संदर्भ होते हैं और उस पर वित्त मंत्रालय की मुहर लगनी जरूरी होती है तथा यदि किसी मामले को लेकर दो या उससे अधिक मंत्रालयों में मतभेद हों तो उसे मंत्रियों के समूह को सौंप देना चाहिए। फिर ऐसा क्यों नहीं हुआ? हालांकि जब हम इस प्रकार के सवालों के जवाब तलाशते हैं तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस के प्रवक्ता, मनीष तिवारी और जयंती नटराजन मनमोहन सिंह को एक सम्मानित व्यक्ति बताते फिरते हैं। घटनाओं के क्रम से यह साफ हो जाता है कि मनमोहन सिंह में अपनी निर्देशों पर अमल के लिए संचार मंत्री को बाध्य करने की शक्ति नहीं थी। यह कटु लग सकता है, किंतु मनमोहन सिंह की निष्कि्रयता को कर्तव्यविमुखता ही कहा जा सकता है। किसी भी नौकरशाह की पहली सहज प्रवृत्ति न्यूनतम जोखिम उठाते हुए फाइल पर टिप्पणी करना होती है ताकि वह फंसने से बच सके। इसीलिए मनमोहन सिंह ने संभवत: यह मानने हुए टिप्पणी की कि इससे वह बच जाएंगे। प्रधानमंत्री ने अपनी निष्कि्रयता के कारण देश को 1।76 लाख करोड़ रुपये की चपत लगा दी। हालांकि इस सबके बावजूद, कांग्रेस के संकटमोचक रोजाना ही हमें घुट्टी पिलाने की कोशिश करते हैं कि मनमोहन सिंह एक सम्मानित व्यक्ति हैं! मनमोहन सिंह का आचरण चकराने वाला है। जब कानून और वित्त मंत्रालय ने इस पक्ष में राय जाहिर की कि 2-जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस जारी करने का मामला मंत्रियों के समूह को सौंप देना चाहिए, कोई भी प्रधानमंत्री उनकी राय पर अमल न करने का जोखिम नहीं उठा सकता, खासतौर पर जब मामला एक ऐसे राष्ट्रीय संसाधन की बिक्री का हो, जिससे सरकार को मोटी रकम मिल सकती हो। तो भी, मनमोहन सिंह ने सुनिश्चित किया कि मामला मंत्रियों के समूह तक न पहुंच पाए। स्पष्ट तौर पर प्रधानमंत्री दोनों मंत्रालयों की सलाह को दरकिनार करने के लिए प्रधानमंत्री पर भारी दबाव पड़ा होगा। हर पहलू को ध्यान में रखते हुए और साथ ही मनमोहन सिंह के व्यक्तित्व, उनकी पृष्ठभूमि और दो मंत्रालयों की सुलझी हुई सलाह की अवहेलना में भारी जोखिम को देखते हुए कहा जा सकता है कि दबाव एक गठबंधन सहयोगी की तरफ से ही पड़ सकता है। इसलिए प्रथम दृष्टया भारी-भरकम साक्ष्यों के आलोक में ए राजा के आचरण और उनके खिलाफ आपराधिक मामला चलाना तो केवल पहला कदम ही होना चाहिए। इस भारी-भरकम घोटाले में किसी भी जांच का अंतिम लक्ष्य प्रधानमंत्री की निष्कि्रयता के कारणों का पता लगाना तथा उन लोगों को चिह्नित करना होना चाहिए जिन्होंने इस निष्कि्रयता से लाभ उठाया है। इस बीच, हमें स्मरण रखना चाहिए कि कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि हमें बता रहे हैं कि मनमोहन सिंह एक सम्मानित व्यक्ति हैं! (लेखक संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

हिंदी वालों के खिलाफ षड्यंत्र

सिविल सेवा करीक्षा क्रणाली में संशोधन के कारण गैरअंग्रेजी भाषी छात्रों की असफलता सुनिश्चित मान रहे हैं डॉ। विजय अग्रवाल

हिंदी वालों के खिलाफ षड्यंत्र सिविल सेवा परीक्षा प्रणाली के लिए संघ लोक सेवा आयोग ने सन 2000 में वाईके अलघ के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई थी, जिसने अक्टूबर 2001 में अपनी रिपोर्ट यूपीएससी को सौंपी थी। अलघ कमेटी ने प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा में कुछ परिवर्तन सुझाए थे। इन सुझावों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सरकार ने 2011 की प्रारंभिक परीक्षा के स्वरूप में बदलाव की घोषणा की है। फिलहाल मुख्य परीक्षा को नहीं छेड़ा गया है। प्रारंभिक परीक्षा के दूसरे प्रश्नपत्र के रूप में जहां परीक्षार्थी को किसी एक विषय का चुनाव करना पड़ता था, वहीं अब उसकी जगह सिविल सर्विस एप्टीट्यूट टेस्ट देना होगा। इस पेपर को शामिल किए जाने के पक्ष में एक सामान्य तर्क तो यही है कि इससे परीक्षार्थियों के चरित्र, निर्णय लेने की क्षमता, तार्किक क्षमता, समस्याओं के समाधान, मानसिक योग्यता व दृढ़ता, कम्यूनिकेशन स्किल्स, सामान्य समझ तथा गणित की सामान्य योग्यता आदि की जांच की जा सकेगी। यह पेपर बहुत कुछ कैट की परीक्षा जैसा ही है। इस प्रश्नपत्र को लागू किए जाने के पीछे मुख्य कारण यह है कि वैकल्पिक पेपर में स्केलिंग की पद्धति लागू की जाती थी, ताकि किसी विषय विशेष के विद्यार्थी को न तो अतिरिक्त लाभ मिल सके और न ही किसी को कोई नुकसान उठाना पड़े। अब प्रारंभिक परीक्षा में वैकल्पिक विषय को ही समाप्त कर दिया गया है। लेकिन बात तब तक नहीं बनेगी जब तक कि सरकार मुख्य परीक्षा में भी अलघ कमेटी के सुझाव को लागू न करे, क्योंकि उसमें जब तक वैकल्पिक विषय रहेंगे, तब तक स्केलिंग पद्धति रहेगी और जब तक यह पद्धति रहेगी तब तक संदेह भी बना रहेगा। मैं सिविल सर्विस एप्टीट्यूट टेस्ट में शामिल उस खतरनाक तथ्य की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा, जो हमें एक बार फिर से लार्ड मैकाले की याद दिलाता है। इस एप्टीट्यूट टेस्ट के सात मुख्य बिंदु हैं। इनमें अंतिम और सातवां बिंदु है-इंग्लिश लैंग्वेज कम्प्रीहेंसिव स्किल्स। सामान्यतया प्रारंभिक परीक्षा के प्रश्नपत्र में वस्तुनिष्ठ किस्म के 150 प्रश्न पूछे जाते हैं। इस पेपर में प्रत्येक बिंदु से औसतन 20 प्रश्न पूछे जाएंगे। जिस परीक्षा में हर साल लगभग चार लाख विद्यार्थी बैठते हों और जिसमें औसतन बारह हजार विद्यार्थियों का चयन होता हो, वहां एक-एक नंबर का अंतर बेहद मायने रखता है। इस पेपर का एक प्रश्न दो नंबर का होता है। इस तरह यदि किसी विद्यार्थी की अंग्रेजी अच्छी नहीं है उसके चालीस नंबर पहले ही खत्म हो चुके होंगे। यहां मुद्दा यही है कि अच्छी अंग्रेजी न जानने वाले विद्यार्थी के चयन की संभावना बची ही नहीं रह जाएगी। एप्टीट्यूट टेस्ट के समर्थकों का कहना है कि इसके लिए अंग्रेजी ज्ञान का स्तर केवल दसवीं कक्षा तक का है। यह सही नहीं है। जिस व्यक्ति को बहुत अच्छी अंग्रेजी नहीं आती, उसके लिए इसे हल कर पाना संभव नहीं है। अंग्रेजी के समर्थकों का यह भी कहना है कि अंग्रेजी जाने बिना केंद्र और राज्य का पत्राचार मुश्किल है। इस दलील में भी दम नहीं है। अपने 26 वर्ष के प्रशासकीय जीवन में मैंने 17 साल राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति भवन जैसी सर्वोच्च संस्थाओं में बिताए हैं और मुझे यह कहने में गर्व व आत्मसंतोष का अनुभव हो रहा है कि अंग्रेजी ज्ञान का अभाव मेरे रास्ते में कोई बाधा खड़ा नहीं कर सका। इस संबंध में प्रशासनिक चिंतक फ्रेडरिक रिग्स के विचारों को जानना जरूरी है। उन्होंने प्रशासन के संबंध में पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण की बात कही थी और जिसे पूरी दुनिया ने विशेषकर विकासशील देशों ने खूब सराहा और लागू भी किया। रिग्स के अनुसार किसी भी देश की प्रशासनिक प्रणाली वहां की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों से पैदा होनी चाहिए। इसलिए उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि विकसित देशों का प्रशासनिक स्वरूप विकासशील देशों के लायक नहीं हो सकता। अंग्रेजी का ज्ञान और प्रशासन की योग्यता के समानुपातिक संबंध का सिद्धांत न केवल मूर्खतापूर्ण है, बल्कि घोर षड्यंत्रकारी भी है। सन 1979 से सिविल सेवा परीक्षा के दरवाजे हिंदी एवं भारतीय भाषाओं के लिए खोल दिए गए थे। 2008 की मुख्य परीक्षा के आंकड़ों पर दृष्टिपात करने पर पता चलता है कि सभी के लिए अनिवार्य विषय सामान्य ज्ञान के प्रश्नपत्र में कुल 11,320 विद्यार्थी बैठे थे। इनमें से 5,117 विद्यार्थी हिंदी माध्यम के थे, 5,822 विद्यार्थी अंग्रेजी माध्यम के थे और शेष विद्यार्थी अन्य भाषाओं के थे। ये आंकड़े बताते हैं कि अब हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षा देने वाले परीक्षार्थियों की संख्या आधे से अधिक हो गई है। अंतिम रूप से चयनित विद्यार्थियों का अनुपात भी यही है। अब जो एप्टीट्यूट टेस्ट लागू किया जा रहा है, उसमें इंग्लिश लैंग्वेज कम्प्रीहेंसिव स्किल को चुपचाप बड़े खूबसूरत तरीके से शामिल कर इन पचास प्रतिशत विद्यार्थियों को हमेशा-हमेशा के लिए बाहर कर देने का एक बौद्धिक षड्यंत्र रचा गया है। सरकार को अपने इस निर्णय पर फिर से विचार करना चाहिए ताकि भारतीय प्रशासन का स्वरूप न बिगड़ जाए और भारतीय प्रशासन भारतीयों के द्वारा और भारतीयों के लिए ही रहे। (लेखक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

Friday, September 3, 2010

जनप्रतिनिधियों की अंतरात्मा

हमारे सांसदों ने स्वयं संसद में बैठकर अपने वेतन और भत्तों में तीन सौ प्रतिशत की वृद्धि कर ली है। उनका कहना है कि उन्हें जो वेतन-भत्ते मिलते हैं, वे अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम हैं। वे अपनी तुलना उन देशों के सांसदों से करते हैं जो विकसित और समृद्ध देश हैं। वहां के आमजन उस गरीबी और कुपोषण में नहीं जीते हैं जिसमें इस देश के अधिसंख्य लोग जीते हैं। एशिया विकास बैंक की हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के 75 फीसदी लोग निर्धन मध्य वर्ग में आते हैं, जिनकी मासिक आय 1035 रुपये से कम है। निम्न मध्य वर्ग, जिसकी आय 1035 से 2070 रुपये के बीच है, में लगभग 22 करोड़ लोग हैं। 2070-5177 आय वर्ग वाले मध्य-मध्य वर्ग के लोगों की संख्या पांच करोड़ से कम है। उच्च मध्य वर्ग के लगभग 50 लाख लोगों की मासिक आय 10 हजार का आंकड़ा छूती है। केवल 10 लाख लोग, जिन्हें अमीर समझा जाता है, की आय 10 हजार रुपये से अधिक है। देश के सांसद जो वेतन और भत्ते प्राप्त करने जा रहे हैं उसके अनुसार प्रत्येक सांसद की मासिक आय डेढ़ लाख रुपये मासिक से अधिक होगी। उन्हें सांसद होने के नाते जो सुविधाएं प्राप्त होंगी उनमें दिल्ली में मुफ्त आवास, 50 हजार यूनिट बिजली, 4 हजार किलोलीटर पानी, डेढ़ लाख मुफ्त काल सहित दो टेलीफोन, दो मोबाइल फोन, पति या पत्नी सहित देश के किसी भी भाग की 34 बार मुफ्त हवाई यात्रा, रेलवे के वातानुकूलित डिब्बे में असीमित यात्राएं शामिल हैं। इसके अतिरिक्त ऐसी अनेक सुविधाएं हैं जिन पर आम लोगों को हजारों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। अनेक सांसदों का यह कहना है कि उनका वेतन सचिव स्तर के किसी भी अधिकारी से एक रुपया अधिक होना चाहिए। यह बेहूदा तर्क है। सचिव स्तर के अधिकारी का वेतन आयकर मुक्त नहीं होता। सांसद चाहते हैं उनके वेतन पर किसी प्रकार का कर न लगे। सरकारी अधिकारियों को मुफ्त आवास, बिजली, पानी, टेलीफोन सेवा, हवाई अथवा रेल सेवा की ऐसी सुविधाएं नहीं मिलतीं, जो सांसदों को हासिल हैं। किसी सरकारी कर्मचारी को किसी अन्य साधन से धन-अर्जित करने का अधिकार नहीं होता। किंतु सांसदों पर ऐसा कोई बंधन नहीं होता। भारतीय सांसदों में 300 से अधिक करोड़पति और अरबपति हैं। एक सांसद यदि पूरी अवधि तक संसद का सदस्य रहता है तो उसकी संपत्ति में चार-पांच गुणा बढ़ोतरी हो जाती है। सांसदों के वेतन को लेकर संसद के सभी सदस्यों के बीच जिस प्रकार की एकता दिखाई दी है, वह भी अद्भुत है। वामपंथी सदस्यों ने वेतन वृद्धि का विरोध अवश्य किया और इस प्रश्न पर सदन से बहिर्गमन भी किया। कुछ वर्ष पहले संविधान में संशोधन करके उसमें समाजवादी शब्द जोड़ा गया था। किंतु अपने आपको समाजवादी कहने वाले सांसदों ने वेतन वृद्धि में जितनी लोलुपता और दुराकांक्षा प्रदर्शित की है, उतनी किसी और ने नहीं की। इस अभियान में लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव सबसे आगे रहे। मुलायम सिंह यादव तो उस पार्टी के अध्यक्ष है जिसका नाम ही समाजवादी है। इस देश में आ रहे समाजवाद का हाल यह है कि 45 प्रतिशत से अधिक लोग 20 रुपये रोज से कम में गुजारा करते हैं। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के अंतर्गत किसी भी बरोजगार मजदूर को वर्ष में 100 दिन का काम और 100 रुपये प्रतिदिन दिए जाने का प्रावधान है। राजस्थान से प्राप्त एक रिपोर्ट के अनुसार वहां इस योजना के अंतर्गत लगाए गए मजदूरों को एक रुपये से 13 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी मिली। शेष धन बिचौलिये खा गए। संसद में बैठे जनप्रतिनिधियों का ध्यान इस ओर नहीं है कि देश में कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या करोड़ों में है। ये असमय ही मौत के गाल में समा जाते हैं। बस्तर तथा अन्य आदिवासी क्षेत्रों के लोग पास के शहरों में दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में मजदूरी के लिए जाते हैं। इस प्रकार की रिपोटर्ें भी आई हैं कि उनमें से कुछ लोग रास्ते में ही भूख से तड़प कर मर गए। इन सांसदों का इससे कोई सरोकार नहीं है। इनकी मानसिकता तो यह है कि जब देश में लूट-खसोट चल ही रही है तो वे इस अवसर को हाथ से क्यों जाने दें। महीप सिंह (लेखक जाने-माने साहित्यकार हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

भ्रष्टाचार को मिलती मान्यता

लोकाचार में भ्रष्टाचार की प्रतिष्ठा के कारणों की पड़ताल कर रहे हैं जगमोहन सिंह राजपूत

राष्ट्रमंडल खेल तो होंगे ही, सफल भी घोषित होंगे और निश्चित रूप से इनके समाप्त होने पर आयोजन के जिम्मेदार कुछ लोगों को पुरस्कृत भी किया जाएगा। खेलों में भ्रष्टाचार की जांच के लिए कुछ जांच समितियां बना दी जाएंगी तथा उनका लिब्रहानीकरण कर दिया जाएगा। यानी जांच 16-17 वर्ष तक चल सकती है। इस देश में भ्रष्टाचार, घोटालों को उजागर करने वालों को हंसी का पात्र माना जाने लगा है। सूचना के अधिकार का प्रयोग कर तथ्य उजागर करने वालों की दिनदहाड़े हत्या कर दी जाती है। कहीं हत्या का अपराधी 66 बार जेल के बाहर जाता है, कोई दो-तीन महीने के पेरोल पर घर जाकर दादी की सेवा करता है। इस सबमें समानता का तत्व क्या है? धनबल से सत्ताबल, न्यायबल सब ढक जाता है। धनबल से सत्ता प्राप्त की जाती है। आने वाले वषरें में यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि धनबल सत्ता पर पूर्ण, स्वच्छंद अधिकार कर लेगा। स्वतंत्रता के चार दशकों बाद पंचायत राज अधिनियम बना। तब तक जनतंत्र की विकृति के आधार गांवों में पहुंच चुके थे। जाति आधारित राजनीतिक दल अपना स्थान बना चुके थे, ग्राम समाज बंट चुका था। बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के बीच की दीवार पक्की कर दी गई थी। 1993 में पीवी नरसिंहा राव की सरकार धन के लेन-देन से बची और केंद्र व राज्य सरकारों के लिए नजीर बन गई। गोवा, पूर्वोत्तर राज्य, झारखंड इसका भरपूर उपयोग करते रहे हैं। झारखंड के मधु कोड़ा कुछ अधिक ही साहसी निकले। उन्होंने व्यक्तिगत इच्छाओं तथा सरकारी खजाने में कोई भेदभाव नहीं रखा। खुले दिल से स्वहित साधन का खुला उदाहरण रख दिया। वैसे अब चारा घोटाले की चर्चा कौन करता है? किसे याद है झारखंड की जनता के हजारों करोड़ों की? क्या उसमें से एक पैसा भी वापस आया या आएगा? आज सारा देश हतप्रभ होकर देख रहा है? कुछ सौ करोड़ का अनुमान लगाकर खेलों के आयोजन की स्वीकृति पाने वाले आज कितने हजार करोड़ों का खेल प्रस्तावित आयोजन के पहले ही खेल चुके हैं, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है। कहने को तो हर कोई पारदर्शिता की दुहाई देता है परंतु जो जानकारियां बाहर आई हैं वे भ्रष्टाचार तथा कदाचार के नए मानक स्थापित करती हैं। आजादी के बाद उम्मीद की जा रही थी कि अब शोषण, भ्रष्टाचार, सामाजिक अपमान धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगे। प्रत्येक व्यक्ति को सत्ता में भागीदारी का न केवल अधिकार मिलेगा, बल्कि अपनी आर्थिक स्थिति का ख्याल किए बिना ही उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का बराबरी का अवसर भी हासिल होगा। वहां से चलते हुए केडी मालवीय, टीटी कृष्णामाचारी जैसे प्रकरण सामने आए। लोगों का विश्वास बढ़ा। इन पर व्यक्तिगत आरोप लगभग नगण्य थे। फिर लोगों के सामने रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा आया जो आंध्र में रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने दिया था। आज केंद्रीय मंत्रिमंडल में एक मंत्री ए राजा हैं। उन पर एक लाख करोड़ से ऊपर के भ्रष्टाचार के आरोप हैं। कहा तो यही जाता है कि प्रधानमंत्री उन्हें नई सरकार में नहीं लेना चाहते थे मगर सत्ता के समीकरणों ने उन्हें मजबूर कर दिया। ए राजा न कवेल मंत्री बने हैं बल्कि उनका विभाग भी आज तक नहीं बदला जा सका है। संविधान द्वारा प्रदत्त विशेषाधिकारों का उपयोग यदि प्रधानमंत्री नहीं कर पाते हैं तो देश की जनता तथा युवा वर्ग को जो संदेश जाता है उसका असर लंबे समय तक रहेगा। उसी युवा वर्ग के प्रोत्साहन तथा मनोबल को बढ़ाने के लिए राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हो रहा है। आज दिन-रात स्कूल-कॉलेजों तथा घरों में हर कोई इन खेलों की नहीं, इनके आयोजन में भ्रष्टाचार के नए तरीकों की बात कर रहा है। चर्चा इस पर हो रही है कि भ्रष्टाचार तो सदा रहा है, लेकिन आज भ्रष्टाचार करने वाले के चेहरे पर शिकन नहीं आती है। वे जानते हैं कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। यदि वे सत्ता में हैं तब तो मंत्री, मुख्यमंत्री या सरकार को सहारा देने वाले बन सकते हैं और आरोप ठंडे बस्ते में चले जाएंगे। सामाजिक मूल्यों पर जनतांत्रिक मूल्यों के Oास का जबरदस्त प्रभाव पड़ा है। चुने हुए प्रतिनिधियों की संपत्ति का ब्यौरा पांच साल में कई गुना बढ़ जाता है। सत्ता के ऊंचे पायदानों ने धनबल बढ़ाने के लिए जो कुछ किया है उसका खुला प्रदर्शन कॉमनवेल्थ खेलों में हुआ है। कहा जा रहा है कि भ्रष्टाचार उजागर करने वालों को राष्ट्रहित में खेलों के सफल आयोजन तक चुप रहना चाहिए। भ्रष्टाचार के, धन बटोरने में बेशर्मी के आरोप तो ऐसे हैं कि आयोजन से जुड़े अनेक लोगों को जेल में होना चाहिए। इस आयोजन ने सारे देश में आक्रोश की स्थिति पैदा कर दी है। युवा पीढ़ी विशेष रूप से आहत है। सब कुछ युवाओं को प्रोत्साहित करने के नाम पर हो रहा है। नैतिक पतन का ठोस उदाहरण उनके सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। युवा पीढ़ी ही इस स्थिति से देश को बाहर निकालने का रास्ता ढूंढ सकती है। आज नहीं तो कल ऐसा होगा ही। एक तरफ महंगाई करोड़ों को भूखा सुला रही है, तो दूसरी तरफ पैसे बटोरने की होड़ लगी है। महात्मा गांधी आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति को याद करते थे। आज के नेता चाहते हैं कि लोग राष्ट्रमंडल खेलों में देश की प्रतिष्ठा पर बट्टा लगाने वाले गुनहगारों के कारनामे भुला दें। ऐसा अधिक दिन नहीं होता है। (लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)
साभार:-दैनिक जागरण