Thursday, March 25, 2010

सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुर्दशा

उच्चतम न्यायालय की एक समिति के इस निष्कर्ष पर तनिक भी आश्चर्य नहीं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली नितांत अक्षम और भ्रष्ट है। भले ही उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश डीपी वधवा की अध्यक्षता वाली केंद्रीय सतर्कता समिति ने यह न स्पष्ट किया हो कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत सब्सिडी पर सालाना 28000 करोड़ रुपये की जो भारी-भरकम राशि खर्च की जाती है उसमें कितना हिस्सा भ्रष्ट तत्वों की जेबों में चला जाता है, लेकिन इस प्रणाली में जिस तरह हर स्तर पर भ्रष्टाचार का बोलबाला है उसे देखते हुए पांच-दस प्रतिशत राशि का भी सदुपयोग होने की उम्मीद नहीं है। चूंकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार व्याप्त है इसलिए इसमें संदेह है कि कुछ कड़े कदम उठाने से अपेक्षित सुधार आ जाएगा। ऐसा होने की उम्मीद इसलिए और भी कम है, क्योंकि अफसरशाही, राशन दुकानदारों और दलालों के बीच गठजोड़ कायम हो चुका है। इसके चलते गरीबों का खाद्यान्न राशन दुकानों तक पहुंचे बगैर सीधे आटा मिलों तक पहुंच जाता है। यह शर्मनाक है कि यह काम दिल्ली तक में होता है। जब दिल्ली में यह हाल है तो इस पर सुनिश्चित हुआ जा सकता है कि शेष देश में और भी बुरी स्थिति होगी। वैसे भी यह किसी से छिपा नहीं कि राज्य सरकारें सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के लिए बिलकुल भी गंभीर नहीं हैं। स्पष्ट है कि केंद्र सरकार निर्धन तबके को 28 हजार करोड़ रुपये की जो सब्सिडी देती है वह राज्य सरकारों की लापरवाही के चलते अफसरशाही, राशन दुकानदारों और दलालों के गठजोड़ को उपलब्ध हो रही है। एक तरह से केंद्र और राज्य सरकारें भ्रष्टाचार की एक सार्वजनिक प्रणाली चला रही हैं। यह समझना कठिन है कि गरीबों के नाम पर ऐसी प्रणाली चलाते रहने का क्या अर्थ जो सिर्फ भ्रष्ट तत्वों को मालामाल कर रही हो? वैसे तो राज्य सरकारें बात-बात में केंद्र को कठघरे में खड़ा करती रहती हैं, लेकिन सच यह है कि वे अपनी हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वाह करने में सर्वथा नाकारा हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के भ्रष्टाचार में जकड़ जाने के लिए राज्य सरकारें केंद्र को दोष नहीं दे सकतीं। उन्हें इसका पूरा-पूरा अधिकार है कि वे इस प्रणाली को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए हर संभव उपाय करें। शायद ही कोई राज्य सरकार हो जिसने इस प्रणाली में कोई उल्लेखनीय सुधार किया हो। ऐसा लगता है कि केंद्र सब्सिडी बांट कर खुश है और राज्य राशन दुकानें खुलवाकर। वधवा कमेटी ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जो भयावह तस्वीर सामने रखी उसकी हकीकत से केंद्र और राज्य सरकारें पहले से अवगत थीं, लेकिन ऐसा लगता है कि वे उच्चतम न्यायालय के दखल के इंतजार में बैठी थीं। नि:संदेह यह न्यायपालिका का काम नहीं कि वह सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुर्दशा देखे, लेकिन उसे इसके लिए विवश होना पड़ा। उसकी विवशता शासनतंत्र के नाकारापन का एक और शर्मनाक उदाहरण है। यदि केंद्र एवं राज्य सरकारें सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार और गरीबों की मदद करने के लिए तनिक भी प्रतिबद्ध हैं तो उन्हें इस प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन करके दिखाना होगा। आवश्यकता पड़ने पर इस प्रणाली को खत्म कर निर्धनों को सीधे खाद्यान्न कूपन देने में भी संकोच नहीं किया जाना चाहिए।
सम्पादकीय दैनिक जागरण

हेडली से अमेरिकी प्रशासन का समझौता

पाकिस्तान मूल के आतंकी दाऊद गिलानी उर्फ डेविड कोलमेन हेडली से अमेरिकी प्रशासन का समझौता भारत के लिए एक आघात तो है ही, आतंकवाद के मामले में अमेरिका के दोहरे आचरणका एक और सबूत भी है। एक बार फिर अमेरिका ने वही किया जो सिर्फ उसके हितों की पूर्ति करने वाला था। हेडली से समझौता कर अमेरिका ने इस आशंका की पुष्टि कर दी कि यह आतंकी लश्कर का गुर्गा होने के साथ-साथ उसकी खुफिया एजेंसी एफबीआई का भेदिया भी था। यह ठीक है कि अमेरिका इस तथ्य पर पर्दा डालना चाहेगा, लेकिन यह निंदनीय है कि इस कोशिश में उसने एक ऐसे आतंकी से समझौता किया जो डेढ़ सौ से अधिक लोगों की हत्या के लिए जिम्मेदार है। इस पर गौर किया जाना चाहिए कि अमेरिकी प्रशासन और हेडली के बीच हुए समझौते की एक शर्त यह है कि उसे भारत और डेनमार्क प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता। चूंकि हेडली डेनमार्क के एक अखबार के दफ्तर में हमला करने की साजिश को अंजाम देने के पहले ही पकड़ा गया इसलिए यह देश शायद ही उससे पूछताछ करने का इच्छुक हो, लेकिन न्याय का तकाजा तो यह कहता है कि उसे भारत लाया जाना चाहिए। कम से कम अब तो हमारे नीति-नियंताओं को यह समझ आ जाना चाहिए कि अमेरिका ने अपने लिए अलग और शेष दुनिया के लिए अलग नियम बना रखे हैं। यह बेहद दयनीय है कि भारत अमेरिका के इस आश्वासन पर राहत महसूस कर रहा है कि उसे हेडली से पूछताछ करने का अवसर दिया जाएगा। इसमें संदेह है कि ऐसा हो पाएगा। हेडली से पूछताछ करने में अमेरिका इतने अड़ंगे लगा सकता है कि भारतीय अधिकारी उससे पूछताछ न करना ही बेहतर समझें। अमेरिका ने आतंकी हेडली के हितों की रक्षा के लिए जो तत्परता दिखाई उससे उसके और पाकिस्तान के आचरण में एक समानता सी नजर आने लगी है। आखिर अब अमेरिका किस मुंह से यह कहेगा कि कि मुंबई हमले के दोषियों को दंड मिलना चाहिए, क्योंकि एक दोषी को बचाने का काम तो वह खुद कर रहा है? क्या भारत सरकार अमेरिका से यह सवाल करेगी कि उसे हेडली की जान की इतनी परवाह क्यों है? यह शुभ संकेत है कि गृहमंत्री चिदंबरम कह रहे हैं कि भारत हेडली के प्रत्यर्पण की कोशिश जारी रखेगा, लेकिन यह ठीक नहीं कि विदेश मंत्री एसएम कृष्णा अमेरिकी सहयोग से संतुष्ट हैं। आखिर यह क्या बात हुई? विदेश मंत्री अमेरिका की तरफदारी क्यों कर रहे हैं- और वह भी तब जब अमेरिका आतंकवाद के मामले में दोहरे मानदंड दिखा रहा है? ऐसा लगता है कि हमारे नीति-नियंता यह अहसास नहीं कर पा रहे हैं कि अमेरिका ने अपने संकीर्ण स्वार्थो को पूरा करने के फेर में भारत को धोखा देने का काम किया है। शर्मनाक केवल यह नहीं है कि अमेरिका ने एक कुख्यात आतंकी से समझौता कर लिया, बल्कि यह भी है कि उसकी ओर से हेडली को इस बात का प्रमाण पत्र देने की भी कोशिश की जा रही है कि उसने ईमानदारी से अपने गुनाह कबूल किए हैं और वह सरकार के साथ सहयोग करने के लिए सहमत है। हेडली की यह ईमानदारी ओबामा प्रशासन को ही मुबारक हो। इसका कोई औचित्य नहीं कि भारत हेडली के मामले में अमेरिका के रवैये का प्रतिरोध न करे, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसी संभावना नहीं है कि भारतीय नेतृत्व अमेरिका से अपनी नाराजगी जताएगा।
सम्पादकीय दैनिक जागरण

सरकार की पराजय गाथा

सरकार पर आतंकवाद और विदेश नीति पर अमेरिकी दबाव में राष्ट्र विरोधी फैसले लेने का आरोप लगा रहे हैं तरुण विजय
26/11 के मुख्य षड्यंत्रकारियों में से एक डेविड कोलमैन हेडली से पूछताछ में भारत सरकार की असफलता की स्याही सूखी भी नहीं थी कि रेल मंत्रालय के उस विज्ञापन की चर्चा उभरकर आई, जिसमें दिल्ली को पाकिस्तान में दिखाया गया है। इस मामले पर भी उसी तरह लीपापोती की जा रही है जैसी कुछ दिन पहले समाज कल्याण मंत्रालय के विज्ञापन में पाकिस्तानी वायुसेना अध्यक्ष का चित्र छापने पर की गई थी। इसी बीच तमाम तरह की मक्कारियों और भारत विरोधी आक्रामकताओं के बावजूद पाकिस्तानी पक्ष को वार्ता के लिए बुलाकर भारत सरकार ने अमेरिकी दबाव का आरोप आमंत्रित किया था। उस वार्ता से भी कोई नतीजा नहीं निकला, बल्कि पाकिस्तानी विदेश मंत्री से यहां तक सुन लिया गया कि भारत ने घुटने टेककर पाकिस्तान को वार्ता के लिए बुलाया है। कसाब पर मुकदमा चलते हुए दो साल से अधिक समय हो गया है, परंतु मामला किसी नतीजे तक पहुंचता नहीं दिखता। उधर, अमेरिका ने तो हेडली पर छह महीने से भी कम समय में मुकदमा चलाकर और साक्ष्य जुटाकर निर्णय तक पहुंचने की अद्भुत चुस्ती दिखाई है, जो भारत के लिए एक सबक होना चाहिए। भारत में आम धारणा बन गई है कि अभी तक सरकार किसी भी आतंकवादी को सजा की परिणति तक नहीं पहुंचा पाई है। मुंबई दंगों के आरोपियों को भी 13 साल तक चले मुकदमों के बाद सजा सुनाई गई। अफजल को फांसी न दिए जाने की तो अलग ही कहानी बन चुकी है। कुल मिलाकर यह परिदृश्य उभर रहा है कि सरकार का शरीर भले ही दिल्ली में हो पर उसका मन भारत में नहीं है। इसलिए आतंकवादियों से बातचीत की जाती है, लेकिन देशभक्तों के शरणार्थी बनने पर भी सरकार के मन में दर्द नहीं उमड़ता। 5।5 लाख से अधिक कश्मीरी हिंदू शरणार्थी हैं। मुजफ्फराबाद और रावलपिंडी से 1947 में कश्मीर आए हिंदू शरणार्थियों की संख्या 3 लाख हो गई है। इन्हें अभी तक न कश्मीर की नागरिकता मिली है न ही मतदान करने का अधिकार है। इसके विपरीत पाक अधिकृत गुलाम कश्मीर में आतंकवाद की ट्रेनिंग लेने गए कश्मीरी मुस्लिम युवाओं को भारत के गृहमंत्री और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री द्वारा वापस श्रीनगर लौटने का न्योता दिया जाता है। यह किस मानसिकता का द्योतक है? हेडली का मामला तो सबसे शर्मनाक और आत्मघाती है। हेडली मुख्यत: भारत का अपराधी है। उस पर अमेरिका में मुकदमा चलाए जाने से अधिक न्यायसंगत भारत में मुकदमा चलाया जाना है। 26/11 का मुख्य युद्धस्थल भारत था। हेडली 12 बार भारत आकर षड्यंत्र की आधारभूमि तैयार कर गया था। कुछ अमेरिकियों के उस आक्रमण में मारे जाने के कारण अमेरिका हेडली पर मुकदमा चलाने का मुख्य नैतिक अधिकार नहीं प्राप्त कर लेता जैसे अमेरिका में 9/11 के हमले में कुछ भारतीयों के मारे जाने के परिणामस्वरूप भारत 9/11 के आरोपियों पर मुकदमा चलाए जाने का मुख्य नैतिक अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता। लेकिन अमेरिका ने न केवल कसाब से भारत आकर पूछताछ का अधिकार प्राप्त किया, बल्कि जब भारत के गुप्तचर अधिकारी हेडली से पूछताछ के लिए अमेरिका गए तो उन्हें बैरंग वापस लौटा दिया। अमेरिका हेडली से पूछताछ के मामले में यह बात ढकने की कोशिश कर रहा है कि उसने हेडली को मुस्लिम नाम (दाऊद) बदलकर इसाई नाम रखने की अनुमति दी। हेडली अमेरिका के लिए डबल एजेंट का भी काम करता रहा है। ओबामा ने भारत को हेडली के मामले में पूरी तरह से निराश और विफल किया है तो दूसरी ओर भारत की दब्बू अमेरिकापरस्त सरकार ने भारतीय नागरिकों को असफल किया है। भारत सरकार को हेडली के मामले में अमेरिका सरकार के सामने जो आक्रामकता दिखानी चाहिए थी, उसका शतांश भी नहीं दिखाई। दुनिया में आतंकवाद का सबसे अधिक शिकार होने के बावजूद भारत दुनिया के किसी भी देश को प्रभावित करने या उसे अपने साथ आतंकवाद विरोधी मुहिम में जोड़ने में पूरी तरह नाकामयाब रहा है। वास्तव में अमेरिका की आतंकवाद विरोधी नीति पूरी तरह से एकांतिक और स्वार्थ केंद्रित है। यह मानना बड़ी भूल होगी कि ओबामा आतंकवाद विरोधी मुहिम में भारत की संवेदनाओं को समझेंगे या यहां की लोकतांत्रिक परंपरा का सम्मान करेंगे। पाकिस्तान को अमेरिका पूरी तरह से अपनी मुस्लिम विश्वनीति और अपनी दृष्टि के आतंकवाद विरोधी युद्ध में एक आवश्यक सहयोगी के नाते मान्य करता है। उसका स्वार्थ है कि पाकिस्तान अपने पश्चिमी मोर्चे पर अफगानी तालिबानी से लोहा लेता रहे। पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकवादियों को बढ़ावा दे रहा है या नहीं, इससे अमेरिका को कोई सरोकार नहीं है। यही कारण है कि मुंबई 26/11 के हमले के संदर्भ में अमेरिका द्वारा पकड़े गए हेडली से भारत के अधिकारी प्रत्यक्ष पूछताछ से भी दूर रखे गए हैं। शक्तिहीन सत्ता केंद्र राष्ट्रीय भावनाओं के अभाव में युद्ध कैसे हारते हैं, वर्तमान सरकार उसका एक दयनीय उदाहरण है। ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति हैं, भारत की चिंता करना उनका काम नहीं है। वह अपनी दृष्टि से अपने देश का हित कर रहे हैं। सवाल उठता है कि भारत के नेता भारत के हित के संदर्भ में क्या कर रहे हैं? दोनों ओर से परमाणु शक्ति संपन्न शत्रु देशों से घिरा भारत आंतरिक तौर पर नक्सली आतंक से लहुलुहान है। लेकिन कहीं भी आतंक पर विजय प्राप्त कर नागरिकों को निर्भय बनाने की इच्छाशक्ति नहीं दिखती।
साभार:-दैनिक जागरण
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

आतंकी का साथी अमेरिका

लश्कर आतंकी डेविड हेडली के मामले में अमेरिका के आचरण को भारत विरोधी बता रहे हैं राजीव सचान

इस परिदृश्य पर शायद हर किसी ने विचार किया होगा कि तब क्या होता जब अमेरिका में किसी आतंकी वारदात में शामिल रहे व्यक्ति को भारत ने पकड़ा होता? इसमें किसी को संदेह नहीं कि अमेरिकी अधिकारियों ने भारत आकर न केवल उससे गहन पूछताछ की होती, बल्कि उसे अपने साथ अमेरिका ले भी गए होते, भले ही वह कुछ मामलों में भारत में वांछित होता। अमेरिका ने मुंबई हमले की साजिश रचने वाले पाकिस्तान मूल के अपने नागरिक दाऊद गिलानी उर्फ डेविड कोलमेन हेडली को भारत प्रत्यर्पित करना तो दूर रहा, उसकी शक्ल तक नहीं देखने दी। शिकागो में उसकी गिरफ्तारी के बाद उससे पूछताछ करने गए भारतीय अधिकारियों को बैरंग लौटा दिया गया और अब यह सुनिश्चित किया गया है कि उसे भारत न ले जाया जा सके। अमेरिकी न्याय प्रणाली में यह व्यवस्था है कि यदि कोई अपराधी अपना गुनाह कबूल करने को तैयार हो तो उसे सजा देने में नरमी बरती जाती है। माना जाता है कि इससे आपराधिक मामलों का निपटारा होने में आसानी होती है। इस व्यवस्था के अपने गुण-दोष हैं और उस पर भारत या अन्य किसी देश की आपत्ति का कोई मतलब नहीं, लेकिन यह कहां का न्याय है कि किसी अपराधी को उस देश की पहुंच से दूर कर दिया जाए जहां उसने जघन्य अपराध किया हो? अमेरिका ने ठीक यही किया है। उसने दाऊद गिलानी से उसकी सुविधानुसार समझौता कर लिया। उसे न केवल मृत्यु दंड से बचने का अवसर दिया गया, बल्कि भारत, डेनमार्क और पाकिस्तान को न सौंपने का वचन भी दिया गया। यह समझना मुश्किल है कि समझौते के लिए गिलानी लालायित था या अमेरिकी प्रशासन? एक आतंकी से समझौते के बावजूद भारत को कोई आपत्ति नहीं है और उल्टे भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा कथित अमेरिकी सहयोग से संतुष्ट हैं। आखिर इसमें संतुष्ट होने जैसा क्या है और वह भी तब जब सहयोग का नामों-निशान तक नहीं दिखता। या तो यह भारतीय नेतृत्व का दीवालियापन है अथवा अमेरिका के समक्ष याचक मुद्रा में रहने की मानसिकता कि किसी ने इस पर मुंह खोलने का साहस नहीं किया कि दाऊद गिलानी से समझौता कर अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ जारी लड़ाई को कमजोर किया है और इस अनुचित समझौते से मुंबई हमले के गुनहगारों का पर्दाफाश करने में कठिनाई आएगी। दाऊद गिलानी और अमेरिकी प्रशासन के बीच हुआ समझौता इसलिए कहीं अधिक आपत्तिजनक है कि वह गिलानी की शर्ताें के हिसाब से हुआ। इस समझौते से यह साफ हो गया कि गिलानी अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई का भेदिया था, जो बाद में लश्कर का आतंकी बना। माना तो यह भी जा रहा है कि अमेरिकी अधिकारियों को इसकी जानकारी थी कि दाऊद गिलानी लश्कर की किसी साजिश को अंजाम देने के लिए ही बार-बार भारत के चक्कर लगा रहा है, लेकिन उन्होंने उसके खिलाफ समय रहते कोई कार्रवाई इसलिए नहीं की, क्योंकि वे उसे लश्कर के और करीब होते हुए देखना चाहते थे। तनिक गौर करें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि मुंबई हमला पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की सक्रियता के साथ-साथ अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई की निष्कि्रयता का भी नतीजा है। गौर करने वाली बात यह भी है कि भारत एक ओर पाकिस्तान पर दबाव बनाने में असमर्थ है तो दूसरी ओर अमेरिका से शिकायत करने में भी संकोच कर रहा है। क्या अमेरिका से नाराजगी जाहिर करने से वह नाराज हो जाएगा? क्या उसके नाराज होने से भारत का अहित हो जाएगा? क्या दाऊद गिलानी के साथ समझौता करने से भारत का हित हुआ? क्या अफगानिस्तान में भारत की भूमिका की अनदेखी करने से हमारा हित हो रहा है? क्या कश्मीर पर पाकिस्तान से सीधी बात करने के दबाव से भारत का हित हो रहा है? यह मनमोहन सिंह ही बता सकते हैं कि भारत अमेरिका के समक्ष इतना दीनहीन क्यों है, क्योंकि ओबामा प्रशासन पाकिस्तान को खुश करने में जुट गया है। इसके प्रबल आसार हैं कि वह पाकिस्तान के साथ भारत सरीखा नाभिकीय समझौता न सही, कुछ ऐसा करेगा जिससे पाकिस्तान को यह कहने का अवसर मिल जाए कि वह भारत से कम नहीं है। जार्ज बुश ने भारत और पाकिस्तान को एक ही तराजू पर तौलने की जिस नीति का परित्याग किया था, लेकिन ओबामा ऐसा कर रहे हैं कि जिससे दोनों देश फिर से एक ही तराजू पर दिखाई दें। मुंबई हमले की जमीन तैयार करने के दौरान दाऊद गिलानी भारत में जिन भी लोगों से मिला वे उसके दोस्ताना रवैये के कायल हो गए, लेकिन बाद में उन्हें पता चला कि वह तो आतंकी था। मनमोहन सिंह की पिछली अमेरिका यात्रा के दौरान ओबामा ने उनके प्रति जैसा दोस्ताना व्यवहार किया वह भारतीयों को मुग्ध कर गया। व्हाइट हाउस में मनमोहन सिंह की आवभगत से ऐसा लग रहा था कि ओबामा भारत के सबसे बड़े हित रक्षक हैं। अब आम भारतीय खुद को ठगा महसूस कर रहा है, खासकर इसलिए कि डेनमार्क दाऊद से पूछताछ कर चुका है। अमेरिका के इस आश्वासन पर मनमोहन सिंह संतुष्ट हो सकते हैं कि भारत को दाऊद गिलानी से पूछताछ करने की इजाजत मिलेगी। समस्या यह है कि इस सबके बावजूद मनमोहन सिंह अमेरिकी राष्ट्रपति से अगली मुलाकात में यह कह सकते हैं कि भारत के लोग आपको बहुत चाहते हैं। दरअसल यह कुछ भी नहीं, क्योंकि जब वह यूसुफ रजा गिलानी से बलूचिस्तान में भारत की भूमिका पर चर्चा के लिए राजी हो सकते हैं तो फिर दाऊद गिलानी का बचाव करने वाले ओबामा की सराहना भी कर सकते हैं।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)

अमेरिका और पाकिस्तान

अमेरिका और पाकिस्तान के बीच पनपता मैत्री भाव भारत के लिए खतरे की घंटी है। वैसे तो किन्हीं दो देशों के बीच बढ़ती मैत्री पर तीसरे देश की आपत्ति का मतलब नहीं, लेकिन अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान के कलुषित अतीत और वर्तमान की अनदेखी कर उसके प्रति जैसी दरियादिली दिखा रहा है वह अस्वाभाविक भी है और चिंताजनक भी। अमेरिका जिस तरह पाकिस्तान की मदद करने पर उतावला दिख रहा है उससे केवल भारत ही नहीं, दक्षिण एशिया और साथ ही विश्व समुदाय को भी चिंतित होना चाहिए। अमेरिका या तो पाकिस्तान का अंध समर्थन करने पर आमादा हो गया है या फिर वह इस अराजक एवं गैर जिम्मेदार राष्ट्र के प्रति किसी आसक्ति का शिकार है। यदि ऐसा नहीं है तो इसका कोई औचित्य नहीं कि पाकिस्तान आतंकवाद को पालने-पोसने और भड़काने की कीमत मांगे और अमेरिका उसे खुशी-खुशी देने के लिए तैयार भी दिखे। यह समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय मामलों का विशेषज्ञ होने की आवश्यकता नहीं है कि पाकिस्तान यकायक सोते से जागकर अपने बदनाम परमाणु वैज्ञानिक एक्यू खान के खिलाफ कार्रवाई करने का इरादा जाहिर कर अमेरिका की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश कर रहा है, लेकिन शायद अमेरिकी प्रशासन को इस देश के हाथों धोखा खाने की आदत पड़ चुकी है। अमेरिका और पाकिस्तान के बीच होने वाली रणनीतिक वार्ता से पहले विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने जिस तरह इस्लामाबाद को यह प्रमाण पत्र देने की कोशिश की कि वह चरमपंथ से लड़ रहा है वह हास्यास्पद तो है ही, अमेरिकी विदेश नीति के दीवालियेपन का परिचायक भी है। इस पर आश्चर्य नहीं कि भारत की आपत्तियों के बावजूद हिलेरी ने यह स्पष्ट किया कि असैन्य परमाणु समझौते के पाकिस्तान के अनुरोध पर विचार किया जाएगा, क्योंकि अमेरिका ने खुद को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है कि पाकिस्तान उसे आसानी से ब्लैकमेल कर सके। यह समय ही बताएगा कि ओबामा प्रशासन पाकिस्तान को असैन्य नाभिकीय सहायता देता है या नहीं, लेकिन इसमें संदेह नहीं रह गया है कि वह उसकी आंख मूंदकर सहायता करने के लिए तैयार है। यह लगभग तय है कि पाकिस्तान को अमेरिका से सैन्य-असैन्य सहायता की एक नई किश्त मिलने जा रही है। यह भी तय है कि वह इस सहायता का दुरुपयोग करेगा और वह भी भारत के खिलाफ। कम से कम अब तो भारत को यह अहसास हो जाना चाहिए कि अमेरिका अपने संकीर्ण हितों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। अमेरिका इससे अनजान नहीं कि अब पाकिस्तान अफगानिस्तान में भी भारतीय हितों के खिलाफ चोट कर रहा है, लेकिन भारत की कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। शायद आगे भी नहीं होने वाली। यह ठीक है कि भारत ऐसी स्थिति में नहीं कि वह अमेरिका को पाकिस्तान की अनुचित मदद करने से रोक सके, लेकिन क्या इसके खिलाफ जोरदार आवाज उठाने पर भी किसी ने रोक लगा रखी है? यदि भारत अपने हितों की रक्षा को लेकर ढिलाई का परिचय देगा तो फिर उसकी कठिनाई और बढ़ना तय है।
सम्पादकीय दैनिक जागरण

अंध मोदी-विरोध का मतलब

छद्म सेक्युलरों पर नरेंद्र मोदी के बहाने हिंदू भावना को कुचलने की साजिश रचने का आरोप लगा रहे हैं एस शंकर
साल भर भी नहीं हुआ जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त इसी विशेष जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में कुख्यात मानवाधिकारवादी तीस्ता सीतलवाड को गुजरात के बारे में भयानक हत्याओं और उत्पीड़न की झूठी कहानियां गढ़ने, झूठे गवाहों की फौज तैयार करने, अदालतों में झूठे दस्तावेज जमा करवाने और पुलिस पर मिथ्या आरोप लगाने का दोषी ठहराया था। पर उस रिपोर्ट के बाद तीस्ता के विरुद्ध कुछ नहीं हुआ। अब उसी दल ने नरेंद्र मोदी को मात्र बयान देने के लिए बुलाया, तो इसी आधार पर उनसे इस्तीफा देने की मांग होने लगी! इस अंध मोदी-विरोध को कैसे समझा जाना चाहिए? पांच वर्ष पहले नाटककार विजय तेंदुलकर ने कहा था कि यदि वे पिस्तौल उठाएंगे तो सबसे पहले नरेंद्र मोदी को मारेंगे। देश के बौद्धिक-राजनीतिक वर्ग ने तेंदुलकर की निंदा नहीं की। उलटे मोदी को बुरा-भला कहा। इनमें वे भी थे जो मानवाधिकार और सामुदायिक सद्भाव के लिए आतंकियों को भी सुविधा व छूट देने की मांग करते हैं। मोदी लगातार तीन बार मुख्यमंत्री बने तो इसमें उनके अच्छे शासन का भी योग है। इसके बावजूद राजनीतिक वर्ग में उनके प्रति विद्वेष और उन्हें कानून या मीडिया द्वारा फांसने की कोशिशें भी कम नहीं हुई हैं। इसका अर्थ है कि आज भी मोदी अकेले हैं। यानी एक ऐसा व्यक्ति जो जाने-अनजाने हिंदू आत्मरक्षा का प्रतीक बना, जिसने एक छोटा-सा सच कहने की हिम्मत की, उसे भारत में राजनीतिक अछूत बना दिया गया है! उसकी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, निष्पक्ष-प्रशासन और जन-समर्थन के बावजूद प्रभावी राजनीतिक-बौद्धिक वर्ग में उसके लिए बोलने वाला कोई नहीं। यह एक खतरनाक स्थिति है। मोदी केवल चुनावी आधार पर विजयी रहे हैं, क्योंकि गुजराती जनता उनके पक्ष में है। इसके अलावा हर राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनके खिलाफ जहर उगला जाता है। यह दुनिया भर के हिंदू-विरोधियों द्वारा हिंदुओं को दी जाने वाली चेतावनी है कि तुम्हें कुछ कहने का अधिकार नहीं! तुम्हें बराबरी का हक नहीं! तुम्हें अपने देश में भी दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में रहना है। इस अखंड मोदी-विरोध ने उन हिंदुओं को डराया है जो हिंदू चिंताओं को मुस्लिम चिंताओं के समान देखना उचित समझते हैं। यह संयोग नहीं कि जो बुद्धिजीवी, पत्रकार और राजनीतिकर्मी नरेंद्र मोदी के विरुद्ध जिहाद में लगे हैं, वे ऐसे एनजीओ के कर्ता-धर्ता हैं जिन्हें संदिग्ध विदेशी स्त्रोतों से धन, पुरस्कार मिलता है। तीस्ता सीतलवाड को निरंतर सम्मानित किया जा रहा है। उन्हें पुरस्कृत करने का संदेश यही है कि देश हिंदू-विरोधियों का है। इसलिए हिंदुओं में भी जो सेक्यूलर-वामपंथ, मानवाधिकारवाद, वैश्विक नागरिक, बहुंसस्कृतिवाद आदि के नाम पर व्यवहारत: हिंदू-विरोधी हो चुके हैं, उन्हीं को प्रश्रय मिलेगा। इसके अतिरिक्त जो सहज हिंदू भावना, न्याय भावना से बोलेंगे उन्हें लताड़ा जाएगा। मोदी-विरोध एक वृहत वैचारिक-राजनीतिक रणनीति का अंग है। वह अलग बिंदु नहीं, बल्कि एक असहिष्णु तानाशाही की अभिव्यक्ति है, जो मानो भारतीय हिंदुओं को चेतावनी दे रही है कि विश्व में हिंदू समुदाय या हित जैसी चीज नहीं। इसलिए उसके अधिकार तो क्या, सामान्य अभिव्यक्ति भी सांप्रदायिकता और दूसरों के अधिकारों का हनन है! मोदी को कदम-कदम पर अपमानित करना यही बताने का प्रयास है कि हिंदू भावनाओं की अभिव्यक्ति सख्त मना है। कि हिंदुओं को बराबरी की अनुमति नहीं। हिंदू को केवल पिटने, अपमानित होने और अन्य सभ्यताओं के समक्ष जी-हुजूरी की इजाजत है। वह स्वयं को हिंदू भी नहीं कह सकता। उसे केवल सेक्यूलर कहलाना है। उच्च-वर्गीय हिंदुओं ने यह हीन स्थिति स्वीकार कर ली है, जो ईसाई, इस्लामी और कम्युनिस्ट साम्राज्यवादियों ने लंबे समय से जबरन बना रखी है। यह हीन-भावना हिंदू नेताओं, बुद्धिजीवियों में इतनी गहरी बैठी हुई है कि हरेक संकट में वे इस्लामी, ईसाई या मा‌र्क्सवादी सहमतों के विरुद्ध एक होने के बदले उस हिंदू से ही कतराते हैं जिसने कुछ सच बोल दिया हो। असंख्य उच्च-पदस्थ हिंदुओं द्वारा मोदी की निंदा करने का यही अभिप्राय है। इसीलिए मूल गोधरा-कांड, जिसने प्रतिहिंसा पैदा की, कभी नाराजगी या न्याय का विषय नहीं बना। किंतु उसके बाद हुई हिंदू-प्रतिक्रिया अंतहीन विषवमन का स्थायी विषय बनी रही है। यह स्वत: नहीं हुआ, न इसे भारतीय जनता का समर्थन है। गुजरात के चुनाव परिणामों से भी इसे बहुत आसानी से समझा सकता है। लोकतंत्र, कानून, सामान्य बुद्धि आदि किसी निष्पक्ष कसौटी पर मोदी के विरुद्ध अभियान उचित नहीं ठहरता। किंतु अभिजात्य पंथनिरपेक्ष-वामपंथियों ने मोदी के बहाने हिंदू भावना को जान-बूझकर कुचलने की नीति अपनाई है। दोषी स्वयं हिंदू समाज है, जो राजनीति का पहला सूत्र भूल गया है कि जो समाज अपने लिए बोलने में समर्थ नहीं, उसके सद्भाव, नाराजगी या भावना का विशेष मूल्य नहीं होता। यदि हम हिंदू होकर भी दुनिया के सामने खुल कर हिंदुओं की चिंता रखने से बचते हैं, और सेक्युलर दिखना चाहते हैं तो निर्बलता स्पष्ट है। राजनीति में निर्बल नहीं, शक्तिशाली टिकता है। मोदी को ध्वस्त करने की चाह के पीछे हिंदुओं को दबाने और हिंदू दब्बूपन को यथावत रखने की रणनीति है। अब मोदी एक प्रतीक के रूप में हैं, व्यक्ति के रूप में नहीं।
साभार:-दैनिक जागरण
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

हुसैन पर हाय-तौबा

देवी-देवताओं की अश्लील पेंटिंगों को हुसैन की संकीर्ण सोच की उपज बता रहे हैं ए सूर्यप्रकाश
मकबूल फिदा हुसैन भारत में छद्म पंथनिरपेक्ष भीड़ के नायक रहे हैं। इसीलिए अंग्रेजी मीडिया का एक वर्ग उनके कतर देशांतर पर प्रलाप कर रहा है और हिंदुओं पर उनके पीछे पड़ने का आरोप मढ़ रहा है। कुछ टीवी एंकर हुसैन के भारत की नागरिकता छोड़ कर कतर की नागरिकता लेने पर चीत्कार मचा रहे हैं किंतु वे हुसैन की कलात्मक स्वच्छंदता की सच्चाई बताने के इच्छुक नहीं हैं। इसलिए अब समय है कि हुसैन के बारे में कुछ गरम पहलुओं से परदा उठाएं। श्रीमान हुसैन को भारत से भागने के लिए किसने मजबूर किया? एंटी हिंदूज पुस्तक के लेखक प्रफुल गोर्दिया और केआर पांडा कुछ महत्वपूर्ण सुराग और इस सवाल का विस्तार से उत्तर देते हैं। इस पुस्तक में न केवल संस्कार भारती के डीपी सिन्हा की प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित की गई है, बल्कि हुसैन की बेहद घिनौनी पेंटिगों की तस्वीरें भी छपी हैं। असलियत में, यह प्रेस विज्ञप्ति चित्रकार के खिलाफ विस्तृत आरोपपत्र ही है क्योंकि इसमें पेंटिंगों को एक से बढ़कर एक भौंडी और निंदनीय बताया गया हैं। यहां इस संगठन द्वारा आठ सर्वाधिक आपत्तिजनक पेंटिंगों की सूची जारी की गई है। पहली पेंटिंग का शीर्षक दुर्गा है, जिसमें दुर्गा देवी को एक टाइगर के साथ रति क्रिया रत दिखाया गया है। रेस्क्यूइंग सीता पेंटिंग में नग्न सीता को हनुमान की पूंछ पकड़े चित्रित किया गया है। हनुमान की पूंछ शालीनता की तमाम सीमाओं को लांघते हुए एक लैंगिग प्रतीक के रूप में प्रस्तुत की गई है। भगवान विष्णु को आम तौर पर चार हाथों के साथ चित्रित किया जाता है, जिनमें शंख, पद्म, गदा और चक्र होते हैं। किंतु हुसैन की पेंटिंग में विष्णु के हाथ काट दिए गए हैं। विकृत और थकेहारे विष्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी और वाहन गरुड़ की ओर देख रहे हैं। भगवान विष्णु के हाथ-पैर काटना रचनात्मक स्वतंत्रता है या फिर हिंदू संवेदना का जानबूझ कर अपमान करना है? सरस्वती जिन्हें हिंदू एक देवी के रूप में पूजते हैं, श्वेत साड़ी में चित्रित की जाती हैं। इन्हें भी हुसैन ने अपनी पेंटिंग में नग्न दर्शाया है। एक अन्य पेंटिंग में नग्न देवी लक्ष्मी देव गणेश के सिर पर सवार हैं। इस दृश्य से भी कामुकता झलकती है। हनुमान-4 शीर्षक से एक पेंटिंग में तीन मुख वाले हनुमान और एक नग्न युगल चित्रित किया गया है। महिला की पहचान संदेह से परे है। हनुमान का जननांग महिला की ओर दिखाया गया है। इसमें अश्लीलता बिल्कुल स्पष्ट झलकती है। हनुमान-13 शीर्षक वाली पेंटिंग में बिल्कुल नग्न सीता नग्न रावण की जांघ पर बैठी हैं और नग्न हनुमान उन पर वार कर रहे हैं। एक अन्य पेंटिंग जार्ज वाशिंगटन एंड अर्जुन आन द चैरियट में महाभारत के प्रसिद्ध गीता प्रसंग की पृष्ठभूमि में भगवान कृष्ण का स्थान वाशिंगटन ने ले लिया है क्योंकि भगवान कृष्ण की आंखों में कोई देवत्व नहीं है और उनकी अवमानना करते हुए उन्हें महज एक मानव जार्ज वाशिंगटन के रूप में पेश किया गया है। क्या हुसैन का यह मूर्तिभंजन एकसमान है? ऐसा बिल्कुल नहीं है। बात जब गैर हिंदू विषयों की आती है तो हुसैन आदर और सम्मान के प्रतिमान स्थापित कर लेते हैं। वह पैगंबर मोहम्मद की बेटी फातिमा को पवित्रता और शिष्टता के साथ चित्रित किया है, जो कपड़े पहने हुए हैं। यहां चित्रकार कोई छूट नहीं लेता। वह तब भी कोई छूट नहीं लेता जब उनकी बेटी और माता का चित्रण करता है। हुसैन की मदर टैरेसा पेंटिंग कला का लाजवाब नमूना है, जिसमें मदर टैरेसा करुणा की प्रतिमूर्ति लगती हैं। अगर ऐसा है तो हुसैन ने हिंदू देवी-देवताओं को इस कदर घिनौने अंदाज में क्यों चित्रित किया? इसका जवाब एक और पेंटिंग में मिलता है। एक पेंटिंग में आइंस्टीन, गांधी, माओ और हिटलर चित्रित किए गए हैं, जिनमें से केवल हिटलर को नग्न दिखाया गया है। क्या हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जिन चरित्रों को हुसैन घिनौना मानते हैं उन्हें नग्न चित्रित करते हैं? इन निंदनीय कला कर्म को पुन‌र्प्रकाशित करने और संस्कार भारती की विस्तृत प्रेस विज्ञप्ति जारी करने वाले प्रफुल गोर्दिया और केआर पांडा एमएफ हुसैन को विकृत कामवासना से ग्रस्त व्यक्ति बताते हैं। इन पेंटिंग के फोटोग्राफ मौलिक रूप से एक ऐसी पुस्तक में प्रकाशित हुए थे, जिसे खुद हुसैन ने डिजाइन किया था। लेखकों ने सिन्हा द्वारा पेश किए गए आठ उदाहरणों में अपनी तरफ से भी तीन जोड़े हैं। इनमें एक पेंटिंग में सांड को पार्वती से सहवास करते दिखाया गया है, जबकि शंकर उनकी तरफ देख रहे हैं। दूसरी में हनुमान के जननांग को एक औरत की ओर दर्शाया गया है और एक पेंटिंग में नग्न कृष्ण के हाथ-पैर कटे हुए दिखाए गए हैं। लेखक नंग्नता, अश्लीलता और कामविकृति में भेद की तरफ ध्यान खींचते हैं। वे कहते हैं, जब अश्लीलता या कामविकृति के साथ देवी-देविताओं को चित्रित किया जाता है तो यह आस्था के साथ खिलवाड़ करने की श्रेणी में आता है। जैसाकि गोर्दिया और पांडा रेखांकित करते हैं, हुसैन को संदेह का लाभ देना बिल्कुल संभव नहीं है। आइंस्टीन, गांधी, माओ और हिटलर के चित्रण वाली पेंटिंग अकाट्स साक्ष्य है। पहले तीन के शरीर पर कपड़े हैं, जबकि हिटलर नग्न है। क्या इसका यह मतलब नहीं है कि जिनसे वह घृणा करते हैं, उन्हें नग्न चित्रित करते हैं? वे पूछते हैं, क्या हिंदू का सम्मान करने वाला कोई भी व्यक्ति हुसैन को माफ कर सकता है? इसका जवाब स्पष्ट तौर पर ना है। तो हुसैन की कला से प्रताडि़त किसी हिंदू को क्या करना चाहिए? कुछ ऐसे असभ्य लोगों को छोड़कर जिन्होंने कानून अपने हाथ में लेकर चित्रकार की कुछ पेंटिंग प्रदर्शनियों में तोड़फोड़ की, अधिकांश हिंदुओं की प्रतिक्रिया वही थी, जो एक लोकतंत्र में होनी चाहिए। उन्होंने अदालत की शरण ली और चित्रकार के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कराए। उन्होंने कानून का सहारा लिया जो नागरिकों को अन्य नागरिकों की पंथिक संवेदनाओं पर आघात करने से रोकता है। उन्हें जान से मारने की धमकी नहीं दी गई और इस तरह के भद्दी घोषणाएं नहीं की गई जैसी उत्तर प्रदेश में एक मुसलमान ने डेनमार्क के काटूर्निस्ट का सिर कलम करने वाले को 51 करोड़ रुपए देने की पेशकश के रूप में की थी, जिसने पैगंबर मोहम्मद का कार्टून बनाया था। अगर आप कुछ टीवी एंकरों के हावभाव पर गौर करें तो इस ईश-निंदा के घटिया तरीके पर हिंदुओं की लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया के लिए कोई सराहना नहीं की जानी चाहिए, बल्कि अदालत में खींचने के लिए इनकी भ‌र्त्सना की जानी चाहिए। हुसैन के मित्र और प्रशंसक जो भी कहें, सच्चाई यह है कि हिंदू भावनाओं के साथ इस प्रकार की घृणित खिलवाड़ के कारण वह कानूनी रूप से भगोड़ा घोषित हैं। जबसे उन पर मामले दर्ज किए गए हैं, वह फरार चल रहे हैं। बहुत से हिंदू जो हुसैन की इस घिनौनी कला से परिचित हैं, उन्हें कतरनाक पेंटर बताते हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि उनके लिए कतर ही उनकी अंतिम मंजिल थी! किंतु अगर हम अपनी पंथनिरपेक्ष परंपरा को मान देते हैं तो हमें उन्हें बचकर भाग निकलने नहीं देना चाहिए। कानून की लंबी बांह को कतर तक जाना चाहिए। हमें उनका प्रत्यारोपण करके 80 करोड़ भावनाओं पर चोट पहुंचाने के लिए उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।
saabhar:-dainik jagran
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)